गुरुवार, 22 मई 2025

रिश्ते ईश्वर की ओर से उपहार

रिश्ते ईश्वर की ओर से उपहार 

अपने रिश्तों का चुनाव हम नहीं करते बल्कि वे हमारे कर्मों के अनुसार ईश्वर की ओर से बनाकर भेजे जाते हैं जबकि अपने मित्रों का चुनाव हम स्वयं करते हैं। ये रिश्ते जितना हमारा सम्बल बनते हैं उतने ही नाजुक भी होते हैं। बड़ी सूझबूझ से इन रिश्तों को निभाना होता है। जरा-सी लापरवाही होने पर इनमें दरार आने लगती है। रिश्तों के विषय में कहा जाता है कि वे कच्चे धागों से बॅंधे होते हैं। कितने सुन्दर शब्दों में इसी भाव को निम्नलिखित दोहे में समझाया है-
         रूठे सुजन मनाइए जो रूठें सौ बार।
        रहीमन फिर फिर पोहिए टूटे मुक्ताहार॥
अर्थात् रहीम जी कहते हैं कि यदि अपने प्रियजन किसी कारण से रूठ जाऍं तो उन्हें बार-बार मनाना चाहिए। जैसे मोतियों की माला टूट जाती है तो उसे हम बार-बार पिरोते हैं।
        इन रिश्तों में पारदर्शिता होनी बहुत आवश्यक है। इस बात से इन्कार नहीं किया जा सकता कि सभी रिश्ते अपने-आप में बहुत महत्त्वपूर्ण होते हैं। सबके साथ समानता का व्यवहार करना चाहिए। तभी सभी नाजुक रिश्ते बने रहते हैं। किसी रिश्ते को को अधिक महत्त्व देना और किसी रिश्ते का त्याग करना उचित नहीं होता क्योंकि मनुष्य अपने भाई-बन्धुओं से ही समाज में सुशोभित होता है। सभी सुख-दुख भी अपने बन्धु-बान्धवों के साथ ही मिलजुल कर ही काटे जाते हैं।
        आज भौतिक युग में धन को बहुत अधिक अधिक महत्त्व दिया जाने लगा है। अपने नजदीकी रिश्तों को भी स्वार्थ के तराजू में तोला जाने का रिवाज बनता जा रहा है। जब तक स्वार्थों की पूर्ति होती रहती है तब तक सम्बन्ध बने रहते हैं। ऐसे सम्बन्ध लम्बे समय तक नहीं चला करते। स्वार्थ के पूर्ण होते ही रिश्तों आपसी सौहार्द प्रायः समाप्त हो जाता है। ऐसे सम्बन्ध स्वस्थ रिश्तों के लिए घातक होते हैं। 
            धन-सम्पत्ति आजकल बहुधा झगड़े का कारण बनती जा रही है। परिवारों में उसके बटवारे को लेकर कोर्ट-कचहरी तक में जाने में भी लोग हिचकिचाते नहीं हैं। इस कारण परिवारी जन एक-दूसरे का चेहरा तक नहीं देखना चाहते। वहाँ सम्बन्धों का कोई मूल्य नहीं रह जाता। 
         बड़ा आश्चर्य होता है कि यह देखकर कि लोग दूसरों से दोस्ती गाँठते हैं, उनके साथ सम्बन्ध बनाते हैं पर अपने भाई-बहनों से बात करके राजी नहीं होते। उनका चेहरा तक नहीं देखना चाहते। बाद में चाहे वे तथाकथित मित्र उन्हें धोखा दे जाएँ। उस समय वे उन्हें कोसते हैं पर कुछ कर नहीं पाते। उस समय वही कहावत सिद्ध होती है-
           अब पछताए होत क्या 
         जब चिड़िया चुग गई खेत।
        होना तो यह चाहिए कि अपने घर-परिवार में यदि कोई भाई-बहन पैसे से कमजोर है तो उसकी सहायता करनी चाहिए। परन्तु लोग उससे किनारा करना चाहते हैं। वे उससे बातचीत तक रखना नहीं चाहते। उससे यथासम्भव दूरी बनाए रखने में अपनी महानता समझते हैं। मनुष्य भूल जाते हैं कि लक्ष्मी किसी की सगी नहीं है। वह कहीं पर स्थायी होकर नहीं रहती। पता नहीं जीवन के किस मोड़ पर किसी सम्बन्धी की उन्हें आवश्यकता पड़ जाए, कोई नहीं कह सकता।
        वे सोचते हैं कि पैसे के बल पर दुनिया खरीद लेंगे पर भूल जाते हैं कि रिश्ते-नाते पैसे से नहीं खरीदे जाते। यह पूँजी ईश्वर ने हमें दी है इसे सहेज कर रखना हमारा दायित्व है। जीवन ऐसा समय अवश्य आता है जब अपनों के साथ की बहुत आवश्यकता होती है। जो लोग रिश्तों का मूल्य समझते हैं वे प्रसन्नता पूर्वक उस समय अपनों के साथ का आनन्द उठाते हैं और दूसरे पछताते हैं कि काश कोई अपना होता। जब अपनों को पराया करते हैं उस समय नहीं सोचते कि कभी उनके बिना जीवन व्यतीत करना कठिन हो जाएगा। रहीम जी ने बड़े सुन्दर शब्दों में कहा है-
       रहीमन धागा प्रेम का मत तोड़ो चटकाए।
       जोड़े से फिर न जुड़े जुड़े गांठ पड़ी जाए॥
अर्थात् रहीम जी कहते हैं कि प्रेम के धागे को मत छोड़ो। उसे यदि जोड़ने का प्रयास करेंगे तो वह पहले की भॉंति नहीं जुड़ सकते, उनमें एक गॉंठ बन जाती है।
        अपने प्रिय जनों से बिछुड़ने का दंश झेलना बहुत कठिन होता है। यह तो कोई भुक्तभोगी ही समझा सकता है। हमारे बड़े-बजुर्ग बहुत अच्छी बात कहा करते थे- 
       अपना मारेगा तो भी छाया में फैंकेगा
अर्थात् जो दर्द अपनों को होता है वह दूसरों को नहीं होता। अपना कोई यदि मारेगा भी तो छाया में ही फेंकेगा।
        यथासम्भव रिश्तों की मिठास बनाए रखने का यत्न करें। अपने तो अपने ही होते हैं। पराए मुखौटा लगाकर अपने हो सकते हैं पर वे अपने बन नहीं सकते। इसलिए उन्हें स्वयं से दूर न करिए। थोड़ा झुककर भी साथ निभाना पड़े तो उसे अन्यथा न सोचें। ईश्वर भी उन्हीं लोगों से प्रसन्न होता है जो उसके द्वारा बनाए गए सम्बन्धों को सद् भावना से निभाते हैं।
चन्द्र प्रभा सूद 

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें