रविवार, 10 अगस्त 2025

विचारों का जंगल

विचारों का जंगल 

हमारे अन्तस में विचारों का एक घना जंगल है। हम यदि वन में विचरण करने के लिए जाते हैं तो वहाँ की निराली छटा, प्राकृतिक सौन्दर्य हमारा मन मोह लेता है। इस आलेख में हम प्राकृतिक वन की तुलना अपने अन्दर पैठे हुए विचारों के जंगल से करने का प्रयास करेंगे। हमारे अन्तस में विद्यमान इस अरण्य में न तो पूर्णरूप से अन्धेरा होता है और न ही पूरी तरह उजाला होता है। यहाँ पर प्रकाश घने पेड़ों से छन-छनकर आता है। इसलिए हमें इन विचारों की उठापटक सदा झिंझोड़ती रहती है। 
            अन्धेरे विचारों को हम नकारात्मक कह सकते हैं ये विचार हमें सबसे दूर करने की प्रक्रिया में लगे रहते हैं। इन विचारों के कारण हम अपने जीवन में कभी शान्ति प्राप्त नहीं कर पाते। हम स्वयं तो परेशान रहते ही हैं, साथ-साथ अपनों के दुख का कारण भी बन जाते हैं। यह स्थिति वास्तव में सबके लिए बहुत कष्टकारी होती है। इन विचारों से यद्यपि मन में कलुषता ही उत्पन्न होती है। बार-बार मनुष्य इस विषय में सोचते हुए पिष्टपेषण करता रहता है।इस कारण मनुष्य सदैव भटकता रहता है।
             इसके विपरीत हमारे मन के उजले विचार सकारात्मकता के प्रतीक होते हैं जो हमें सबसे जोड़कर रखते हैं। हम एक इकाई के रूप में रहना पसन्द करते हैं। इन विचारों की बदौलत हम चारों ओर खुशियॉं बॉंटते हैं और स्वयं भी प्रसन्न रहते हैं। हमारे साथ जुड़ने वाले सभी लोग स्वयं को हमसे दूर नहीं करना चाहते। हमारे सद् प्रयासों से घर-परिवार के लोग, बन्धु-बान्धव अच्छी सोच वाले बनते हैं। हमें अपने चारों ओर प्रकाश ही प्रकाश दिखाई देता है जो आशा का ही एक रूप है।
                इस जंगल में झाड़-झॉंखड़ और कंटीली झाड़ियों जैसे विचार हैं। ये‌विचार  हमारे जीवन में सदा उथल-पुथल मचाते रहते हैं। ऐसे रूखे व कठोर विचार सदा हमें कचोटते रहते हैं। अनायास ही मन में उठ आए ये विचार हमारे सरल मार्ग को कठिन बनाकर हमारे लिए रुकावटें उत्पन्न करते हैं। जैसे खेत से किसान खर-पतवार को उखाड़कर इन्हें फैंक देता है , उसी प्रकार इन्हें अपने मन से उखाड़ फैंकने में ही भलाई होती है अन्यथा ये हमारे लिए कष्टदायी हो जाते हैं। 
            यहाँ छायादार घने और फलवाले पेड़ जैसे विचार भी हैं जो सभी घर-परिवारी जनों और बन्धु-बान्धवों को शीतल छाया एवं सफलता देते हैं। ऐसे सुविचारी लोगों के सम्पर्क में आने वाले सभी धन्य हो जाते हैं। छतनार वृक्ष की भाँति विचारशील ये परोपकारी लोग समाज के दिग्दर्शक बनते हैं। ये देश, धर्म, परिवार और समाज के लिए ईश्वर के लिए हुए वरदान की तरह होते हैं। इन दैवीय गुणों से युक्त सज्जन मनुष्यों का साथ जीवन में कभी नहीं छोड़ना चाहिए।
              खूशबू फैलाने वाले पेड़ जैसे विचार हैं, वे अपनी सुगन्ध से सभी दिशाओं को सुबासित कर देते हैं। जिस ओर ये लोग निकल जाते हैं, इनकी खुशबू उनसे पहले पहुँच जाती है। जन साधारण के प्रिय बन जाने वाले ये सम्माननीय सभी को खुशियाँ व सुगन्ध से सराबोर कर देते हैं।
            कौवों की कॉंव-कॉंंव जैसे कर्कश या कठोर विचारों का होना हमारे लिए कभी अच्छा नहीं होता। किसी के घर की मुॅंडेर पर कॉंव-कॉंव करने वाले कौवे को लोग पसन्द नहीं करते बल्कि उसे कंकर मारकर उड़ा देते हैं। उसी प्रकार ऐसे लोगों की कोई भी परवाह नहीं करता। कोई उनका साथ नहीं देता है। सभी उनसे दूरी बनाकर रहना चाहते हैं।
              हमारे विचारों में शेर की-सी हिंस्र प्रवृति भी विद्यमान रहती है। इसके कारण होता है मन में क्रूरतापूर्ण विचारों का आना। इन हिंसक विचारों के मन में आने पर ये लोग हत्या, बलात्कार, किसी का गला काटना, चोरी-डकैती, भ्रष्टाचार आदि जैसे घृणित कार्य करने लगते हैं। इस प्रकार ही यह  परिणाम विध्वंस के रूप में सबके समक्ष आता है। ऐसे विचार वाले लोग समाज के शत्रु कहलाते हैं। न्याय व्यवस्था के दोषी बनकर ये सबसे कटकर रहते हैं व दण्ड पाते हैं।
             इन सबके अतिरिक्त पक्षियों के समान कलरव करते विचार मोहिनी शक्ति रखते हैं। सभी लोग इनके मधुर व्यवहार से प्रसन्न रहते हैं इनका संसर्ग करने के लिए लालायित रहते हैं। नदी झरनों की कलकल वाले विचार शान्त, ठहराव वाले व दूसरों के लिए पूर्णतः समर्पित रहते हैं। कभी-कभी नदी की तरह तूफान का भी सामना करते हैं पर प्रायः अपना सर्वस्व समाज के लिए बलिदान करने में नहीं हिचकिचाते।
              समुद्र-सी गहराई वाले विचारों का भी उदय होता है। ये अपने में असीम शक्तियाँ समेटे गहन गम्भीर होते हैं। इनकी थाह पाना सम्भव नहीं होता। ऊपर से कड़वे प्रतीत होने वाले ये विचारवान लोग समाज के रत्न हैं। इनकी चमक के समक्ष सब कुछ फीका रह जाता है। ये समाज के लिए हीरे के समान मूल्यवान होते हैं।
             विचारों के मकड़जाल में घिरे  हुए हम लोग हमेशा उलझे ही रहते हैं। जितना हम उससे बाहर निकलने के लिए हाथ-पाँव मारते हैं, उतना ही गहरे फंस जाते हैं। इसलिए हमें अपने विचारों को उचित मार्गदर्शन देते हुए ईश्वर से सद् बुद्धि की प्रार्थना बारम्बार करनी चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद

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