शनिवार, 20 जून 2026

योग अमूल्य धरोहर

योग अमूल्य धरोहर 

योग हमारे ऋषि-मुनियों के द्वारा दी गई एक अमूल्य देन है। योग अपने आप में एक समूचा दर्शन है। आजकल कुछ लोग इसे मात्र उछल कूद करने का माध्यम समझ रहे हैं जो उचित नहीं है। आज की पीढ़ी के अनुसार टीवी के सामने खड़े होकर या सीडी देखकर हाथ-पैरों को हिला लेना मात्र योग बन गया है। जिसको आज ये आधुनिक लोग 'योगा' की संज्ञा देते हैं। वास्तव में वह योग नहीं कहलाता। वे केवल योगासन कहलाते हैं। इन दोनो के अन्तर को समझना आवश्यक है।
              योग एक बहुत गम्भीर विषय है। इसकी अनुपालना करना इतना सरल कार्य नहीं है, जितना लोग समझते हैं। महर्षि पातंजलि ने योगशास्त्र में योग के आठ अंग बताए हैं- यम, नियम, आसन, प्रत्याहार, प्रणायाम, धारणा, ध्यान और समाधि। इन आठों अंगों का पालन करते हुए मनुष्य समाधि के द्वारा ईश्वर को प्राप्त करता है। इनमें पहले पाँच अंगों को बहिरंग कहते हैं और अन्तिम तीन अंगों  को अन्तरंग कहा जाता है। इन आठ अंगो के कारण ही इसे अष्टांगयोग कहते हैं।
             मनुष्य का सारा जीवन व्यतीत हो जाता है यम और नियम का पालन करते हुए पर उनकी पूर्ण रूप से अनुपालना नहीं कर पाता। जिस प्रकार नींव के बिना यदि घर बनाया जाए तो वह बहुत दिन तक टिका नहीं रह सकता, उसी प्रकार यम और नियम के बिना समाधि तक पहुँच पाना असम्भव होता है। योग की पहली सीढ़ी यम है इसके पालन के बिना नियम की अनुपालना नहीं हो सकती। इन दोनों के पालन से अन्त:करण पवित्र होता है। इनके पालन के बिना प्राणायाम का भली-भाँति होना बहुत कठिन होता है। अब इन अंगों की संक्षिप्त जानकारी नीचे दे रही हूॅं - 
1. यम- महर्षि पातंलि योगदर्शन में कहते हैं-
    अहिंसासत्यमस्तेयब्रह्मचर्यापरिग्रहा यमा:
अर्थात् अहिंसा, सत्य, अस्तेय(चोरी न करना), ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह(संग्रह न करना) ये पाँच यम हैं। मन, वचन व कर्म से इन सबका पालन करना चाहिए। सारा जीवन ईमानदार कोशिश करने पर भी इनका पालन असम्भव-सा है।
2. नियम- योगशास्त्र के अनुसार दूसरा नियम हैं-
शौचसंतोषतप:स्वाध्यायेश्चप्रणिधानानि नियमा:।अर्थात् शौच(तन और मन की स्वच्छता), सन्तोष, तप, स्वाध्याय और प्रणिधान (सर्वस्व ईश्वर को अर्पित करना)। पाँचों नियमों का पालन इन पाँचों यमों के साथ-साथ ही करना होता है।
3. आसन- योगाभ्यास करते समय उपयुक्त आसन का चुनाव करके बैठना चाहिए। साधक प्रायः पद्मासन में ही बैठते हैं। आसन में बैठते समय तीन बातों का ध्यान रखना आवश्यक है- 1. मेरुदंड, ग्रीवा और मस्तक को बिल्कुल सीधा रखना चाहिए। 2. नासिकाग्र पर या भृकुटि में दृष्टि रखनी चाहिए। 3. यदि आलस्य न सताए तो आँखें मूँदकर बैठ सकते हैं। इस प्रकार उचित आसन पर बैठकर योगाभ्यास किया जाता है।
4. प्राणायाम- श्वास के आरोह व अवरोह का निरोध यानी रोकना प्राणायाम कहलाता है। इसी बात को योगशास्त्र कहता है-
    तस्मिन सति श्वासप्रश्वासयोर्गतिविच्छेद:      प्राणायाम:। 
अर्थात् देश, काल और संख्या के सम्बन्ध से बाह्य (कुम्भक), आभ्यन्तर(रेचक) और स्तम्भन वृत्ति(रोकना) वाले तीनों प्राणायाम दीर्घ और सूक्ष्म होते हैं। प्राणायाम सिद्ध होने पर विवेक को कुण्ठित करने वाले अज्ञान का नाश होता है और मन स्थिर होता है।
5. प्रत्याहार- अपने-अपने विषय के संयोग से हट जाने और इन्द्रियों का चित्त के रूप में अवस्थित होना प्रत्याहार कहलाता है। प्रत्याहार से इन्द्रियाँ वश में हो जाती हैं। तब साधक बाह्य ज्ञान से दूर होता जाता है।
6. धारणा- योगशास्त्र धारणा के विषय में यह कहता है-  
          देशबन्धश्चित्तस्य धारणा
अर्थात् चित्त को किसी भी एक ध्येय स्थान पर स्थित करने को धारणा कहते हैं।
7.  ध्यान- ध्यान के विषय में योगशास्त्र का यह कथन है-  
             तत्र प्रत्ययैकतानता ध्यानम्
अर्थात् ध्येय वस्तु में चित्तवृत्ति की एकतानता को ध्यान कहते हैं।
8. समाधि- एकाग्र ध्यान धीरे-धीरे समाधि की ओर प्रवृत्त करता है। तब ध्याता, ध्यान और ध्येय एक हो जाते हैं। 
            स्थूल पदार्थ में समाधि 'निर्वितर्क' कहलाती है और सूक्ष्म में समाधि 'निर्विचार' कहलाती है। यही समाधि ईश्वर विषयक होने से मनुष्य को मुक्ति प्रदान करती है।
             इस संक्षिप्त विवेचन से यह समझ आता है कि योग एक बहुत ही गहन विषय है। इसके प्रारम्भिक अंगों यम और नियम का पालन आजीवन करना होता है। यह योग मनुष्य के मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करता है। इसकी अनुपालना करके ही जन्म और मृत्यु के बन्धन से मुक्ति मिलती है।
चन्द्र प्रभा सूद 

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