शनिवार, 27 जून 2026

मनुष्य का वास्तविक धन

मनुष्य का वास्तविक धन

आजन्म मनुष्य धन की कामना करता है।यह धन उसकी आवश्यकता होता है और वह इसे पाने के लिए अनथक प्रयास भी करता है। दिन-रात अपना सुख-चैन गॅंवाकर वह‌ इस धन को कमाने का प्रयास करता है। सोचने वाली बात यह है कि क्या मनुष्य परिश्रम से अर्जित धन को प्राप्त करके सन्तुष्ट हो जाता है? यदि नहीं तो फिर मनुष्य का वास्तविक धन क्या है? यह एक गहन विषय है। आज हम इसी विषय पर चर्चा करते हैं।
            मेरे विचार में मनुष्य का वास्तविक धन उसका उत्तम स्वास्थ्य, सकारात्मक सोच, सन्तोष, बन्धु-बान्धवों के साथ मधुर सम्बन्ध और शुभकर्म होते‌ हैं। भौतिक धन-वैभव नश्वर है जबकि अच्छा स्वास्थ्य और सत्चरित्र जीवन भर साथ निभाते हैं। यही जीवन को भी सार्थक बनाते हैं। 
          हम सांसारिक लोग हैं, हमारे घरों में यदा कदा अतिथि आते रहते हैं। कुछ अतिथि थोड़े समय के लिए आते हैं और कुछ अतिथि हमारे साथ कुछ दिन व्यतीत करते हैं। हम सबकी आवभगत अपनी सामर्थ्य के अनुसार करते हैं। जब कोई अतिथि हमारे घर कुछ दिन रहता है और जाते समय प्रसन्न मन यह से कहता है कि आपके घर में आकर मेरा मन रम गया है, यहाँ से जाने का दिल नहीं कर रहा। यह घर नहीं एक मन्दिर है तो यह मनुष्य का सबसे बड़ा धन होता है।
          जब माता-पिता अपने बच्चों के व्यवहार से, उनकी सेवा सुश्रुषा से प्रसन्न होते हैं तब उनके मन से अपने आप ही आशीर्वाद निकलते हैं। वे अनायास ही यह कहते हैं कि ये बच्चे हमारे कलेजे का टुकड़ा हैं। मेरे विचार में किसी भी मनुष्य के लिए इससे बढ़कर और कोई धन हो ही नहीं सकता।
          घर-परिवार में सामञ्जस्य का वातावरण हो। बच्चे माता-पिता की आज्ञाकारी सन्तान हों, उनका आदेश बच्चों के लिए ब्रह्मवाक्य हो। ऐसे माहौल में यदि कोई बेटा या बेटी यह कहे कि मेरे माँ-बाप ही मेरे भगवान हैं तो यह मनुष्य की सबसे बड़ी पूँजी कहलाएगी।
            पति-पत्नी में परस्पर प्यार और विश्वास हो और वे दोनों एक बन्द मुट्ठी की तरह मिलकर रहते हों, उनके बच्चे भी संस्कारी हों तो ऐसा घर स्वर्ग से भी बढ़कर सुखी होता है। शादी के बीस साल के बाद भी पति-पत्नी का एक-दूसरे के प्रति लगाव कम न होकर बढ़ता रहे तो उनके इस प्रेमधन के समक्ष अन्य सभी धन फीके पड़ जाते हैं। 
           घर-परिवार में प्रायः सास और बहू की नोकझोंक चलती रहती है। यदि वहाँ सभी को यथोचित सम्मान देने की परम्परा हो तो इस समस्या से बचा जा सकता है। बहू अपनी सास को सास नहीं माँ माने और इसी प्रकार सास भी अपनी बहू को बहू नहीं बेटी मान लें तो अधिकतर झगड़े समाप्त हो जाएँ। दोनों ही एक-दूसरे की गलतियों को अनदेखा करके यदि परस्पर सौहार्द बनाए रखें तो वहाँ टकराव होगा ही नहीं। उस घर की खुशबू दूर-दूर तक फैलती है। यही गृहस्थी का सबसे बड़ा धन है।
           जिस घर में घर में बड़ों को मान और छोटों को प्यार भरी नजरों से देखा जाता है वहाँ सुख-शान्ति का वास होता है। बड़ों को चाहिए कि वे अपना हृदय विशाल बनाकर बच्चों को उनके किसी भी दोष के लिए क्षमा कर दें। इसी प्रकार बच्चों का दायित्व भी बनता है कि वे बड़ों की कोई बात रुचिकर न लगने की स्थिति में घर में बवाल न मचाकर प्यार से समाधान करें। छोटे-बड़े सभी को हठधर्मिता छोड़कर रिश्तों में तालमेल बनाए रखना चाहिए। ऐसा करने पर घर के सभी सदस्यों का आपसी व्यवहार सन्तुलित रहता है। बाहर जाने पर घर में भागकर आने का मन करता है। अब आप ही बताइए कि इससे बड़ा कोई और धन मनुष्य के लिए हो सकता है?
           भाई-बन्धुओं अथवा घर-परिवार के किसी सदस्य की यदि जरूरत के समय आप अपना फर्ज समझकर प्रसन्नतापूर्वक, बिना अहसान जताए सहायता कर सकें और वह आपको अपने दिल की गहराई से दुआ दे तो यह सबसे धन होगा। यह धन आत्मसन्तुष्टि का भाव देता है।
           सार रूप में हम कह सकते हैं कि जो वस्तुऍं मनुष्य को मानसिक शान्ति और प्रसन्नता प्रदान करें, वही सच्चा कहलाता धन है। अच्छा स्वास्थ्य मनुष्य का मनोबल बढ़ाता है, उसे ऊर्जावान बनाता है और जीवन जीने की प्रेरणा देता है। अपनी आवश्यकताओं को सीमित करके खुशियॉं तलाशना और मन की शान्ति को वास्तविक सम्पत्ति माना जाता है। अपने भाई-बन्धुओं के साथ समय व्यतीत करना सुकून देता है। 
            यदि अपने विवेक से ऐसा धन मनुष्य पा सके तो उससे बढ़कर भाग्यशाली व्यक्ति कोई और हो ही नहीं सकता। मनुष्य को अपने घर को यत्नपूर्वक ऐसा बनाना चाहिए कि उसके मन में कोई और कामना न रह जाए। ईश्वर की कृपा से हर किसी व्यक्ति को ऐसे परम धन की प्राप्ति हो और वह अपना खुशहाल जीवन जी सके।
चन्द्र प्रभा सूद

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