धन का सदुपयोग कीजिए
आयुपर्यन्त भागदौड़ करके बहुत ही परिश्रम से हम अपने जीवन में धन कमाते हैं। उसका अर्जन करने के लिए दिन-रात की परवाह किए बिना कोल्हू के बैल की तरह जुटे रहते हैं। धन जीवन में बहुत ही अनिवार्य है। उसके बिना हम जीवन की कल्पना भी नहीं कर सकते। खन पसीने से कमाए उस धन का सदुपयोग करते हुए हम अपने सभी पारिवारिक, धार्मिक तथा सामाजिक दायित्वों को निभाते हैं। बच्चों को समाज में उनका उचित स्थान दिलाने के लिए भरसक यत्न करते हैं। हम अपने उद्देश्यों में बहुत सीमा तक सफल भी होते हैं।
अपनी सारी जिम्मेदारियों को निभाते हुए हम भारतीय यह कदापि नहीं भूलते कि धूप-छाँव या अपने अच्छे-बुरे समय के लिए थोड़ा धन बचाकर रखना आवश्यक होता है। इससे भी बढ़कर हम यह चाहते हैं कि सुखमय वृद्धावस्था के लिए भी हमारे पास कुछ धन सुरक्षित रहे जिससे कभी पराश्रित न होना पड़े। अपनी दैनन्दिन आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए किसी का मुँह न ताकना पड़े या फिर बच्चों के समक्ष भी हाथ न फैलाना पड़े। ईश्वर की कृपा से अपने सिर पर छत भी बनी रहनी चाहिए।
हमारी भारतीय विचारधारा बहुत गहराई से जीवन के हर मोड़ पर हमारा मार्ग प्रशस्त करती है। यही कारण है कि क्रोना काल में जिस समय पूरा विश्व मन्दी के दौर से गुजर रहा था, उस समय अमेरिका जैसे वैभवशाली देश के कई बैंक डूब गए थे। हमारे देश में चाहे गरीबी का प्रतिशत अधिक है फिर भी हमारी अर्थ व्यवस्था चरमराई नहीं। थोड़ी परेशानी तो अवश्य हुई पर देश मन्दी में भी उभर गया था। उसका एक ही कारण था देशवासियों की छोटी-बड़ी बचतें जो लोग अपनी-अपनी सामर्थ्य के अनुसार करते रहते हैं।
इस बचत अभियान की बदौतल ही हम अपने आपको सुरक्षित महसूस करते हैं। यद्यपि कुछ लोग चमड़ी जाए पर दमड़ी न जाए वाली सोच वाले भी होते हैं। वे खाने-पहनने यानी हर जगह कंजूसी करते हुए बस जोड़ने में ही लगे रहते हैं। यह प्रवृत्ति घर-परिवार के लिए घातक होती है। आयुपर्यन्त परिवारी जन अभावों में जीने के लिए विवश होते हैं। परन्तु जब ऐसे व्यक्ति की मृत्यु के उपरान्त बच्चों को अनायास ही इतना अधिक धन मिल जाता है। तब प्रायः वे उस धन को सम्हाल नहीं पाते। उसको दुरुपयोग करने लगते हैं।
कुछ लोग चोरी-डकैती, भ्रष्टाचार, दुराचार, नीति-अनीति का मार्ग अपनाकर दूसरों का गला काटकर भी धन बटोरने की जुगत करते रहते हैं। हर प्रकार के टैक्स की चोरी से भी बाज नहीं आते। वे बड़े अहंकार से कहते हैं कि हमने अपनी आने वाली पॉंच पीढ़ियों की सुरक्षा का प्रबन्ध कर लिया है। परन्तु वे भूल जाते हैं-
पूत कपूत तो का धन संचै
पूत सपूत तो का धन संचै।
अर्थात् यदि सन्तान योग्य होगी तो हमसे भी अधिक कमा लेगी और यदि नालायक निकली तो सब बर्बाद कर देगी। इसलिए जो सच्चाई व ईमानदारी से कमाया जाए अर्थात् जो सात्विक कमाई होती है बरकत उसी में होती है।
धन कमाकर हम धन-सम्पत्ति बढ़ाते जाते हैं। भौतिक पदार्थों यानी घर, गाड़ी, वस्त्र, जूते-चप्पल, पर्स और ऐशोआराम के सभी साधन हम जुटाने में लगे रहते हैं जिन सबका उपभोग भी हम अपने जीवन काल में नहीं कर पाते। हमारी मृत्यु के पश्चात सब कुछ यहीं रह जाता है। हमारा वह जमा धन जिसकी जानकारी पत्नी-बच्चों को हो तो ठीक रहता है, नहीं तो बैंक में ही पड़ा रहता है। जब तक जीवित रहते हैं तब तक हमें लगता है कि हमारे पास जो पैसा है वह कम है और उसे बढ़ाने के चक्कर में कोल्हू का बैल बन जाते हैं।
धन से हम भौतिक पदार्थ- कपडे़, जेवर, जूते, धन-सम्पत्ति, ठाठबाट, गाड़ी, नौकर-चाकर आदि जुटा सकते हैं परन्तु अपने लिए हम अच्छा स्वास्थ्य, प्रसन्नता, रिश्ते-नाते आदि नहीं खरीद सकते। जीते जी इन सबकी ओर भी ध्यान देना आवश्यक होता है अन्यथा अन्त समय में मन में बस मलाल रह जाता है। धन जीवन जीने के लिए बहुत आवश्यक है पर वह सब कुछ नहीं है। उससे से हम बहुत कुछ खरीद कर सकते हैं पर उसे अपने सिर पर सवार नहीं होने देना चाहिए। रावण की तरह अहंकार को अपने पास भी नहीं फटकने देना चाहिए। तभी सही मायने में हम अपने जीवन का आनन्द ले सकते हैं।
चन्द्र प्रभा सूद
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें