शनिवार, 5 जुलाई 2025

जो मॉंगना है ईश्वर से मॉंगिए

जो माँगना है ईश्वर से मॉंगिए 

आयुपर्यन्त हर मनुष्य को बहुत कुछ माँगने की आवश्यकता रहती है। प्रतिदिन उसे कुछ-न-कुछ नया चाहिए ही होता है। ऐसा नहीं है कि धनवानों को माँगने की कभी इस संसार में आवश्यकता नहीं होती, वे भी हर समय माँगते रहते हैं। साधनहीन तो हर समय अपनी जरूरतों के कारण परेशान रहता है। वह ईश्वर से यही प्रार्थना करता रहता है कि उसे जीवन में सभी सुख मिलें ताकि वह समाज में रहते हुए अपना जीवन स्तर सुधार सके। उसे अपनी आवश्यकताओं के लिए किसी का भी मुॅंह न ताकने की जरूरत न पड़े।
              धनाढ्य जनों को कभी आपना घर चाहिए, नित-नयी गाड़ी चाहिए, इन्कम टैक्स-सेल्स टैक्स से बचना होता है, अच्छा स्वास्थ्य चाहिए, सुन्दर सुशील पति/पत्नी जरूरी है, आज्ञाकारी सन्तान की कामना, अच्छी नौकरी या फिर तरक्की की इच्छा, विदेश में सेटल होना या विदेश यात्रा करना आदि कुछ भी हो सकता है। इनके अतिरिक्त हमें परीक्षा-कम्पीटिशन में पास होना, यश, बल, बुद्धि आदि सब भी चाहिए होते हैं। कभी-कभी तो हद हो जाती है जब किसी पड़ोसी, मित्र या सम्बन्धी की नई खरीददारी देखकर उसकी होड़ में बिना समय गंवाए, उसे खरीदने के लिए लालायित हो जाते हैं।
            अपने पास साधन हों या न हों पर बस वह वस्तु हमें चाहिए। हमारे घर की शोभा वह जब तक न बने तब तक हम बेचैन रहते हैं। इसके लिए चाहे हमारी सामर्थ्य है या नहीं अथवा हमारी जेब इसके लिए तैयार है या नहीं, हमें कोई मतलब नहीं। इस कारण पहले अपने साधनों को कोसते हैं,  फिर जोड़- तोड़ करने का प्रयास करते हैं। बैंक से लोन लेने का जुगाड़ भी करने की कोशिश करते हैं। जब वह प्रतीक्षित वस्तु हमारे घर की शोभा बन जाती है तभी मन को शान्ति मिलती है।
                ऐसी जरूरत आने पर हम सोचते हैं कि माँगे तो किससे? कौन हमारी सहायता कर सकता है? उस समय हम चारों ओर दृष्टि डालते हैं। सभी बन्धु-बान्धवों की आर्थिक स्थिति का जायजा लेने लगते हैं। यह एक ऐसा प्रश्न है जिससे हम सबका वास्ता प्रायः पड़ता रहता है। रहीम जी इस विषय में कहते हैं -
        मॉंगन गए सो मर रहे, मरै जु मॉंगन जाहि।
       तिनके पहिले वे मरे, होता करते हैं शाहिद।
अर्थात् यदि कोई किसी से कुछ मॉंगने जाता है तो समझो की वह मर गया लेकिन उसके पहले वह मर चुका होता है जो दान देने के लायक होकर भी देने से मुकर जाता है।
           मॉंगने के विषय में कहे गए कबीरदास जी के निम्न दोहे देखिए -
     मागन मरन समान है, सीख दयी मैं तोहि।
    कहैं कबीर सतगुरु सुनो, मति रे मांगौ मोहि।।
अर्थात् मॉंगना मृत्यु के समान है। मैं तुम्हें यह शिक्षा देता हूँ। कबीर कहते हैं कि हे प्रभु! मुझे कभी भी किसी से मॉंगने के लिये मजबूर नहीं होने देना।
      खर कूकर की भीख जो, निकृष्ट कहाबै सोये।
     कहै कबीर इस भीख मे, मुक्ति ना कबहु होये।।
अर्थात् कुत्ते एवं गदहे की तरह जबर्दस्ती करके ली गई भीख अति निम्न स्तर की है। कबीरदास जी कहते हैं कि इस प्रकार की भिक्षा एवं दान से किसी को मोक्ष नहीं प्राप्त हो सकता है।
              जन्म से मृत्यु पर्यन्त हम दूसरों की देखा-देखी कुछ पाने की होड़ में कामना करते ही रहते हैं। हम लोगों को जब कभी आर्थिक कठिनाई से झूझना पड़ता हैं या उपरोक्त किसी भी वस्तु की कामना से बेहाल हम होते हैं तो स्वभावत: ही हमारे मन को उस समय यह प्रश्न बहुत उद्वेलित करता है। तब इस प्रश्न का हल खोजना हमारे लिए बहुत ही आवश्यक हो जाता है।
               मेरा यह मानना है कि माँगना हो तो उस प्रभु से माँगो जिसके खजाने भरे हुए हैं। वह किसी को देकर पश्चाताप नहीं है। वह दाता बहुत ही दयालु है। हमारे बिन माँगे ही हमें झोली भर-भरकर प्रसन्नतापूर्वक देता रहता है। हम ही ऐसे नाशुकरे हैं कि उसी की कद्र नहीं करते, उसका धन्यवाद तक नहीं करते। जब हमें कोई अन्य ठौर नहीं मिलता तब हम उस मालिक को याद करते हैं। सबसे मजे की बात तो यह है कि अपना उल्लू सीधा करने के लिए हम उसी को रिश्वत देने की बात भी करते हैं। जो बिनमाँगे, बिना हम पर कोई अहसान किए हमें छप्पर फाड़कर दिन-रात देता रहता है।
              दुनिया के सामने रोने के बजाय उस प्रभु के समक्ष बैठकर रोना ज्यादा अच्छा है। सच्चे मन से की गई हमारी याचना को झवह अवश्य पूर्ण करता है। दुनियावी लोगों से हम सहायता अवश्य लेते हैं पर उनका अहसान हम पर हो जाता है। वे राई जितना उपकार करेंगे तो पहाड़ जितना गुणगान करेंगे। थोड़ी-सी सहायता क्या करते हैं खुद को भगवान से भी बड़ा समझने लगते हैं। वे भूल जाते हैं कि वे भी समाज का एक अंग हैं जो उससे बहुत कुछ लेते हैं। 
              इसलिए दूसरों की निस्वार्थ सहायता करना उनका दायित्व बनता है। ईश्वर ने यदि उन्हें सामर्थ्य दी है तो उन्हें मालिक को हमेशा यह सिद्ध करके दिखाना चाहिए कि वे उसकी दी हुई नेमतों का सदुपयोग कर रहे हैं। इसीलिए हमारे बड़े-बजुर्गों ने कहा है-
             नेकी कर दरिया में डाल
                       और 
       एक हाथ से दो तो दूसरे को पता न चले।
         आदर्श स्थिति यही कहीं जा सकती है। इससे मनुष्य के मन में कर्तापन का भाव नहीं आता। न ही मनुष्य में अहंकार जागता है। जो मनुष्य ईश्वर को अपने भीतर-बाहर मानकर उसे सदा धन्यवाद देते हैं कि उसने उन्हें इस योग्य बनाया है। वे यदि किसी की सहायता कर सके तो वे वास्तव में वे ईश्वरीय गुणों से युक्त हो जाते हैं।
चन्द्र प्रभा सूद 

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