शनिवार, 6 जून 2026

बड़े बोल बोलना

बड़े बोल बोलना

बड़े बोल बोलना अर्थात् अपने अहंकार का प्रदर्शन करना कहलाता है। इस मुहावरे का अर्थ करते हुए हम कह सकते हैं घमण्ड में आकर अपनी प्रशंसा करना, डींगें हॉंकना या अपनी क्षमता से बहुत अधिक बढ़-चढ़कर बातें करना। यानी यह अहंकार और शेखी बघारने का संकेत देता है। बड़े बोल बोलने वाले व्यक्ति को इस संसार में कोई भी पसन्द नहीं करता। सभी लोग उससे बचकर निकल जाना चाहते हैं। 
            बड़े बोल को अहंकार की श्रेणी में रखा जाता है। यह अहंकार विष की बेल के समान है। इसके सम्पर्क में आने वाले हर व्यक्ति का विनाश निश्चित है। 
          रहीम जी ने बहुत ही सुन्दर शब्दों में कहा है-
        बड़े बड़ाई न करें और बड़े न बोलें बोल।
       रहीमन हीरा कब कहे लाख टका मेरा मोल।।
अर्थात् मनुष्य को न अपनी प्रशंसा करनी चाहिए और न ही बड़े बोल बोलने चाहिए। यदि ऐसा होता तो बेशकीमती हीरे को भी तो घमण्ड में इतराना चाहिए कि वह बहुत मूल्यवान है। पर वह बेचारा तो किसी से कुछ नहीं कहता। पारखी जौहरी उसका मूल्यांकन करता है, तब उसकी कीमत का अहसास सबको होता है।
            दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं कि यह दोहा हमें सिखाता है कि सच्चे मनीषी लोग अपनी प्रशंसा खुद नहीं करते। लोग उनका गुणगान करते हैं और उनके पीछे-पीछे चलते हैं।
            मनुष्य को अपने रग-रूप, अपने उच्च पद, अपने ज्ञान, अपनी आज्ञाकारी सन्तान अथवा अपने धन-वैभव किसी का भी गर्व नहीं करना चाहिए। ये सब वस्तुऍं आनी-जानी हैं। इस दुनिया में ये स्थायी नहीं हैं। शरीर के नष्ट होने से पहले ही‌ ये मनुष्य का साथ छोड़ देती हैं।
              इसीलिए मनीषी हमें समझाते हैं कि सफलता की ऊँचाइयों को छूकर भी कभी अहंकार नहीं करना चाहिए क्योंकि ढलान हमेशा शिखर से ही शुरु होती है। यदि ऊँचाई को छूने के बाद मनुष्य को जरा-सा धक्का लग जाए तो वह सीधा धरालत पर धड़ाम से गिर पड़ता है। तब उसे सम्हलने में बरसों लग जाते हैं। तब तक दुनिया से विदा लेने का समय करीब आ जाता है।
              इस बात को हम नींबू के उदाहरण द्वारा समझते हैं। नीबू के रस की कुछ बूँदें यदि हजारों लीटर दूध में डाल दी जाए तो वे उस सारे दूध को बर्बाद कर देती है। यानी दूध फट जाता है या खराब हो जाता है। तब किसी भी उपाय से उसको पुरानी स्थिति में वापिस नहीं लाया जा सकता। उस समय उसका दूध के रूप में उपयोग में लाना असम्भव हो जाता है।
            उसी प्रकार अहंकार भी अच्छे-से-अच्छे लोगों को भ्रष्ट कर देता है। वह बन्धु-बान्धवों से उसके प्यार प्रगाढ़ सम्बन्धों को भी बिगाड़ देता है। अपने इस अहंकार की आदत के कारण समय बीतने पर जब वह पीछे मुड़कर देखता है तब स्वयं को निपट अकेला खड़ा पाता है। उस समय उसे अपनों के साथ और सहारे की बहुत ही आवश्यकता होती है।
             हर मनुष्य को  सरल, निष्कपट, सहृदय लोग अच्छे लगते हैं। वे उन लोगों के साथ जुड़ना चाहते हैं जो क्षमाशील हों और हर समय अकड़कर न रहें और दूसरों की भावनाओं को समझें। प्यार का व्यवहार करने से सम्बन्ध लम्बे समय तक साथ चलते हैं। किसी भी गलती के हो जाने की स्थिति में एक-दूसरे से क्षमा याचना करने में उन्हें कोई परहेज नहीं होता। अहंकारी हमेशा दूसरों को उसकी गलती पर जलील करना जानता है। वह केवल सॉरी सुनना पसन्द करता है पर स्वयं सॉरी कहना नहीं चाहता। यदि किसी भी कारण से उसे झुकना पड़ जाए तो उसकी नाक कटने लगती है या उसे अपनी हेठी समझने लगता है।
              अहंकारी व्यक्ति को यह भी पता नहीं चलता कि वह किसी की भावनाओं के साथ खिलवाड़ करके उनके हृदय को घायल कर रहा है। वह अपने झूठे अहं के नशे में चूर, दूसरों पर रौब झाड़ने के लिए बिना सोचे-समझे अन्धाधुन्ध पैसे बर्बाद करने से भी पीछे नहीं हटता। चाहे बाद में उसे कितना ही पश्चाताप क्यों न करना पड़े। इसीलिए विद्वानों का मानना है कि मनुष्य को किसी का भी मजाक सोच-समझ करके उड़ाना चाहिए और अपना पैसा भी व्यर्थ नही गंवाना चाहिए। दोनों ही स्थितियाँ वास्तव में किसी भी मनुष्य के लिए कष्टकारी होती हैं।
           सामान्यतः समाज में बड़े बोल बोलने वालों को नकारात्मक माना जाता है। उन्हें हिकारत की दृष्टि से देखा जाता है और उन्हें ऐसी अहंकारी बातों से बचने के लिए सलाह दी जाती है। मनुष्य को स्वाभिमानी होना चाहिए अहंकारी नहीं। मनुष्य को सदा याद रखना चाहिए कि अहंकार से उसका भला किसी भी प्रकार से नहीं हो सकता।
चन्द्र प्रभा सूद

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