लक्ष्य निर्धारित करना
मनुष्य को अपना लक्ष्य निर्धारित करना चाहिए तभी वह अपने जीवनकाल में सफलता की ऊँचाइयों को छू सकता है। लक्ष्य को पाने की कामना करने वाले के लिए आत्मानुशासन (self discipline) की आवश्यकता होती है। जब वह अपने लक्ष्य को पाने के प्रयास में परिश्रम करता है, दिन-रात एक कर देता है तभी अपने अनथक श्रम से वह लक्ष्य पाकर ही चैन लेता है। छोटे-छोटे लक्ष्य हासिल करने से आत्मविश्वास बढ़ाता है और अन्ततः बड़े लक्ष्यों की प्राप्ति की ओर मनुष्य कदम बढ़ाता है।
दूसरे शब्दों में कहें तो वह मनुष्य भाग्यशाली है जो एक निश्चित लक्ष्य की ओर अपने कदम बढ़ाता है। उसका जीवन किसी विशेष उद्देश्य के लिए होता है। ऐसे ही अनुशासित लोग घर-परिवार, देश, धर्म और समाज के लिए कुछ गुजरने का माद्दा रखते हैं।
लक्ष्य निर्धारण जीवन में सफलता पाने और दिशा निर्धारित करने की एक प्रक्रिया है। इसमें प्रासंगिक और समयबद्ध लक्ष्यों को परिभाषित किया जा सकता है। यह टालमटोल को कम करके मनुष्य के फोकस बढ़ाता है और उपलब्धियों की निगरानी करने में मदद करता है। लक्ष्य हमेशा एक मार्गदर्शक के रूप में काम करता है। इससे अपने विकास को प्रबन्धित करना और आवश्यक बदलावों की शुरूआत करना आसान हो जाता है। लक्ष्य ऐसे होने चाहिए जो प्रेरित करें। मनुष्य को अपनी प्रगति की नियमित समीक्षा करनी चाहिए।
लक्ष्य मनुष्य के जुनून से जुड़े होने चाहिए और उन्हें हासिल करने के लिए एक चरणबद्ध योजना बनाने की आवश्यकता होती है। लक्ष्यहीन व्यक्ति कटी हुई पतंग की तरह केवल इधर-उधर भटकता रहता है। जब तक मनुष्य यह निर्धारित नहीं करेगा कि वह जीवन में क्या बनना चाहता है अथवा क्या करना चाहता है? तब तक वह अपनी मंजिल पर नहीं पहुँच सकता।
यदि हमें कही जाना हो तो पहले हम स्थान निर्धारित करते हैं। फिर वहाँ तक पहुँघने का मार्ग सुनिश्चित करते हैं। जब हम पूरी तरह से सन्तुष्ट हो जाते हैं तभी यात्रा के लिए निकलते हैं और निश्चित ठिकाने पर पहुँच जाते हैं। उसी प्रकार जीवन की यात्रा भी करनी होती है। वहाँ किन्तु अथवा परन्तु से काम नहीं चलता। जीवन में एक स्पष्ट रूपरेखा की आवश्यकता होती है। तब जाकर मनुष्य अपने लक्ष्य तक पहुँचता है। अन्यथा मानव जन्म पाकर भी वह उस जीवन को वृथा गँवा देता है।
मनीषी कहते हैं कि लक्ष्यहीन जीवन बिना पता लिखे लिफाफे की तरह होता है जो कहीं भी नहीं पहुँच सकता, उसे बस रद्दी की टोकरी में फैंक दिया जाता है। उसे भेजने वाला और पाने वाला दोनों ही उसके लिए प्रतीक्षारत रहते हैं। यदि मनुष्य अपने जीवन में लक्ष्य पाने के लिए यदि दूसरों का मुँह ताकता रहेगा तो वह जीवन की इस रेस में पिछड़ जाएगा।
हर किसी के कहने पर यदि मनुष्य चलेगा तो वह थाली के बैगन की तरह इधर-उधर लुड़कता रहेगा। सभी लोग अपने-अपने जीवन में भागमभाग में लगे हुए हैं। इसलिए किसी की ओर देखने का समय उनके पास नहीं है। जब तक मनुष्य स्वयं भागकर उन भागने वालों के साथ कदम नहीं मिलाएगा तब तक वह बस निराशा का सामना ही करता रहेगा। फिर ऐसे पिछड़े हुए का साथ देना कौन चाहेगा?
हमारे भारत के पूर्व राष्ट्रपति डॉ कलाम ने कहा था, "इन्तजार करने वालों को उतना ही मिलता है जितना कोशिश करने वाले छोड़ देते है।"
स्वामी विवेकानन्द का कथन है, "आप जैसे विचार रखोगे वैसे ही बन जाओगे। अगर अपने आपको को निर्बल मानोगे तो निर्बल बन जाओगे।यदि अपने आपको समर्थ मानोगे तभी तो समर्थ बन पाओगे।"
अब यह व्यक्ति विशेष पर निर्भर करता है कि वह विचार करे कि आखिर वह अपने जीवन में क्या चाहता है? क्या वाले वह दूसरों को हसरत भरी निगाहों से निहारता रहना चाहता है? अथवा वह कुछ कर गुजरने की सामर्थ्य रखने वाला बनना चाहता है?
इसलिए विवेकपूर्वक मनन करते हुए जीवन को सही दिशा की ओर ले जाना ही समझदारी है। नदी में प्रायः वही किश्तियाँ डूबती हैं जो बिना योग्य मल्लाह के केवल आनन्द के लिए बस यूँ ही दिशाहीन दौड़ाई जाती हैं।
उसी प्रकार जिनके जीवन लक्ष्यहीन होकर डगमगाते हैं वे इस संसार सागर में डूब जाते हैं। जिनके दिल में कुछ कर गुजरने की सामर्थ्य होती है वे ही हरदम झूमते-गाते हैं, मस्त रहते हैं। सफलता इन्हीं महानुभावों के चरण चूमती है। दुनिया भी इन लोगों को अपनी सिर आँखों पर बिठाती है। ऐसे उद्यमी समाज को दिशा देते हैं।
अतः जीवन को लक्ष्यहीन होकर नहीं भटकने देना चाहिए, अपने लक्ष्य का निर्धारण करके वहीं बाण का अनुसन्धान करना चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद
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