रूढ़ियों से मुक्ति
आज के वैज्ञानिक युग में हम चाँद-सितारों तक पहुँच गए हैं। भौतिक रूप से भी बहुत उन्नति कर चुके हैं। परन्तु हम अपनी कष्टदायक कुप्रथाओं से मुक्त नहीं हो रहे हैं। हमारे महापुरुषों ने सैकड़ों वर्षों पूर्व बाल विवाह, पर्दा प्रथा, स्त्री शिक्षा, सती प्रथा जैसी सामाजिक और अनेक धार्मिक रूढ़ियों का विरोध किया। आज भी यदा कदा इनकी जानकारी हमें मीडिया से मिलती रहती है। हम हैं कि आज भी हम अपनी कुरीतियों को हृदय से लगाकर रखे हुए हैं। इनका परित्याग हम नहीं कर पा रहे हैं।
निस्सन्देह इन कुरीतियों को छोड़ा जा सकता है, यदि हम इन्हें त्यागने के लिए कटिबद्ध हो जाएँ। हमारे समाज सुधारक राजाराम मोहन राय, स्वामी दयानन्द सरस्वती आदि ने अनेकानेक महापुरुषों ने इन कुरीतियों का कठोरता से विरोध किया था। इसी श्रेणी में भगवान महावीर तथा महात्मा बुद्ध का नाम लेना भी मैं आवश्यक समझती हूँ। हमारा ज्ञान इन महापुरुषों के समक्ष कुछ भी नहीं है। बड़े दुर्भाग्य का विषय है कि इन महापुरुषों के प्रयासों के प्रति हम संवेदनशील नहीं हो रहे हैं।
धार्मिक रुढियों के विषय में मैं केवल इतना ही कहना चाहती हूँ कि हर पक्ष के दो पहलू होते हैं- नकारात्मक और सकारात्मक। यह हम पर निर्भर करता है कि हम क्या चाहते हैं? इनके नकारात्मक नहीं सकारात्मक पक्ष पर हमारा विचार करना बहुत आवश्यक है। यदि हम सकारात्मक रुख अपनाते हैं तो हमारा उत्थान निश्चित होता है। धर्म कभी भी मनुष्य की उन्नति या सफलता में बाधक नहीं बनता। वह तो हमें सत्य का मार्ग दिखाता है।
धर्म को हमें विवाद का विषय नहीं बनाना चाहिए। धर्म मनुष्य का निजी मामला है। प्रत्येक मनुष्य को अपनी ही इच्छानुसार अपने धर्म की अनुपालना का अधिकार है। किसी व्यक्ति को दूसरे के धर्म अथवा पूजा पद्धति पर आलोचना करने का हक समाज व न्याय नहीं देता। यहॉं मैं यह भी कहना चाहती हूॅं कि धर्म स्थलों में किसी व्यक्ति विशेष को प्रवेश न करने देना अथवा पूजा न करने देना, बहुत ही अनुचित कार्य है। इस कुरीति से सभी लोगों को बचना चाहिए।
आज भी यदा-कदा बाल विवाह की घटनाऍं होती रहती हैं। यह कुप्रथा बच्चों के साथ खिलवाड़ करती है। जिस आयु में उन्हें पढ़-लिखकर, योग्य बनना चाहिए, उस आयु में उनका विवाह कर देना बहुत निन्दनीय है। जब तक लड़का धनार्जन करने योग्य न हो जाए, उसे विवाह के बन्धन में बॉंधना किसी भी तरह से उपयुक्त नहीं। ऐसे बच्चे असमय बिमारियों के शिकार बन जाते हैं। बच्चों के भविष्य को देखते हुए माता-पिता को इस कुप्रथा से बच्चों को बचाना चाहिए।
समाज में दहेज प्रथा एक कोढ़ की तरह है। सुरसा के मुॅंह की तरह यह दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही है। धनाढ्यों के लिए अपनी को कुछ भी देना सम्भव है। परन्तु निर्धनों के लिए यह अभिशाप है। देखा-देखी दहेज के लिए मनमानी करने वालों की संख्या में बढ़ोतरी होती जा रही है। भारतीय समाज में इस कुरीति के कारण घरेलू हिंसा के केस बढ़ते जा रहे हैं। इसके कारण कई महिलाओं को अपने जीवन से हाथ धोना पड़ जाता है। इस कुरीति पर भी लगाम लगानी चाहिए। माता-पिता पर दहेज के लिए अनावश्यक दबाव नहीं बनाना चाहिए। वे अपनी बेटी को स्वेच्छा से चाहे जो भी दें।
मनुष्य अच्छाई और बुराई दोनों ही अपने भीतर समेटे हुए है। हमें अपनी बुराइयों को दूर करके अच्छाइयों को अपनाने की कोशिश करनी चाहिए। इसी प्रकार सामाजिक, धार्मिक आदि संस्थाओं में भी स्वार्थी तत्वों के कारण बुराइयाँ अथवा कुरीतियाँ घर करने लगती हैं। हमारा दायित्व बनता है कि उन्हें त्यागकर आने वाली नयी पीढ़ी को साफ-सुधरा आइना दिखाएँ। केवल कानून बना देने से कुरीतियों को मिटाया नहीं जा सकता है। इसके लिए सामाजिक संस्थाओं को भी अपनी भूमिका को निभाने के लिए आगे आना चाहिए।
आप सब कृपया इस बात पर ध्यान दें कि ये सभी नियम भगवान ने नहीं बनाए। हमीं लोगों ने अपनी सुविधा को देखते हुए बनाए हैं। इसलिए हम सबका यह दायित्व बनता है कि हम समाज में फैली हुई दकियानूसी परम्पराओं का परित्याग करते हुए समाज को सही दिशा की ओर आगे ले जाएँ।
चन्द्र प्रभा सूद
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