सोमवार, 15 जून 2026

अध्यापक का कार्य

अध्यापक का कार्य

शिक्षक अथवा अध्यापक का कार्य अपने विद्यार्थियों को सुसंस्कारित करना होता है। ताकि वे देश और समाज का गौरव कहला सकें। उनसे अपेक्षा की जाती है कि वे समाज के समक्ष अपना उदाहरण प्रस्तुत करें और अपने उच्च चरित्र का परिचय दें। उसके लिए पहली शर्त है उन शिक्षकों का चरित्रवान होना और उन विद्यार्थियों का आज्ञाकारी होना। शिक्षक को अपने छात्रों को सन्तान तुल्य मानकर एक पिता के समान उनके साथ व्यवहार करना चाहिए। यदि वह ऐसा करने मे असमर्थ रहता है तो वह इस गौरवशाली पद के कदापि योग्य नहीं है।
          एक शिक्षक अपने विद्यार्थियों को जीवन में सफलता के सोपानों पर चढ़ते देखता है तो उसे वैसी ही प्रसन्नता मिलती है जैसी उस बच्चे के माता-पिता को। वह  स्वयं तो अपने उसी स्थान पर मील के पत्थर की तरह खड़ा रहता है परन्तु अपने छात्रों को ऊँचाइयों पर पहुँचाने का कार्य बखूबी निभाता है। जिस प्रकार सड़क अपने स्थान पर स्थित रहकर यात्रियों को उनके गन्तव्य, उनकी मंजिल तक पहुँचा ही देती है। इसीलिए शिक्षक को भगवान का दर्जा दिया जाता है।
            हमारी भारतीय सभ्यता ने गुरु और शिष्य दोनों को जहाँ संस्कार दिए हैं, वहीं दूसरी ओर उन्हें मर्यादाओं में भी बाँधा है। एक ओर जहाँ छात्रों को सिखाया कि अपने गुरु का सम्मान ईश्वर की तरह करो तो वहीं दूसरी ओर गुरु को भी शिक्षित किया कि अपने सभी शिष्यों के साथ समानता का व्यवहार करते हुए उन पर पुत्रवत् स्नेह रखे। उसके पास जो भी ज्ञान है, उसे अपने छात्रों में बाँट देने में हिचकिचाए नहीं। माता-पिता जैसे आगे बढ़ते हुए अपने बच्चों पर गर्व करते हैं, उसी प्रकार एक अध्यापक को भी अपने छात्रों को उन्नति करते हुए देखकर गौरवान्वित होना चाहिए। उनसे स्पर्धा अथवा ईर्ष्या की भावना नहीं रखनी चाहिए।
          यद्यपि आज इस भौतिक युग में कुछ अध्यापक दुराचरण में लिप्त होकर इस पद की गरिमा को ठेस पहुँचा रहे हैं। कुछेक ने बलात्कार जैसे जघन्य अपराध को भी अन्जाम दे दिया है। छात्रों के साथ मारपीट व दुर्व्यवहार की घटनाएँ भी यदा कदा सुनने को मिल जाती हैं। उन मुट्ठी भर लोगों के कारण इस गौरवशाली गुरु-शिष्य परम्परा को कलंकित करके कटघरे में खड़ा नहीं किया जा सकता। अध्यापक का यह कर्त्तव्य है कि वह अपने सभी छात्रों के साथ समान रूप से व्यवहार करे। किसी बच्चे के माता-पिता के पद या धन-वैभव से प्रभावित होकर उस तथाकथित छात्र के साथ पक्षपातपूर्ण रवैया नहीं अपनाना चाहिए।
        आजकल प्राइवेट सेक्टर की स्वार्थी प्रकृति और महत्त्वाकाँक्षा के कारण इस शिक्षक वर्ग का बहुत ही शोषण हो रहा है। जिसके कारण कम तनख्वाह पर भी काम करना उनकी मजबूरी बनती जा रही है। इसलिए अपना व परिवार का खर्च चलाने के लिए उन्हें प्राइवेट ट्यूशन का सहारा भी लेना पड़ रहा है। कक्षा में वे लोग कैसा भी पढ़ाऍं, उन्हें कोई चिन्ता नहीं होती। उनका ट्यूशन का धन्धा अच्छा चलना चाहिए। शिक्षा के इस पावन क्षेत्र में यद्यपि नई पीढ़ी की कोई रुचि नहीं है। वे शिक्षक बनने के स्थान पर दफ्तरों में अधिक वेतन पर कार्य करना चाहते हैं। अतः यहाँ इस क्षेत्र में गुणवत्ता की कमी बहुत अखरती है।
            कुछ सरकारी नीतियों के चलते अभी तक साक्षरता दर का आँकड़ा अपेक्षाकृत कम है। देश में निरक्षर लोग अभी भी बहुत बड़ी संख्या में हैं। पूरे देश में लाखों विद्यालय आज भी बिना अध्यापक के चल रहे हैं अथवा उनकी संख्या नगण्य है। इस इक्कीसवीं सदी में आज भी हमारे देश में लाखों बच्चे ऐसे मिल जाएँगे जिन्होंने दुर्भाग्यवश कभी स्कूल का मुँह नहीं देखा। उन बच्चों के भविष्य के विषय में भी अध्यापकों को आगे कदम बढ़ाना चाहिए।
          जमीनी सच्चाई तो यही है कि एक अध्यापक अपने विद्यार्थियों को सदा ही अपना बेस्ट यानी सर्वश्रेष्ठ देने का प्रयास करता है। अपने मार्गदर्शन से उसके भावी कैरियर को बनाने में यथासम्भव प्रयास करता है। दूसरी ओर बहुत से अध्यापक ऐसे भी हैं जिन्हें महीने के आखिर में आने वाली बस अपनी तनख्वाह से मतलब होता है। वे अपने विषय से सम्बन्धित पुस्तकों को पढ़कर अथवा समाचारपत्र को पढ़कर अपने ज्ञान की वृद्धि नहीं करना चाहते। अपने सीमित ज्ञान के कारण वे कूपमण्डूक की तरह बनकर रह जाते हैं।
          सब विपरीत स्थितियों के चलते हुए भी शिक्षक वर्ग को उसकी जिम्मेदारी से मुक्त नहीं किया जा सकता। उसे अपने ज्ञान का समुचित उपयोग करना ही चाहिए और समय-समय पर उसे स्वयं को अपग्रेड भी करना होगा। जिससे अपने विद्यार्थियों के सर्वांगीण विकास में उनकी भूमिका पूर्ववर्ती आचार्यों की तरह महत्त्वपूर्ण रहे। वे अपने छात्रों के जीवन में एक मील के पत्थर की तरह सिद्ध हो सकें।
चन्द्र प्रभा सूद

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