बुधवार, 23 जुलाई 2025

बत्तीस दॉंतों में जीभ

बत्तीस दाँतों में जीभ

बत्तीस दाँतों के मध्य हमारी जीभ सुरक्षित रहती है। इसका कारण है कि दाँत कठोर होते हैं। जब ये निकलते हैं तो भी परेशान करते हैं और जब हमसे विदा लेते हैं तब भी कष्ट देते हैं। कितनी ही कठोर वस्तु क्यों न हो, उसे ये दाँत पल भर में चूरा कर देते हैं। इसी कठोरता के कारण सुख के साथ-साथ दुख का कारण भी बनते हैं। अपने इस कठोर व्यवहार के कारण ये किसी प्रकार का समझौता नहीं कर पाते। तभी आयुपर्यन्त साथ नहीं निभाते बल्कि बीच में ही साथ छोड़कर विदा ले लेते हैं।
             ये सदा ही अकड़कर रहते हैं। झुकना इनके स्वभाव में नहीं है। यह तो ईश्वरीय नियम है कि किसी का भी घमण्ड स्वीकार्य नहीं होता। महाविद्वान रावण का अहंकार हो या भगवान कृष्ण के मामा कंस का हो या अपने को स्वयंभू भगवान मानने वाले हिरण्यकश्यप का अहं हो, सभी नष्ट हो जाते हैं। इतिहास साक्षी है कि बड़े-बड़े साम्राज्य तक अपनी गर्वोक्तियों के कारण नष्ट हो गए। उनके बारे में मात्र जानकारी ही मिलती है।
              मुँह में रहने वाली यह जीभ लचकदार है इसीलिए समझौता कर लेती और मृत्यु तक मनुष्य का साथ निभाती है। परन्तु यह है तो चमड़े की जो समय-असमय अनायास ही फिसल जाती है और फिर इसका खामियाजा मनुष्य को कभी-कभी तो आयुपर्यन्त भुगतना पड़ता है। इसका प्रत्यक्ष उदाहरण हमारे सामने है महाभारतकालीन युद्ध का। द्रौपदी यदि दुर्योधन को कठोर शब्दों से आहत न करती तो शायद उस महाविनाश से बचा जा सकता था। उसमें हुए नुकसान को हमारा देश शताब्दियों बाद भी आज तक भुगत रहा है।
              इसीलिए हमारे बड़े-बजुर्ग कहा करते हैं- 'यह जीभ राज कराती है, नहीं तो मिट्टी में मिला देती है।' मुझे यह सब बताने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि आप सभी  सुधी जन जानते हैं कि इतिहास भरा पड़ा है ऐसे उदाहरणों से।
              यह जीभ बड़ी ही चटोरी है। यह एक ऐसी इन्द्रिय है जिसको वश में करना बहुत आवश्यक है। परन्तु हम सभी इसके चटोरेपन के झॉंसे में आ जाते हैं। यह जब तब हमें स्वादिष्ट व्यंजनों के लिए ललचाती रहती है। जहाँ पर चटपटा व्यंजन देखा इसकी लार टपकने लगती है। इसकी इसी बुरी आदत के कारण ही बहुधा मनुष्य को मुसीबतों का सामना करना पड़ता है। आप सभी यही प्रश्न करेंगे कि यह कैसी बात कह रही हो? यह कैसे सम्भव हो सकता है? 
            इसके उत्तर में यही कह सकती हूँ कि हर खाद्य पदार्थ हर व्यक्ति को सूट नहीं करता। कई अपरिहार्य कारणों से हमें किन्हीं खाद्यान्नों को खाने के लिए डाक्टर मना करते हैं पर यह हमारी जीभ माने तब न। हमें ललचाती रहती है और हम उन को खाकर और अधिक बीमार व लाचार हो जाते हैं। जब रोग बढ़ता है तब पछताते हैं कि काश समय रहते गलत खानपान से परहेज करते तो स्वस्थ रहते। डाक्टरों के पास जाकर पैसा व समय बरबाद न करते।
              सादा भोजन खाने के बजाय चटपटा भोजन चटखारे ले-लेकर खाना इसका स्वभाव है। इसके चटोरेपन को शान्त करने के लिए मनुष्य अथक प्रयास करता रहता है। आजकल जंक फूड का फैशन बन गया है। यह जंक फूड खाने में बहुत स्वादिष्ट होता है। सबसे बढ़ी बात यह है कि खाना पकाने के लिए रसोई में पसीना नहीं बहाना पड़ता।इसका प्रचलन बढ़ता जा रहा है। यह घर के सादे और सुपाच्य भोजन की अपेक्षा अधिक स्वादिष्ट होता है। इसे कभी-कभार तो खाना ठीक है। परन्तु इसे अपनी आदत बना लेना सर्वथा अनुचित है। यह जंक फूड खाकर हम अनजाने में ही रोगों को न्योता दे बैठते हैं। 
             मनुष्य सारे पाप-पुण्य इसी जीभ के स्वाद के कारण ही करता रहता है। चोरी-डकैती, भ्रष्टाचार कालाबाजारी और किसी का गला काटना आदि कुकर्म करने से यह मनुष्य स्वयं को रोक नहीं पाता। इसका अन्त विनाशकारी होता है। जहॉं तक हो सके हमें इन दुष्कर्मों से बचना चाहिए। अपने जीवन को सच्चाई के मार्ग पर चलना चाहिए। ताकि जीवन के अन्तकाल में पश्चाताप करने अथवा क्षमा याचना करने की आवश्यकता ही न पड़े।
               हमें यथासम्भव दाँतों की तरह कठोर न बनकर फलदार वृक्ष की तरह झुकने की प्रवृत्ति वाला बनना चाहिए। तभी हम अधिक समय तक सरवाइव कर सकते हैं। हमें जीभ की तरह नरम व लचीला होना चाहिए ताकि जीवन भर साथ निभा सकें। जीभ उ पट्टकी तरह लालची या स्वाद का गुलाम नहीं बनना चाहिए। इससे मनुष्य जीवन में हम अनचाहे ही दुखों-परेशानियों को बुलावा या न्यौता दे देते हैं।
चन्द्र प्रभा सूद 

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