कर्म का फल
कर्म का विधान बहुत कठोर है। उससे कोई बच नहीं सकता। वह किसी को भी नहीं छोड़ता। मनुष्य यदि किसी का बुरा करता है तो वह उसके साथ रहता है और उसका दुष्परिणाम उसे भुगतना पड़ता है। यदि वह अच्छा कार्य करता है तो वह पलटकर उसके ही सामने आता है। तब उसे जीवन में सुख-समृद्धि रूपी फल मिलता है। यानी कि सच्चाई यही है कि बुराई का फल कष्टदायी होता है और उसकी अच्छाई का फल उसे खुशियाँ देता है। इसीलिए मनीषी हमें समझाते हुए कहते हैं-
जैसा बोओगे वैसा काटोगे।
अथवा
जैसा करोगे वैसा भरोगे।
अर्थात् मनुष्य द्वारा की गई अच्छाई या बुराई का परिणाम उसके सामने आ ही जाता है।
इसी विषय को स्पष्ट करती एक बोधकथा है। एक औरत अपने परिवार के लिए प्रतिदिन भोजन पकाती थी। एक रोटी वह किसी भूखे व्यक्ति के लिए पकाकर उसे खिड़की के सहारे रख देती थी। जिसे कोई भी भूखा व्यक्ति वहॉं से ले जाकर अपना पेट भर सकता था।
एक कुबड़ा व्यक्ति प्रतिदिन उस रोटी को ले जाता था। धन्यवाद देने के स्थान पर अपने रस्ते पर चलता हुआ बड़बड़ाता रहता था, "जो तुम बुरा करोगे वह तुम्हारे साथ रहेगा और जो तुम अच्छा करोगे वह तुम तक लौटकर आएगा।"
इस तरह दिन गुजरते गए और ये सिलसिला चलता रहा। वह कुबड़ा व्यक्ति प्रतिदिन रोटी लेकर बड़बड़ाता हुआ चला जाता। वह औरत उसकी इस हरकत से तंग आ गयी थी। वह मन-ही-मन सोचने लगी कि "कितना अजीब व्यक्ति है, एक शब्द धन्यवाद का तो कहता नहीं और न जाने क्या-क्या उल्टा-सीधा बड़बड़ाता रहता है? मतलब क्या है इसका।"
एक दिन क्रोधित होकर उसने निर्णय लिया और बोली, "मैं इस कुबड़े से अब निजात पाकर ही रहूँगी।"
उस दिन उसने रोटी में जहर मिला दिया। जैसे ही उसने रोटी को खिड़की पर रखा, अचानक उसके हाथ काँपने लगे और वह बोली, "हे भगवन, मैं यह क्या करने जा रही थी?"
उसने तुरन्त उस रोटी को चूल्हे की आँच में जला दिया। फिर उसने एक ताजी रोटी बनाई और खिड़की के सहारे रख दी। हर रोज कि तरह वह कुबड़ा आया और रोटी लेकर बड़बड़ाता हुआ चला गया। वह इससे बिलकुल बेखबर था कि आज उस महिला के दिमाग में क्या चल रहा है।
वह महिला खिड़की पर रोटी रखते हुए भगवान से प्रार्थना करने लगी, "हे प्रभु, मेरे पुत्र को सही-सलामत रखना और घर वापिस भेज देना जो अपने उज्ज्वल भविष्य के लिए शहर से बाहर गया हुआ था।"
महीनों से उसकी कोई खबर नहीं मिली थी। ठीक उसी शाम उसका बेटा घर आया। वह कमजोर हो गया था। उसके कपड़े फट गए थे और वह भूख के कारण बेहाल हो गया था।
माँ को देखते ही उसने कहा, "माँ, यह एक चमत्कार ही है कि मैं आज यहाँ हूँ। जब घर से एक मील दूर था तो मैं भूख के कारण गिर गया था। मैं मर गया होता यदि वहाँ से गुजर रहे एक कुबड़े की नजर मुझ पर न पड़ी होती। उसने मुझे अपनी गोद में उठा लिया। भूख के मारे मानो मेरे प्राण निकले जा रहे थे।"
मैंने उससे कहा, "बाबा खाने के लिए कुछ हो तो दे दो।"
उसने नि:संकोच अपनी रोटी मुझे यह कहते हुए दे दी, "मैं हर रोज यही खाता हूँ। आज मुझसे ज्यादा तुम्हें इसकी जरूरत है। बेटा, यह खा लो और अपनी भूख शान्त करो।"
अपने बेटे की यह बात सुनते ही माँ का चेहरा पीला पड़ गया। अपने आप को सँभालने के लिए उसने दरवाजे का सहारा ले लिया। उसके मस्तिष्क में वही बात घूमने लगी कि यदि उसने सुबह जहर मिली हुई रोटी को आग में जलाकर नष्ट नहीं किया होता तो शायद आज उसका बेटा उसी रोटी को खाकर मर जाता?
उस महिला को उन शब्दों का वास्तविक अर्थ समझ आ गया, "जो तुम बुरा करोगे वह तुम्हारे साथ रहेगा और जो तुम अच्छा करोगे तो वह तुम तक लौटकर आएगा।
इस कहानी को पढ़कर यही बात समझ में आती है कि हमेशा अच्छे कर्म करने के लिए तत्पर रहना चाहिए। अच्छा करने से अपने आप को कभी रोकना नहीं चाहिए। चाहे उस समय उस कृत कार्य के लिए आपकी सराहना या प्रशंसा हो अथवा न हो। अपने प्रयासों को यत्नपूर्वक बढ़ाते रहना चाहिए। पता नहीं किस मोड़ पर हमारी बुराई हमसे सर्वस्व छीन ले। इसके विपरीत हमारी अच्छाई हमें बहुत कुछ दे जाए।
चन्द्र प्रभा सूद
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