मनुष्य का विवेक
मनुष्य का विवेक, उसकी समझदारी, उसका अच्छा स्वभाव, उसकी संगति और उसके प्रगाढ़ सम्बन्ध हमेशा साथ निभाते हैं। यद्यपि उसका समय कभी सदा एक-सा नहीं रह पाता, उसकी सत्ता का दबदबा भी हमेशा कायम नहीं रह सकता। उसकी धन-सपत्ति आदि भी सदा उसका साथ नहीं निभा पाते। और तो और उसका अपना यह शरीर भी एक निश्चित समय के बाद अशक्त हो जाने के कारण साथ नहीं दे पाता। समय बीतने के पश्चात वह भी उसका साथ छोड़ देता है।
मनुष्य एक विवेकशील और विचारशील प्राणी है जो उचित-अनुचित और भविष्य के परिणामों को समझने की क्षमता रखता है। यह क्षमता उसे अन्य जीवधारियों से श्रेष्ठ बनाती है और स्वयं के उत्थान या पतन के लिए जिम्मेदार बनाती है। विवेकशीलता का अर्थ है अपनी बुद्धि का सही उपयोग करना, आत्म-नियन्त्रण करना और सोच-समझकर कोई भी निर्णय लेना।
अपने विवेक से, अपनी समझदारी से मनुष्य यदि अपने जीवन का निर्वहण करता है तो यह उसके लिए बड़े सौभाग्य की बात कही जा सकती है। इस प्रकार वह सफल व्यक्ति बनता है। अपने सम्पर्क में आने वालों का मार्गदर्शन करता है।
तनावपूर्ण परिस्थितियों में भी मनुष्य को सही-गलत का निर्णय लेने की क्षमता होनी चाहिए। अपनी गलतियों से सीखना चाहिए और निरन्तर आत्म-चिन्तन करना चाहिए। तात्कालिक सुख के स्थान पर मनुष्य को स्थायी भलाई और भविष्य को प्राथमिकता देनी चाहिए।
अपने अच्छे स्वभाव के कारण वह सबको अपना बना लेता है। उससे कोई भी नाराज नहीं हो सकता। यदि कोई ऐसा करता भी है तो उसके अच्छे स्वभाव के कारण अधिक दिन उससे रूठा नहीं रह सकता। इसी तरह सहृदयता का परिचय देते हुए वह सबको उनकी गलतियों के लिए उन्हें क्षमा कर देता है। इसलिए उसके सम्बन्ध सबके साथ लम्बे समय तक बने रहते हैं।
मनुष्य को सदा यही प्रयास करना चाहिए कि वह यथासम्भव दूसरों की दुआओं अथवा आशीर्वाद को अपने जमा खाते में जोड़ता जाए। कहा जाता है कि दूसरों द्वारा दी गई बददुआओं का असर मनुष्य के जीवन पर अवश्य पड़ता है। यदि अभिशाप का प्रभाव मानव जीवन पर पड़ता है तो दूसरों के मन से निकलने वाले आशीर्वाद भी अपनी छाप छोड़ते हैं। जितने अधिक आशीर्वाद उसे मिलेंगे उतनी ही उसकी कीर्ति चारों दिशाओं में प्रसरित होगी।
सदा याद रखना चाहिए कि धन, दौलत और प्रसिद्धि का कोई भरोसा नहीं कि वे सदा साथ निभाएँगे अथवा नहीं। इसका कारण है कि ये दोनों अपने साथ अनेक बुराइयों को साथ लेकर आते हैं। इनके चंगुल में फंसकर मनुष्य धोखा खाकर अपनी हानि कर बैठता है।
जो मनुष्य इन्हें सम्हाल पाता है या इनके मिलने पर अहंकारी न होकर विनम्र बना रहता है, वही सबका प्रिय भाजन बनता है। उसकी सर्वत्र जय जयकार होती है।
अपनों पर भरोसा करना मनुष्य की बहुत बड़ी पूँजी है। यह यूँ ही नहीं बाँट दी जाती। पहले मनुष्य को स्वयं पर विश्वास करना चाहिए तभी उसे आत्मविश्वास की शक्ति मिलती है। इसके विपरीत दूसरों पर अन्धविश्वास करना उसकी कमजोरी बन जाता है।
मनुष्य को हमेशा याद रखना चाहिए कि जब वह सफलता की ऊँचाइयों को छू रहा होता है तो उसकी सफलता के गुब्बारे में सबसे पहले पिन चुभाने वाला व्यक्ति कोई अपना ही होता है जिस पर वह आँख मूँदकर विश्वास कर रहा होता है। पीठ पर छुरा भौंकने वालों से सावधानी रखना बहुत ही आवश्यक होता है।
हम अपने जीवन में बहुत सारे सपने देखते हैं और उन्हें पूरा करने का भरसक प्रयत्न करते हैं। हमारी जिन्दगी बहुत ही चालाक है, हमें ठगती रहती है। यह हर रोज एक नया कल देने का वादा करके हमारी उम्र छीनती रहती है। इसलिए समय रहते इरादे मजबूत करके अपने देखे हुए सपनों को सच कर लेना चाहिए।
मनुष्य को आत्मोन्नति के लिए सदा सत्संगति में रहना चाहिए और ईश्वर की आराधना करनी चाहिए। ईश्वर की राह पर जब कोई एक कदम बढ़ाता है तो ईश्वर उसे थामने के लिए सौ कदम आगे बढ़ाता है। हम इन्सानों की ही तरह वह मालिक भी अपनी सन्तानों से बहुत प्यार करता है। उनकी परेशानियों के समय उन्हें सहारा देता है।
वह हमेशा चाहता कि उसकी सन्तानें हम मानव शुभ कर्म करें जिससे हमें कष्टों का सामना न करना पड़े। हम मालिक की ऐसी नालायक सन्तानें बन जाते हैं जो इस संसार में आने के बाद अपने सही रास्ते से भटककर गलत मार्ग पर चल पड़ते हैं। तभी कष्टों और परेशानियाँ झेलते हैं।
चन्द्र प्रभा सूद
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