मनुष्य की वास्तविक कमाई
मनुष्य की वास्तविक कमाई क्या है? यदि इस विषय पर विचार करेंगे तो हमें ज्ञात होगा कि जिस धन-दौलत और ऐश्वर्य-समृद्धि को पाने के लिए मनुष्य ने कोल्हू के बैल की तरह दिन-रात एक करके अथक परिश्रम किया, वह तो कभी उसका था ही नहीं। जीवन के अन्तिम समय आने पर उस सारे भौतिक धन-वैभव को उसे इस पृथ्वी पर ही छोड़कर परलोक जाना पड़ता है। वह तो मात्र एक ही भ्रम था जिसने उसे अपने जाल में सारा जीवन उलझाए रखा।
हमारे महान् ग्रन्थ और मनीषी एक ही बात कहते हैं और अनुभवजन्य सच्चाई भी यही है कि मनुष्य इस संसार में खाली हाथ आता है और अपनी आयु भोगकर खाली हाथ ही यहाँ से विदा लेता है। उसके सभी साजो-समान, उसकी सारी धन-दौलत यहीं रह जाती है। गठरी बाँधकर वह कुछ भी अगले जन्म के लिए नहीं ले जा सकता। अपने जीवन काल में कृत केवल अच्छे अथवा बुरे कर्म ही वह साथ लेकर जा सकता है। फिर उनका मीठा या कड़वा फल वह जन्म-जन्मान्तरों तक भोगता रहता है।
एक दृष्टान्त से इस सत्य को समझने का प्रयास करते हैं। एक बार एक सन्त ने अपने दो भक्त को बुलाया और कहा आप दोनों को यहाँ से पचास कोस तक पैदल जाना है। एक भक्त को एक बोरी खाने के समान से भर कर दी और कहा जो भी रास्ते में मिले उसे ये बाँटते जाना और दूसरे भक्त को खाली बोरी दी उससे कहा रास्ते में जो उसे अच्छा सामान मिले उसे बोरी में भर लेना। दोनों सन्त द्वारा निर्दिष्ट यात्रा के लिए अपना सिर झुकाकर निकल पड़े।
जिसके कन्धे पर सामान था वह धीरे-धीरे चल रहा था पर खाली बोरी वाला भक्त आराम से जा रहा था। थोड़ी दूर जाने पर उसे सोने की एक ईंट मिली, उसने उसे बोरी मे डाल लिया। थोड़ी दूर चलने के बाद उसे फिर एक ईंट मिली। उसे भी उसने उठा लिया। जैसे-जैसे चलता गया, उसे सोना मिलता गया और वह बोरी मे भरता हुआ चलता गया। बोरी का वजन बढता चला गया और अब उसका चलना मुश्किल होने लगा। उसकी साँस भी फूलने लगी। उसका एक-एक कदम बढ़ाना कठिन होने लगा।
दूसरे भक्त को रास्ते में जो भी मिलता, उसे बोरी में से खाने का कुछ समान दे देता। धीरे-धीरे बोरी का वजन कम होता गया और उसका चलना आसान होता गया। जो बाँटता गया उसका मंजिल तक पहुँचना आसान हो गया और जो इकट्ठा करता रहा, उसने अतिभार के कारण रास्ते में ही दम तोड़ दिया।
कहने का तात्पर्य मात्र इतना है कि जो मनुष्य आयुपर्यन्त दूसरों को बाँटता रहता है, अन्तकाल तक पहुँचते-पहुॅंचते वह हल्का हो जाता है। दूसरे शब्दों में कहें तो दूसरों के दुख-दर्द, परेशानियों को बाँटने, निस्वार्थ परोपकार करने वाले मनुष्य को यात्रा पूरी करने तक सन्तुष्टि मिलती है, वह प्रसन्न रहता है। अपने शुभकर्मों के कारण उसके पापकर्मों की गठरी नहीं बनती। उसे इहलोक और परलोक हर स्थान पर पुण्यों के सुख का अहसास होता है।
इसके विपरीत अपनी स्वार्थ वृत्ति के कारण जो मनुष्य दूसरों को कष्ट देते हैं, ऐसे अत्याचार करने वालों के दुष्कर्मों की गठरी भारी होती जाती है, उसे उठाकर चलना उनके लिए कठिन हो जाता है। जीव उस बोझ को सम्हाल नहीं पाता। फिर भी जन्म- जन्मान्तरों तक उसे वह गठरी उठाकर चलना पड़ता है जो बहुत कष्टदायी होता है।
मनन करने पर यह पता चलता है कि हमने सारे जीवन में क्या बाँटा? क्या इकट्ठा किया? हम मंजिल तक कैसे पहुँच सकेंगे?
हमारे जीवन का कड़वी सच्चाई यही है कि 60 साल की आयु के बाद कोई बैंक बैलेन्स के विषय में नहीं पूछता है और न ही मँहगी गाड़ियों के बारे में जानना चाहता है। मिलने वाले सभी लोग उससे उसके स्वास्थ्य और बच्चों के बारे में ही जानकारी लेना चाहते हैं।
जीवन के अन्तिम दौर में धन-समृद्धि अथवा गाड़ियाँ सुविधा दे सकती हैं परन्तु वृद्धावस्था के कष्टों को कदापि दूर नहीं कर सकती। उस समय मनुष्य यही प्रार्थना करता है कि बेशक उसकी धन-दौलत ले लो पर उसके बदले सुकून के दो पल दे दो। समय रहते मनुष्य को सावधान हो जाना चाहिए।
'अथर्ववेद' का कथन है-
शतहस्तं समाहार सहस्त्र हस्त संकिर:।
अर्थात् सैंकड़ों हाथों से कमाओ और हजारों हाथों से सद्कार्यों में खर्च करो। यानी यह मन्त्रॉंश कठोर परिश्रम करने, प्रचुर धन कमाने और फिर उसे समाज की भलाई के लिए उदारतापूर्वक व्यय करने का सन्देश देता है।
सार रूप में हम कह सकते हैं कि मनुष्य की वास्तविक कमाई वही है जिसे वह निस्वार्थ रहकर समाज की भलाई के लिए खर्च करता है। यही पुण्य कर्म उसके साथ-साथ अगले जन्मों में भी जाते हैं। इन पुण्यों का भोग वह इहलोक और परलोक दोनों में करता है।
चन्द्र प्रभा सूद
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