गुरुवार, 29 मई 2025

बिना प्राण के शरीर मिट्टी

बिना प्राण के शरीर मिट्टी

शरीर प्राण के बिना मिट्टी हो जाता है। इसका कोई मूल्य नहीं रह जाता। जो शरीर कुछ समय पहले जीवन्त होता है, वहीं पलक झपकते निष्प्राण हो जाता है। इसे कुछ समय के लिए भी प्रियजन अपने घर में नहीं रख सकते। सभी यही कहते हैं जल्दी करो अन्यथा इस मृत शरीर से दुर्गन्ध आने लगेगी। जिस शरीर को हम निहारते नहीं थकते, दिन भर सजा-संवार कर रखते हैं, उसे ही पलक झपकते अपने प्रिय से प्रिय बन्धु-बान्धव अग्नि के हवाले कर देते हैं।
            हमारे इन प्राणों को चलाने के लिए ईश्वर ने सारा तामझाम किया है। हमारे शरीर में विद्यमान सभी अंगों-प्रत्यंगों का निर्माण इसी उद्देश्य से किया है। ईश्वर ने हर जोड़ पर एक आटोमेटिक मोटर फिट की हुई है जिनके कारण हम अपने जोडों को हिलाडुला सकते हैं और उन्हें मोड़ सकते हैं। भौतिक मोटरें कुछ समय चलने के उपरान्त जाम हो जाती हैं या खराब हो जाती हैं। उसी प्रकार ईश्वर प्रदत्त ये मोटरें भी कभी-कभी जाम हो जाती हैं या खराब हो जाती हैं। 
          ये सब हमारी गलती से होता है। आप कहेंगे कि ऐसा कैसे हो सकता है? हम क्योंकर परेशान होना चाहेंगे? पर इसका कारण हमारा असंयमित आहार-विहार होता है। हम चटपटा जंक फूड खाना पसन्द करते हैं। सन्तुलित भोजन नहीं हमें बेस्वाद लगता है। इसके अतिरिक्त हमारा जागना, सोना व खाना निश्चित समय पर न होकर अनियमित समय पर होता है। स्वयं पर हम ध्यान नहीं देते, लापरवाही बरतते रहते हैं। इसलिए से हमारा शरीर अस्वस्थ होने लगता है।
            इनके जाम होने पर या टूट जाने की स्थिति में हमें डाक्टरों के पास ईलाज करवाने के लिए चक्कर लगाने पड़ते हैं। अन्धाधुन्ध पैसा खर्च करना पड़ता है। बहुत समय तक फिजीयोथेरेपी करवानी पड़ती है। पूर्णरूपेण स्वस्थ होने में समय लगता है। इस समस्या से आसानी से छुटकारा नहीं मिलता। कभी-कभी तो ये अंग टेढ़े हो जाते हैं या मुड़ जाते हैं। उस स्थिति में मनुष्य को बहुत कष्ट का सामना करना पड़ता है।
          उस समय हम अपने कर्मों को दोष देते हैं या फिर भगवान को कोसते हैं। ऐसा करके अपने-आप को हम सांत्वना तो दे देते हैं पर अपनी आदतों में सुधार लाने के विषय में नहीं सोचते। हाँ, आयु बीतने पर जब वृद्धावस्था आती है तब इनकी कार्यशक्ति क्षीण हो जाती है। आयु बीतने पर शरीर  नया जन्म पाने के लिए मृत्यु की ओर बढ़ता है। जैसे अन्य भौतिक मोटरें भी समय रहते पुरानी होकर चलने में असमर्थ हो जाती हैं व उसे फैंककर नई खरीदनी पड़ती है।
         इन मोटरों के अतिरिक्त हमारे शरीर में ईश्वर ने एक पम्प या टुल्लू पम्प भी फिट किया हुआ है जो हमारे हृदय में लगा हुआ है। वह रक्त प्रवाहित करने का कार्य करता है। इसके ठीक से कार्य न कर पाने की स्थिति में हृदय में अवरोध(blockage) हो जाती है। इससे मनुष्य की साँस फूलने लगता है व बेचैनी होने लगती है। उस समय स्टन्स डालकर इसका उपचार किया जाता है। ईश्वर न करे यदि heart attack हो जाए तो प्राण घातक भी हो सकता है।
       इस हृदय का उपचार करवाने में लाखों रूपये व्यय करने पड़ते हैं। उस समय डाक्टरों के परामर्श पर खानपान में जबरदस्ती सुधार करना पड़ता है। तब सादा भोजन खाना पड़ता है। सभी जंक फूड मन मारकर त्यागने पड़ते हैं। यदि समय रहते स्वेच्छा से हम अपनी आदतों में सुधार कर लें तो समय और परिश्रम से कमाए गए गए धन की बर्बादी नहीं होगी। यह सत्य है कि आयु पर्यन्त औषधियों का गुलाम बनकर हमें जीवन जीने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी। 
          यह हमारे ऊपर अब यह निर्भर करता है कि हम कैसा जीवन जीना चाहते हैं? रोगी  रहकर खाने-पीने से लाचार होकर जीना चाहते हैं या स्वस्थ रहकर सुख-शान्ति से जीवन व्यतीत करना चाहते हैं। मेरे विचार में सभी लोगों को स्वस्थ रहना ही अधिक उपयुक्त प्रतीत होगा। इसीलिए महाकवि कालिदास ने कहा है- 
            शरीरमाद्यं खलु धर्मसाधनम्।
अर्थात् स्वस्थ शरीर धर्म के पालन के लिए सबसे पहला साधन है।
          शरीर स्वस्थ होगा तभी हम अपने धर्म या कर्त्तव्य का पालन कर सकते हैं। शरीर के रोगी होने पर मनुष्य स्वयं के कार्य करने के लिए लाचार हो जाता है। उस अवस्था में औरों के लिए वह कुछ भी नहीं कर सकता। जब तक जीवन है तब तक हमें स्वस्थ रहने का यथासम्भव प्रयास करना चाहिए। अपने शरीर को स्वस्थ रखने के लिए हमें उचित आहार-विहार के नियमों का पालन करना चाहिए। वास्तव में नीरोगी काया मनुष्य के लिए ईश्वर का वरदान है।
चन्द्र प्रभा सूद 

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