जीवन एक यज्ञ
हमारा जीवन एक यज्ञ है जिसे हम प्रतिदिन अपने बन्धु-बान्धवों के साथ मिलकर करते हैं। यज्ञ को करने के लिए जिस प्रकार औषधीय गुणों से युक्त सामग्री व समिधाओं की आवश्यकता होती है उसी प्रकार जीवन यज्ञ को करने के लिए अपने दुर्गुणों को दूर कर सद् गुणों की आहुति देनी होती है। तभी हमारे जीवन यज्ञ की सुगन्ध दूरदराज तक फैल सकती है। हम इस प्रकार भी कह सकते हैं कि जैसे-जैसे हमारे सुकृत्यों की चर्चा चारों ओर फैलेगी, उतनी ही प्रशंसा हमें मिलेगी।
हमारे अन्तस में जितना अधिक सद् गुणों का विकास होगा उतने ही हमारे मनोमस्तिष्क में विद्यमान दुर्गुण जीवन यज्ञ की अग्नि में भस्म होते जाएँगे। फिर हमारा अन्त:करण उतना ही शुद्ध व पवित्र होता जाएगा। यह हमारे जीवन की एक विशेष उपलब्धि कही जाएगी। अन्त:करण की शुद्धि होने से हमारे मन में व्याप्त नकारात्मक विचार स्वत: ही किनारा करने लगते हैं। उनके स्थान पर हृदय में सकारात्मक विचारों का उदय होने लगता है। मनुष्य के मन में प्राणिमात्र के प्रति दया और करुणा आदि मानवोचित गुणों का समावेश होने लगता है।
यज्ञ में घी की आहुति भी दी जाती है। इसका सीधा-सा अर्थ है कि हम अपने जीवन में स्नेह की चिकनाई बॉंटनी चाहिए। संसार के सभी जीवों को अपना मानते हुए उनके साथ प्यार का व्यवहार करना चाहिए। हमेशा ही इस बात को याद रखना चाहिए कि वही व्यहार हमें वापिस मिलेगा जो हम दूसरों के साथ करेंगें। सृष्टि का यह नियम अटल है-
जैसा बोओगे वैसा काटोगे।
इसलिए भी अपने जीवन में सदा सतर्क रहना बहुत आवश्यक होता है। प्रेम व भाईचारे की भाषा मूक पशु-पक्षी तक जानते व समझते हैं। उन्हें जरा-सा प्यार करो तो वे हमारे ही हो जाते हैं।
इस जीवन यज्ञ के पुरोधा हमारे अपने माता-पिता होते हैं जिन्होंने ने हमें इस धरा पर लाने का पुनीत कार्य किया। उनको अपने जीवनकाल में प्रसन्न रखना बहुत आवश्यक है अन्यथा इस यज्ञ के खण्डित होने का भय सताता रहेगा। माता-पिता के त्याग और तपस्या को कभी विस्मृत नहीं करना चाहिए। यथासम्भव उनके प्रति सजगता बरतनी चाहिए। हमारे शास्त्र उन्हें ईश्वर तुल्य मानते हैं। उनकी सेवा-सुश्रुषा करने पर ही मनुष्य का जीवन सफल होता है।
सम्पूर्ण प्रकृति भी यज्ञोमय है। उसका यह यज्ञ सृष्टि के आदि से अब तक निरन्तर चलता जा रहा है। इसीलिए हम सभी जीवों का अस्तित्व विद्यमान है। वह हमारी भौतक माता के समान ही हमारी सारी आवश्यकताओं को बिना कहे पूर्ण करती है। अत: हम उसे माता कहते हैं। वह हमारी सारी आवश्यकताओं को पूर्ण करती है। वह बदले में हमसे कुछ नहीं मॉंगती। परन्तु हम ऐसे हैं कि उसे सदा दूषित करते हैं। उसकी महानता है कि वह हमें क्षमा कर देती है।
यज्ञ कुण्ड के चारों ओर जल छिड़का जाता है जो पवित्रता का प्रतीक है। इससे चींटियॉं आदि जीवन यज्ञ की अग्नि में जलने से बच जाते हैं। जल से जो भाप बनती है वह भी लाभदायक होती है। उसी प्रकार हमें भी यथासम्भव दूसरों की सहायता करके उन्हें शीतलता प्रदान करनी चाहिए। उनकी परेशानियों को दूर करने के लिए हमें अपना कदम बढ़ाना चाहिए।
यज्ञ जिस प्रकार वायुमण्डल को शुद्ध करता है, उसी प्रकार हमारा भी यह दायित्व बनता है कि हम अपने वायुमण्डल को शुद्ध रखें। अपनी मूर्खताओं के कारण उसे दूषित न करें। यदि हम उसे हानि पहुँचाएँगे तो उसका दुष्परिणाम बाढ़, तूफान, भूकम्प, रोगों आदि के रूप में हमारे सामने आएगा। तब हम व्यर्थ जोड़तोड़ करने व्यस्त हो जाते हैं। हम अनावश्यक ही भ्रष्टाचार आदि को अनजाने में बढ़ावा देकर अपने देश और समाज के दोषी बन जाते हैं।
यज्ञ से कई रोगों से बचा जा सकता है। उसी तरह जीवन यज्ञ को नियमपूर्वक करने वाला सन्तुलित व सात्विक जीवन जीने वाला जीव अनेक व्याधियों से बचा रहता है।
इस यज्ञ की पवित्र अग्नि से मनुष्य को यह शिक्षा मिलती है कि वह जीवन की आग्नेय शक्ति को जल रूपी धैर्य से सदा बॉंधकर रखे। अकारण अपनी शक्ति का ह्रास न करे बल्कि अपने भीतर की आग को प्रज्ज्वलित करके उसका सदुपयोग करे। उससे शक्ति सम्पन्न होकर देश, धर्म व समाज के लिए हितकारी कार्य करते हुए अपना यह नश्वर जीवन प्रभु को समर्पित कर दे।
चन्द्र प्रभा सूद
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