समय को खरीदना असम्भव
इस संसार में कोई भी ऐसा राजा-महाराजा अथवा अमीर व्यक्ति आज तक पैदा नहीं हुआ जो बीते हुए समय को खरीद सकता हो। यदि ऐसा हो जाता तो बड़े-बड़े राजा-महाराजा, चक्रवर्ती सम्राट जिनके पास अकूत धन-सम्पदा थी, वे समय को खरीद लेते और आज हमारे बीच जीवित होते। तब इस धरा पर रत्ती भर जगह पैर रखने के लिए नहीं बचती। परन्तु यह होना असम्भव है। ईश्वर ने रचना ही इस प्रकार की है कि जिसमें कहीं किसी गलती की गुंजाइश ही नहीं है।
सत्य यह है कि विधि के विधान को बदलने की सामर्थ्य किसी भी मनुष्य में नहीं है। जिन्हें हम भगवान मानकर पूजते हैं, वे फिर हमारे पास ही होते। वे अपने नश्वर शरीर को छोड़कर इस दुनिया से विदा नहीं लेते और न ही हमें छोड़कर कोई और जन्म लेते। समय प्रवहमान है, उसे पकड़कर कैद करने की शक्ति किसी व्यक्ति में नहीं है। वह अपनी गति से निरन्तर बढ़ता रहता है। शक्तिशाली रावण को बड़ा अहंकार था कि उसने काल को अपने वश में किया हुआ है। वह भी बच नहीं सका ईश्वरीय न्याय से और इस संसार से विदा हो गया।
इसीलिए मनीषी हमें समझाते हैं कि भूतकाल में जो हो गया उससे शिक्षा लेकर आगे बढ़ो। बन्दरिया जिस तरह अपने मृत बच्चे को चिपकाए हुए घूमती है, उस तरह भूतकाल को अपने साथ चिपककर मनुष्य को नहीं चलना चाहिए। भविष्य के गर्भ में क्या है? हम नहीं जानते, उसे केवल ईश्वर जानता है। इसलिए सब उस पर छोड़कर चिन्ता मुक्त होने का प्रयास करना चाहिए। केवल वर्तमान ही हमारे समक्ष है उसके विषय में ही सोचना चाहिए और उसे संवारना चाहिए। मनीषी हमें समझाते हैं कि -
Time is money. Enjoy the today.
इसी भाव को एक बोधकथा के माध्यम से समझते हैं। एक गिलहरी रोज अपने काम पर समय से आती थी और अपना काम पूर्ण मेहनत तथा ईमानदारी से करती थी। गिलहरी जरूरत से ज्यादा काम करके भी खूब खुश थी क्योंकि उसके मालिक, जंगल के राजा शेर नें उसे कहा था, "वह इसी तरह मन लगाकर काम करती रहेगी तो वह उसे दस बोरी अखरोट देगा।"
गिलहरी जब काम करते-करते थक जाती थी तो सोचती, "बहुत तक गई हूॅं। अब थोड़ा आराम कर लेती हूॅं।"
तभी उसे याद आ जाती थी, "मैं तुम्हें दस बोरी अखरोट दूॅंगा।"
गिलहरी फिर दुगने उत्साह से अपने काम पर जुट जाती थी। वह जब दूसरी गिलहरियों को खेलते-कूदते देखती तो उसकी भी खेलने और मस्ती करने इच्छा होती पर अखरोट याद आते ही पुनः काम पर लग जाती।
शेर कभी-कभी उसे दूसरे शेर के पास भी काम करने के लिये भेज देता था। ऐसा नहीं था कि शेर उसे अखरोट नहीं देना चाहता था, वह बहुत ईमानदार था।
ऐसे ही समय बीतता रहा एक दिन ऐसा भी आया जब शेर ने गिलहरी को दस बोरी अखरोट देकर आजाद कर दिया। गिलहरी अखरोट के पास बैठ कर सोचने लगी कि अब ये सारे अखरोट हमारे किस काम के? पूरी जिन्दगी काम करते-करते दाँत घिस गये, अब इसे खाऊँगी कैसे?
यह कहानी हम सभी के जीवन की भी वास्तविकता बन चुकी है। कभी घर-परिवार और कभी बच्चों के प्रति दायित्वों को पूरा करने में इन्सान मन मारकर सारा जीवन अपनी इच्छाओं का त्याग करता रहता है। सारी जिन्दगी नौकरी करते हुए बिता देता है। मनुष्य जब 60 वर्ष की उम्र में रिटायर होता है तब उसे उसे जीवन भर की कभाई हुई उसकी पूँजी यानी प्रोविडेंट फण्ड आदि मिल जाता है। उस समय उसके पास पैसा और समय दोनों होते हैं पर उसका शरीर अस्वस्थ होने लगता है। इसलिए चाहकर भी वह अपनी इच्छाओं को पूरा नहीं कर पाता।
परिवर्तनशील समय में पीढ़ी बदल जाता है। उह समय परिवार चलाने वाला मुखिया भी बदल जाता है। वह नया जोश से भरा युवा मुखिया कभी इस बात का अनुमान नहीं लगा पाता कि पुराने मुखिया ने इस जमा पूँजी (फण्ड) को पाने के लिए सारा जीवन अपनी कितनी इच्छाओं का दमन किया होगा? कितने कष्टों-परेशानियों का सामना किया होगा? कितने ही अपने सपनों को होम कर दिया होगा?
इस वृद्धावस्था में फण्ड की यह राशि उसे मिल जाती है जिसे पाने के लिए उसने अपनी पूरी जिन्दगी दिन-रात अथक श्रम किया था। डाक्टरों द्वारा बताए गए परहेज के कारण वह उस धन का वैसा आनन्द नहीं उठा पाता जैसा वह जीवन पर्यन्त सोचता रहता था। अपनी इस लाचारी के कारण वह अपना मन मसोसकर कर रह जाता है।
अतः समय कैसा भी हो उसको कोसना नहीं चाहिए। धूप-छाँव तो जीवन का हिस्सा हैं, उस समय के लिए सुरक्षा का उपाय करते हुए अपने साधनों के अनुसार जीवन का भरपूर आनन्द उठाना चाहिए। जिससे अपने जीवन में हार जाने का मलाल न रहे।
चन्द्र प्रभा सूद
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