मंगलवार, 8 जुलाई 2025

विवेक को हरता शत्रु क्रोध

विवेक को हरता शत्रु क्रोध 

अपने अन्तस में विराजमान शत्रुओं से हमारी गहरी छनती है। उनको पुष्ट करने में हम इतने मस्त रहते हैं कि सारी दुनिया को आग लगाने को तैयार रहते हैं। मैं और मेरा अहं दोनों ही बस तुष्ट होते रहें बाकी किसी से कोई मतलब हम नहीं रखना चाहते। हालॉंकि यह स्थिति बहुत विकट है। हमें यथासम्भव इससे बचना चाहिए।
          इन शत्रुओं में क्रोध प्रमुख है। इसके बारे में शास्त्र कहता है-
        क्रोधो मूलमनर्थानां क्रोध: संसारबन्धनम्।
       धर्मक्षयकर: क्रोध: तस्मात् क्रोधं विवर्जयेत्॥अर्थात् क्रोध सभी बुराइयों की जड़ है। संसार में बन्धन कारण है, धर्म का नाश करने वाला है। अतः इसका त्याग करना चाहिए।
             वास्तव में क्रोध हमारा बहुत बड़ा शत्रु है। यह विवेक यानी हमारी सोचने-समझने की शक्ति को नष्ट करता है। आम भाषा में हम कहते हैं कि क्रोध में इन्सान पागल हो जाता है। ऐसे क्रोधी व्यक्ति को कोई भी पसन्द नहीं करता।  उसे पता ही नहीं चलता कि क्रोध में वह क्या कह जाता है। उस समय उसे छोटे-बड़े का भी ध्यान नहीं रहता। कोई भी व्यक्ति अपना अपमान करवाना नहीं चाहता।सभी उससे किनारा करने में ही अपनी भलाई समझते हैं।
             सहन शक्ति से क्रोध जब परे हो जाता है तब मनुष्य जानवर की तरह व्यवहार करने लगता है। वह उस समय हत्या या आत्महत्या जैसे जघन्य अपराध भी कर बैठता है। हत्या जैसे अपराध की सजा अकेला वह नहीं भोगता बल्कि उसका निरपराध परिवार भी इस कष्ट का भागीदार बनता है। इसका पश्चाताप उसे मृत्यु पर्यन्त ही करना पड़ता है। आत्महत्या करके वह तो मुक्त हो जाता है पर अपनों का जीवन दुरुह कर देता है।
               यहॉं हम महर्षि परशुराम जी का उदाहरण लेते हैं। वे बहुत विद्वान एवं शक्तिशाली थे परन्तु फिर भी उन्हें समाज में यथोचित स्थान नहीं मिल सका। कारण था उनका अति क्रोधी होना। पौराणिक कथाओं के अनुसार भगवान परशुराम ने 21 बार क्षत्रियों का संहार किया था। यह घटना हैहय वंश के राजा सहस्रार्जुन द्वारा परशुराम के पिता, जमदग्नि मुनि की हत्या के प्रतिशोध में हुई थी। उन्होंने इतने वर्ष संघर्ष किया, महर्षि वसिष्ठ से महर्षि शब्द सुनने के लिए।
              रामायण में राजा जनक के दरबार में भगवान राम के द्वारा प्रत्यंचा चढ़ाते समय शिव धनुष के टूटने पर लक्षमण और परशुराम का संवाद हम सबको याद है। ऋषि दुर्वासा का नाम यदि आज भी किसी प्रसंग में आ जाए तो लोगों के मन में उनके प्रति श्रद्धा का भाव नहीं जागता।
            ऐसे क्रोधी को कोई भी पसन्द नहीं करता। सभी उससे किनारा करने में ही अपनी भलाई मानते हैं और यही सोचते हैं कि बर्र के छत्ते में कौन हाथ डाले? लोग उससे बात करने या सन्बन्ध रखना नहीं चाहते उससे किनारा ही करना चाहते हैं। ऐसे लोगों के साथ दोस्ती केवल स्वार्थ के कारण होती है। जब तक स्वार्थों की पूर्ति होती रहती है तब तक मित्रता बनी रहती है। उसके पश्चात सभी अपने-अपने रास्ते चले जाते हैं। एक-दूसरे को वे लोग पहचानने से भी इन्कार कर देते हैं।
             जितना अधिक इस शत्रु को गले लगाएँगे उतना ही घर, परिवार, मित्रों व समाज से कटकर रह जाएँगे। सामने मुँह पर हमारे लिए शायद कोई भी प्रतिक्रिया न करे पर पीठ पीछे हमारा उपहास करेंगे। और तो और उनके परिवार जन भी उनकी इस आदत से परेशान रहते हैं। वे इसी यत्न में लगे रहते हैं कि किसी भी प्रकार से उनका यह क्रोधी स्वभाव शान्त स्वभाव में बदल जाए। ऐसे व्यक्ति को न उसका जीवनसाथी और न ही उसके बच्चे प्यार करते हैं। वे बस स्वार्थवश ही उनसे सम्बन्ध रखते हैं। वे उसके सामने पढ़ने से भी कतराते हैं। पता नहीं किस बात पर उनकी शामत आ जाए। जब बच्चे अपने पैरों पर खड़े हो जाते हैं तब उन्हें पूछना ही नहीं चाहते। इससे बढ़कर और  उनका दुर्भाग्य क्या होगा?
            क्रोधी व्यक्ति को यह ज्ञात ही नहीं होता कि वह अपना स्वयं का कितना नुकसान करता है यानी कि अपने पैर पर खुद कुल्हाड़ी मारता है। अति हर चीज की बुरी होती है। अधिक क्रोध करने से मन अशान्त होता है व बेचैनी रहती है। मनुष्य अतिक्रोध की स्थिति में अपना आपा खो देता है। बड़े-बजुर्ग कहा करते थे कि गुस्सा करने से इन्सान का अपना खून जलता है। मन अशान्त होगा तो पक्की बात है तन भी अस्वस्थ होगा। तन और मन के रोगी होने से हानि ही हानि होगी। क्रोध करने वाले से जब लोग किनारा करते हैं तो वह इसे सहन नहीं कर पाता। ऐसे हालत में मनुष्य मानसिक सन्तुलन तक खोने लगता है।
             जब तक हम अपने इस शत्रु क्रोध पर नियन्त्रण करने का यत्न नहीं करेंगे तब तक न हमें सुख-चैन मिलेगा और न ही हम कभी किसीके प्रिय बनेंगे। जब क्रोध आए तो उसे शान्त करने के लिए सयाने  कुछ कारगर नुस्खे बताते हैं। कहते हैं मन में सौ तक उल्टी गिनती गिन सकते हैं। हम इसके अतिरिक्त ठण्डा पानी पी सकते हैं। सबसे अच्छा उपाय है ईश्वर का नाम मन में स्मरण करें। इस प्रकार अभ्यास करने से हम क्रोध को वश में कर सकते हैं।
              व्यक्ति विशेष पर निर्भर करता है कि वह अपने स्वभाव में परिवर्तन लाना चाहता है या सबसे कटकर रहना चाहता है। हालांकि अपनी आदतों को बदलना या छोड़ना बहुत मुश्किल होता है। पर यदि मनुष्य दृढ़ संकल्प करे तो कुछ भी असम्भव नहीं। थोड़े से अभ्यास से इस पर काबू पाया जा सकता है और अपने व अपनों से दूरी बनाने से बचा जा सकता है।
चन्द्र प्रभा सूद 

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