शुक्रवार, 5 जून 2026

इस हाथ दो और उस हाथ लो

इस हाथ दो और उस हाथ लो

'इस हाथ दो और उस हाथ लो' यह एक सार्वभौमिक नियम है जो हर व्यक्ति पर लागू होता है। इस विषय में किसी भी व्यक्ति के साथ पक्षपात नहीं किया जाता। इस बात को दूसरे शब्दों में हम इस प्रकार भी कह सकते हैं- 
           जैसा बोओगे वैसा काटोगे।
अर्थात् किसान अपने खेतों में जैसे बीज बोता है, उसे वैसी ही फसल मिलती है। उसी प्रकार मनुष्य जैसे कर्म करता है, उसे वैसा ही मीठा या कड़वा फल प्राप्त होता है।
            किसी भी व्यक्ति को यहाँ छूट दिए जाने का कोई प्रावधान नहीं है। बिना किसी पक्षपात के ईश्वर निर्दिष्ट नियमों से ही इस संसार की व्यवस्था चलती है। हर जीव को अपने जीवन में भरपूर अवसर मिलते हैं। यदि उस मौके का वह लाभ उठा लेता है तो सर्वविध सुखों का खजाना उसे प्राप्त हो जाता है। इसके विपरीत आचरण करने वाले मनुष्यों के हिस्से में ‌जीवन पर्यन्त बेशुमार कष्ट और परेशानियाँ आती हैं।
        बहुत वर्षों पहले 1966 की बॉलीवुड फिल्म 'दस लाख' का एक बेहद प्रसिद्ध गीत है।  इसे गीतकार प्रेम धवन ने लिखा था और इसे रवि ने संगीतबद्ध किया था। मोहम्मद रफी और आशा भोंसले ने इस गीत को संजय खान और बबीता के लिए गाया था-
          गरीबों  की सुनो वह  तुम्हारी सुनेगा।
          तुम एक पैसा दोगे वह दस लाख देगा।
इसका यही अर्थ हुआ कि वह मालिक हमारे लिए खजाने लुटाने को तैयार बैठा है। हम अपने को उसके योग्य सिद्ध करेंगे तभी तो वह हमारी झोलियाँ भरेगा। हमें बस अपनी झोली के छेदों को सिलकर उसे मजबूत बनाना है।
          मनुष्य दूसरों से बहुत अपेक्षाएँ रखता है। वह भूल जाता है कि दूसरों से जो वह चाहता है पहले उसे वही दूसरों को देना होता है। तभी तो ईश्वर अनन्त गुणा करके उसे मनुष्य को वापिस लौटा देता है। यदि मनुष्य दूसरों से सेवा करवाना चाहता है तो उसे निस्वार्थ भाव से, बिना पक्षपात के सबकी सेवा करनी होती है। यदि मनुष्य दूसरों से मान की अपेक्षा करता है तो उसे सबको समान रूप से मान देना होगा। यदि मनुष्य दूसरों से यश की कामना करता है तो उसका कर्त्तव्य बनता है कि वह सबको यश दे। यानी सबके साथ यथायोग्य व्यवहार उससे अपेक्षित है।
            इस बात को गाँठ बाँध लेनी चाहिए कि जब शुभकर्म का फल हमारे लिए शुभ होगा तब अशुभकर्म का फल हमारी आशा के सर्वथा विपरीत अशुभ ही होगा। इस अशुभ फल को भोगते समय मनुष्य को नानी याद आ जाती है। कितने भी हाथ-पैर मार लो उससे बचने का कोई भी रास्ता नहीं मिल पिता। इसलिए किसी दूसरे के रास्ते में काँटे बिछाने पर स्वयं के लिए फूलों की अपेक्षा करना अनुचित है। अर्थात् दूसरों को दुख देने पर उसके बदले दुख ही मिलेंगे, सुख कदापि नहीं मिल सकते। किसी का अपमान करने के बदले में मनुष्य को भी अपमान ही सहन करना पड़ता है। उसे प्रशंसा नहीं मिल सकती।
             यदि मनुष्य भ्रष्टाचार, अन्याय, आतंक, रिश्वतखोरी, हेराफेरी, दूसरों का गला काटना आदि समाज विरोधी कार्यों के बीज बोएगा तो अपने जीवन में उसे सुख-शान्ति के पलों की कामना नहीं करनी चाहिए। निश्चित ही ईश्वर का यह सीधा-सा और सरल-सा गणित है। जिससे इस संसार का कोई भी जीव बच नहीं सकता।
             इस संसार में हम अपने आसपास देखते हैं और बन्धु-बान्धवों को परामर्श भी देते हैं। जब किसी व्यक्ति की सन्तान उसकी आशा के विपरीत सामाजिक तौर से नालायक निकल जाती है, अपने दुर्व्यवहार से उसका जीना दूभर कर देती है, समाज विरोधी गतिविधियों में शामिल हो जाती है अथवा धोखे से उसका सब धन, सम्पत्ति या व्यापार हथिया लेती है तब वे माता-पिता उस बच्चे से निराश होकर उससे कानूनी तौर पर सारे रिश्ते समाप्त कर लेते हैं। अर्थात् उसे disown कर देते हैं। इसका अर्थ यह हुआ कि अब उनका वह बच्चा उनके लिए एक अजनबी के समान है, भविष्य में उससे उनका कोई सम्बन्ध नहीं रहा।
             पारस्परिक भौतिक सम्बन्धों में जब ऐसा व्यवहार किया जा सकता है तो फिर सामाजिक सम्बन्धों में भी यह न्याय हो सकता है। सरल भाषा में हम कह सकते हैं कि जैसा व्यवहार अपने लिए मनुष्य को दूसरों से चाहिए होता है, उसे वैसा ही व्यवहार दूसरों के साथ करना चाहिए। इसे हम न्याय कह सकते हैं।
          दूसरों के साथ किया गया अच्छा या बुरा व्यवहार हमारे सामने कर्मफल बनकर आता है। उसे भोगना हमारी मजबूरी होती है, वहॉं हमारी इच्छा या अनिच्छा का कोई मूल्य नहीं होता। वहाँ शार्टकट अथवा बचाव का कोई भी उपाय कारगर सिद्ध नहीं होता। ये कर्मफल जन्म-जन्मान्तरों तक हमारे साथ-साथ चलते रहते हैं, इन्हीं से हमारा इहलोक और परलोक प्रभावित होता है।
चन्द्र प्रभा सूद

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