बुधवार, 20 अगस्त 2025

रिश्तों में शर्त नहीं

रिश्तों में शर्त नहीं 

 रिश्तों में कभी शर्त नहीं रखनी चाहिए। यदि आपसी सम्बन्धों में शर्तें रखी जाएँ तो वे लम्बे समय तक साथ नहीं निभाते। सारे भौतिक रिश्ते-नाते घर-परिवार, भाई-बन्धु, मित्रादि भावनाओं से जुड़े होते हैं। जहाँ शर्तें रखी जाती हैं, वहाँ पर मनों में दूरियाँ होने लगती हैं। सभी सम्बन्ध मानो चरमराने लगते हैं। इसे कोई भी समझदार व्यक्ति उचित नहीं कहेगा। 
            घर में पति-पत्नी का सम्बन्ध बहुत ही नाजुक होता है। इसमें जरा-सा भी मनोमालिन्य होने पर रिश्ता दरकने लगता है। तब इस सम्बन्ध में अलगाव की स्थिति बन जाती है। सबसे भयावह स्थिति तब होती है जब पति-पत्नी का तालाक हो जाता है और वे दोनों ही जन पुनः विवाह करके अपने-अपने जीवन में सेटल हो जाते हैं। तब माता-पिता के होते हुए भी वे मासूम बच्चे अनाथों की तरह जिन्दगी जीते हैं जिन बेचारों का कोई दोष नहीं होता। यहाँ वही बात हुई कि करे कोई और भरे कोई।
             माता-पिता और बच्चे यदि घर में एकसाथ रहने के लिए शर्तें रखने लगें तो घर में मिल-जुलकर नहीं रहा जा सकता। वहॉं तो अखाड़ा बन जाएगा। जिन माता-पिता का ऋण आयुपर्यन्त सेवा करके भी नहीं चुकाया जा सकता, उन्हीं से मुख मोड़ लेना सभ्य समाज में कदापि मान्य नहीं हो सकता। सभी सदस्यों को मिलकर इसका हल सोचना चाहिए।  ऐसी विषम स्थिति घर में न बनने पाए तभी घर में सुख, शान्ति व समृद्धि का स्थायी रूप से वास हो सकता है।
            भाई-बहन के रिश्ते को यदि शर्तों में बाँधने का प्रयास किया जाए तो वहाँ पर सम्बन्धों की गर्माहट समाप्त हो जाती है। आज भौतिक युग में कई भाई-बहनों में धन-सम्पत्ति को लेकर शर्तें रखी जाती हैं। वहॉं कोर्ट-कचहरी तक में जाने की नौबत आ जाती है। ऐसे परिवारों में निश्चित ही मनमुटाव हो जाता है और रिश्ते समाप्त हो जाते हैं। कोई भी किसी की शक्ल तक नहीं देखना चाहता। वहाँ भाई-बहनों के सम्बन्ध शत्रुता में बदल जाते हैं। ऐसे में ली गई तुच्छ भौतिक धन-सम्पत्ति रिश्तों पर भारी पड़ जाती है। 
             दूर की रिश्तेदारों के साथ सम्बन्धों में तो खैर शर्तों की आवश्यकता ही नहीं होती। वहॉं सब अपनी सुविधानुसार रिश्ते निभाने का प्रयास करते हैं। यदि उन्हें नजदीकी बनाना चाहो तो बहुत अच्छी बात है, नहीं तो भली करेंगें राम। वहाँ सुख-दुख में ही रिश्ता निभा लिया जाए तो मान लिया जाता है बहुत हो गया। उन रिश्तों में शिकवा-शिकायत की गुॅंजाइश कम होती है। सभी लोग अपने में मस्त रहते हैं।
            यदि मित्रता अपनी शर्त पर करना चाहेंगे तो कोई मित्र बनेगा ही नहीं। और यदि तथाकथित मित्रता हो भी जाएगी तो मात्र स्वार्थ के वशीभूत होगी। वह लम्बे समय तक नहीं चलती। जहाँ स्वार्थ पूर्ण हो गए वहाँ 'जय राम जी' की करके सब चलते बनते हैं। फिर 'तू कौन और मैं कौन' वाली बात चरितार्थ हो जाती है। स्वार्थों की पूर्ति के पश्चात वे स्वार्थी मित्र एक-दूसरे तक को पहचानते से इन्कार कर देते हैं। 
              सम्बन्धों को शर्तों के तराजू में तौलने वाला व्यक्ति बहुत जल्दी अकेलेपन का शिकार हो जाता है। सभी लोग उसे मतलबी कहकर उससे किनारा कर लेते हैं। उसे स्वार्थी कहकर उसका उपहास उड़ाते हैं। जब ऐसे व्यक्ति को इस बात की समझ आती है तब सब कुछ हाथ से निकल जाता है और फिर पश्चाताप करने के अलावा कुछ नहीं बचता। सोचने की बात यह है कि आखिर कब तक मनुष्य शर्तों पर सम्बन्ध बना सकता है? कहीं तो एक रेखा खींचनी होगी।
             जब-जब रिश्तों में दरार आती है तो वे टूटने की कगार पर पहुँच जाते हैं। अगर उन्हें पुनः जोड़ने का यत्न किया जाए तो उनमें गाँठ पड़ जाती है। रहीम जी व्यथित होकर हमें समझाते हुए यह कहते हैं-
       रहिमन धागा प्रेम का मत तोड़ो चटकाय।
      टूटे से फिर न जुड़े जुड़े गाँठ  पड़ी जाए॥
अर्थात् रहीम जी कहते हैं कि प्रेम के धागे को मत तोड़ो। टूटा हुआ धागे फिर जुड़ नहीं सकता। यदि उसे जोड़ने का प्रयास किया जाए तो उसमें गॉंठ पड़ जाती है।
और भी कहा है-
       रूठे सुजन  मनाइए  जो रूठें सौ बार।
      रहिमन फिर फिर पोहिए टूटे मुक्ताहार॥
अर्थात् रहीम जी कहते हैं कि अपने प्रियजन यदि किसी कारण से सौ बार भी नाराज हो जाऍं या रूठ जाऍं तो उन्हें मना लेना चाहिए। यदि मोतियों का हार टूट जाए तो उसे बार-बार पिरो लेना चाहिए। इसी में समझदारी होती है।
           सबके साथ प्रेमपूर्वक मिल-जुलकर रहना ही हितकर है। इसलिए अपने रिश्तों को अपने झूठे अहं के कारण शर्तों में बाँधने से यथासम्भव बचना चाहिए। उन्हें सरल और सहज स्वभाव से जीने का प्रयास करना चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद

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