बुधवार, 14 मई 2025

सम्बन्धों में पारदर्शिता होना आवश्यक

सम्बन्धों में पारदर्शिता होना आवश्यक 

पति-पत्नी के सम्बन्धों में पारदर्शिता का होना बहुत आवश्यक होता है। तभी घर-गृहस्थी सुचारु रूप से चल पाती है। पत्नी को हमारा भारतीय समाज गृहलक्ष्मी मानता है। उसका मान-सम्मान बनाए रखना घर के सदस्यों का , खासकर पति का कर्तव्य होता है। हमारे यहॉं सामाजिक ढॉंचा इस प्रकार से बना हुआ है कि पति धनार्जन करें और पत्नी घर की व्यवस्था कुशलतापूर्वक करे। आज स्थितियों में बहुत परिवर्तन हो गया है। स्त्रियॉं भी पढ़-लिखकर, घर से बाहर निकलकर कमाने लगी हैं। घर और नौकरी दोनों मोर्चों को अपनी सूझबूझ से सफलतापूर्वक निभा रही है।
          यह सत्य है कि स्त्री ने जब बेटी बनकर पिता से प्यार किया तो दुनिया ने उसे 'आदर्श बेटी' कहकर सम्बोधित किया। जब उसने अपने भाई से प्यार किया तो उसे 'प्यारी बहना' कहकर पुकारा गया। सबसे बढ़कर जब उसने अपने पति से प्यार किया तो उसे 'संस्कारी बहू' या 'पतिव्रता स्त्री' का दर्जा दिया गया। अपने बेटे से जब स्त्री ने प्यार किया तो उसे 'ममता की मूरत' कहा गया। इस सत्य से इन्कार नहीं कर सकते है कि घर-परिवार या समाज में स्त्री के लिए एक पुरुष सिर्फ पति, पिता, भाई या बेटा ही हो सकता है।
           इसके विपरीत इन रिश्तों को त्यागकर स्त्री ने जब-जब सिर्फ एक पुरुष से विवाहेत्तर सम्बन्ध बनाए तो इस संसार ने उसे 'चरित्रहीन' कहकर तिरस्कृत किया। इसी प्रकार जब पुरुष ने एक स्त्री के साथ विवाहेतर सम्बन्ध बनाए तो उसे भी समाज ने अपमानित किया। पुरुष है ऐसा कहकर समाज ने उसका बचाव नहीं किया। अब प्रश्न यह उठता है कि क्या एक स्त्री व एक पुरुष अच्छे दोस्त नहीं हो सकते?
          यह प्रश्न यदि लोगों से पूछा जाए तो इसके उत्तर में कुछ लोग नकारात्मक बातें कह सकते हैं और कुछ लोग सकारात्मक उत्तर दे सकते हैं। जब भगवान श्री राम, लक्ष्मण और माता सीता के साथ वनवास काटने के लिए जा रहे थे तब वे सब रास्ते में आने वाले ऋषि अत्रि के आश्रम में उनसे मिलने के लिए जाते हैं। वहाँ पर  सीता जी गुरु माँ अनुसुया से मिलती हैं। ऋषि पत्नी अनसुया ने भगवती सीता को पतिव्रत धर्म का ज्ञान देती हैं। रामायण में माता अनुसूइया जी के द्वारा भगवती सीता को दिए गए उपदेश आज भी स्त्री-पुरुष सम्बन्धों पर आज भी सटीक है।
          आशा है मेरे विचारों से आप सब भी सहमत होंगे। हमारे भारतीय परिवेश में स्त्री-पुरुष की मित्रता वाले सम्बन्ध कतई मान्य नहीं हैं। वैसे यह बताएँ कि विवाहोपरान्त क्या कोई स्त्री अपने पति के किसी अन्य महिला के साथ मित्रता स्वीकार कर सकती है? अथवा पुरुष अपनी पत्नी के किसी अन्य पुरुष से मित्रता स्वीकार कर सकते हैं? आप स्वयं ही इस प्रश्न का उत्तर बिना किसी पूर्वाग्रह के ढूॅंढे। इसी प्रकार विवाह पूर्व किसी पक्ष के ऐसे सम्बन्ध भी दोनों में से किसी को मान्य नहीं होते। बल्कि ऐसे विवाहेतर सम्बन्ध परिवारों के टूटने का कारण बनते हैं। 
          यह एक बहुत गम्भीर प्रश्न है। इस पर गहराई से विचार करने की आवश्यकता है। स्त्री-पुरुष का सम्बन्ध घी और आग के संयोग की तरह माना जाता है। आज समाज में कुछ युवाओं के द्वारा लिव इन में रहने का प्रचलन बढ़ने लगा है। इसे हम युवाओं में पनपने वाली पलायन की प्रवृत्ति कह सकते हैं। इसका उद्देश्य केवल मौज-मस्ती करना होता है। अपनी जिम्मेदारियों से भागना होता है। यदि एक साथी से मन भर जाए तो किसी दूसरे से सम्बन्ध बना लो। यह सब कब तक चलेगा?
          केवल मात्र पति-पत्नी का ही एक ऐसा सम्बन्ध है जहाँ एक-दूसरे की बेवफाई सहन नहीं की जा सकती। किसी एक के भी विपरीत आचरण पर खून तक कर दिया जाता है। इसके अतिरिक्त परेशान होकर दोनों में से किसी एक पक्ष के द्वारा आत्महत्या तक कर ली जाती है। पारिवारिक विघटन के फलस्वरूप तलाक लेने वालों की संख्या में भी बढ़ोत्तरी होने लगी है। इसका परिणाम उन मासूम बच्चों को भुगतना पड़ता है जिनका कोई दोष नहीं होता है।
           यह सार्वभौमिक सत्य है कि विवाह विच्छेद होने अथवा तलाक का प्रमुख कारण एक साथी का दूसरे के प्रति विश्वास तोड़ना होता है। साथी कहिए या मित्र एक-दूसरे के प्रति जहाँ भी वफादार नहीं होते वहाँ अलगाव की स्थिति बन ही जाती है। हमारे भारत में ही नहीं अपितु पूरे विश्व में स्त्री-पुरुष सम्बन्धों की कमोबेश यही स्थिति है। पति-पत्नी का यह रिश्ता नाजुक डोर से बॅंधा होता है। इसका यही कारण है कि इन दोनों में रक्त सम्बन्ध नहीं होता। इन दोनों में प्यार और विश्वास का सम्बन्ध होता है। इसलिए इस सम्बन्ध में पारदर्शिता का होना बहुत आवश्यक है।
चन्द्र प्रभा सूद 

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