सोमवार, 1 जून 2026

परिवार की परिकल्पना

परिवार की परिकल्पना

परिवार की परिकल्पना भारतीय संस्कृति की अनमोल धरोहर है। वास्तव में परिवार एक ऐसी संस्था है जहाँ व्यक्ति जन्म लेता है, विकसित होता है और सामाजिक नियमों को सीखता है। परिवार केवल साथ रहने वाले लोगों का समूह नहीं है अपितु भावनात्मक जुड़ाव और आपसी विश्वास का केन्द्र भी है। यह समाज का एक ऐसा आधारभूत ढॉंचा है जो विवाह और आत्मीयता के नियमों के माध्यम से सामाजिक स्थिरता बनाए रखता है। परिवार का प्राथमिक कार्य बच्चों का समाजीकरण करना, उन्हें शिक्षा और संस्कार देना तथा भोजन, वस्त्र और सुरक्षा जैसी बुनियादी जरूरतें पूरी करना होता है।
            परिवार में जितना अधिक आपसी विश्वास और तालमेल बना रहेगा उतना ही घर के सदस्यों का आपसी सद्भाव दूसरों के लिए उदाहरण बनता है। ऐसे घर की महक चारों दिशाओं में फैलती है।सन्त कबीरदास जी के जीवन का एक प्रसंग बताना चाहती हूँ। 
           कबीरदास जी प्रतिदिन सत्संग किया करते थे। दूर-दूर से लोग उनके पास सुनने के लिए आते थे। एक दिन सत्संग खत्म होने के बाद भी एक आदमी बैठा ही रहा। कबीर दास जी ने उससे पूछा' "भाई, सब लोग चले गए। तुम अभी तक बैठे हुए हो। तुम्हें जाना नहीं है क्या?"
            उसने बताया, "घर के सभी सदस्यों से उसका झगड़ा होता रहता है।"
          उसने कबीरदास जी से आगे कहा, "मुझे बताइए कि मेरे घर में ही क्लेश क्यों होता है? वह उसे कैसे दूर कर सकता है?"
            कबीर जी ने थोड़ी देर चुप रहे। फिर  उन्होंने अपनी पत्नी से कहा, "लालटेन जलाकर ले आओ।" 
             उस बात को सुनकर उनकी पत्नी लालटेन जलाकर ले आई और बोली, "यह लीजिए।"
            वह आदमी हैरान होकर सोचने लगा इतनी दोपहर में इन्होंने लालटेन क्यों मंगवाई? थोड़ी देर बाद कबीर जी ने पत्नी से कहा, "कुछ मीठा लेकर आओ।"
           यह क्या ? मंगवाया तो मीठा था परन्तु उनकी पत्नी नमकीन देकर चली गई। उस आदमी ने सोचा कि यह तो शायद पागलों का घर है। मीठा के बदले नमकीन और दिन में लालटेन।
         उस व्यक्ति ने कबीरदास से जब जानने के लिए पूछा तब उन्होंने ने कहा, "आपकी समस्या का समाधान हो गया?
          उस व्यक्ति ने अनभिज्ञता प्रकट की तब कबीर जी ने कहा, "लालटेन मंगवाने पर मेरी पत्नी कह सकती थी कि तुम क्या सठिया गए हो। इतनी दोपहर में लालटेन की क्या जरूरत है। लेकिन उसने सोचा कि किसी काम के लिए लालटेन मंगवाई होगी। मीठा मंगवाया तो नमकीन देकर चली गई। मैं चुप रहा कि हो सकता है घर में कोई मीठी वस्तु न हो। इसमें तकरार कैसा? आपसी विश्वास बढ़ाने और तकरार न करने से विषम परिस्थितियाँ स्वयं दूर हो गईं।"
           तब उस व्यक्ति को समझ आया कि कबीर जी ने उसे समझाने के लिए ऐसा किया था। कबीर जी ने फिर कहा, "गृहस्थी में आपसी विश्वास से ही तालमेल बनता है। आदमी से गलती हो जाए तो औरत सम्हाल ले और औरत से कोई त्रुटि हो जाए तो पति उसे नजरअंदाज कर दे।" 
           सुखी गृहस्थी का मूल मन्त्र सिख धर्म के गुरु नानक देव जी ने इस प्रकार बताया है - 
          एक ने कही दूजे ने मानी 
           नानक कहे दोवें ज्ञानी।
अर्थात् घर में एक व्यक्ति ने कोई बात कही और दूसरे व्यक्ति ने उसे मान लिया तो वे दोनों ज्ञानी या समझदार कहलाते हैं।
           हम कह सकते हैं कि घर में बिना विरोध किए एक-दूसरे की बात को मान लेना समझदारी होती है। अनावश्यक विरोध से टकराव की स्थिति बनती है। हाँ, पहले बात मान लो और फिर माहौल देखकर अपनी राय को भी रखना चाहिए। इससे दूसरे को उसकी गलती का अहसास भी हो जाता है और घर का वातावरण भी नहीं बिगड़ता। ऐसा करने में मनुष्य का अहं आड़े आ सकता है पर घर की सुख-शान्ति बनाए रखने के लिए यह बहुत कारगर उपाय है। तभी घर स्वर्ग के समान बन सुन्दर बन जाता है।
          इस तथ्य को हृदयंगम कर लेना चाहिए कि परिवार से बड़ा कोई धन इस संसार में नहीं है। पिता से बड़ा सलाहकार इस दुनिया में कोई नहीं मिल सकता। माता के आँचल की छाया से बड़ा स्थान दुनिया में अन्य कोई नहीं हो सकता। उसे पाने के लिए देवता भी तरसते हैं। 
          अपने भाई से अच्छा साथी कोई नहीं हो सकता। बहन से बड़ा कोई शुभचिन्तक नहीं हो सकता। अपने भाई-बहनों से ही मनुष्य संसार में सुशोभित होता है। पत्नी से बड़ा कोई मित्र इस संसार में नहीं हो सकता। वही मनुष्य के सुख-दुख का सच्चा साथी होती है। उसके बिना वह अधूरा रहता है। पत्नी के साथ होने से ही मनुष्य की गृहस्थी सुखपूर्वक चलती है।
            परिवार के बिना हम लोग जीवन की कल्पना ही नहीं कर सकते। यदि अपने जीवन में सुख-समृद्धि चाहिए तो परिवार में सामंजस्य बनाकर रखना चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद 

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