शुक्रवार, 22 अगस्त 2025

दोनों हाथों से खुशियॉं बॉंटिए

दोनों हाथों से खुशियाँ बाँटिए

अपने दोनों हाथों से खुशियाँ बाँटिए और फिर देखिए जीवन में कितना सुकून मिलता है। आज की भागमभाग वाली जिन्दगी में यदि कुछ पल खुशियों भरे मिल जाएँ तो किसी का भी जिन्दगी का सफर सुहाना हो सकता है। दुख-परेशानी इस जीवन का अभिन्न अंग हैं, इनसे क्योंकर घबराना। जब भी अवसर मिले खुशियों को बटोरने में कंजूसी नहीं करनी चाहिए। आश्वस्त होकर उन्हें अपने दामन में समेटे लेना चाहिए।
            सबसे बड़ी बात यह है कि दूसरों को खुशियाँ तभी बाँटी जा सकती हैं, यदि मनुष्य पहले स्वयं प्रसन्न रहना सीख जाएगा। उसके लिए पहले अपने जीवन में सन्तोष का होना ही बहुत आवश्यक है। सन्तोष रूपी धन जब जीवन में आ जाता है तो शेष सभी धन मिट्टी के समान लगने लगते हैं। तब फिर भौतिक पदार्थों के लिए व्यर्थ भटकने की मनुष्य को कदाचित आवश्यकता नहीं रहती। जब मन दुख और परेशानी से व्यथित होता है तो वे भाव उसके चेहरे पर प्रत्यक्ष दिखाई पड़ते हैं। उसी प्रकार सन्तुष्टि का भाव भी मनुष्य के चेहरे पर स्पष्ट रूप से छलकता है।
           इस असार संसार के आकर्षण मनुष्य को ललचाते हैं। उनको और और पाने की चाहत उसे गुमराह कर देती है। तब मनुष्य अनजाने में गलत राह या कुमार्ग पर चल पड़ता है जिससे वापसी असम्भव तो नहीं परन्तु कठिन अवश्य हो जाती है। उस समय मनुष्य सभी प्रकार के सच-झूठ व छल-प्रपंच करने लगता है। अपनी सफेदपोशी की पोल खुल जाने का डर उसे विचलित करता रहता है। फिर उसका पीड़ित हो जाना तो समझ में आता है। ऐसा दिशाहीन होता हुआ मनुष्य अपने पैर पर खुद ही कुल्हाड़ी मार लेता है। वह  परेशानियों के जंगल में चौबीसों घण्टे व्यर्थ ही इधर-उधर भटकता रहता है।
              जब हमारे मन को ये ईर्ष्या, द्वेष, काम, क्रोध, अहंकार आदि शत्रु डसने लगते हैं तब वह बेचैन होकर बेबस पक्षी की तरह फड़फड़ाने लगता है। उस समय ऐसा प्रतीत होता है मानो कोई हमारा दिन-रात का सब सुख-चैन हर रहा है। तब सारा समय हम दूसरों को गाली-गलौच करने या कोसने में व्यतीत करते हैं। ऐसी स्थिति में मन की शान्ति भंग हो जाती है जो वास्तव में दुर्भाग्यपूर्ण है। जब मन ही शान्त नहीं होगा तो हम भी प्रसन्न नहीं रह सकते। फिर ऐसे में अपने घर, परिवार, मित्रों व बच्चों सबको खुशी कैसे दे सकते हैं?
           जीवन में बड़ी खुशियों के पल कम ही आते हैं। बड़ी खुशियॉं आती हैं और चली जाती हैं। यानी बच्चे का जन्म, उसका मुण्डन, उसका जीवन में सेटल होना और फिर विवाह आदि। पर छोटी-छोटी खुशियों को हमें खोना नहीं चाहिए। जैसे जन्मदिन, शादी की सालगिरह, बच्चे के टेस्ट या परीक्षा में अच्छे नम्बर आना, घर में कोई नई वस्तु खरीदना, कहीं घूमने जाना आदि जीवन में अनेक पल ऐसे आते हैं जिन्हें हम सेलिब्रेट कर सकते हैं। ऐसी बहुत-सी खुशियॉं हमें मिल सकती हैं।
           यह आवश्यक नहीं कि हम लाखों-करोड़ों रुपए खर्च करें तभी स्वयं खुश रह सकते हैं और औरों को खुश रख सकते हैं। दूसरों के दुख को बॉंटकर उन्हें प्रसन्न किया जा सकता है। उनके कष्ट के समय इतना अहसास भर दिलाना ही उनकी खुशी के लिए बहुत होता है कि हम उनके साथ हैं। किसी की परेशानी को यदि हम सुन लेते हैं तो भी हम उसकी प्रसन्नता का माध्यम बन सकते हैं।    
            अपनी सामर्थ्य के अनुसार दूसरों के छोटे-छोटे अभावों को दूर करके हम उन्हें खुशियाँ दे सकते हैं। असहायों के लिए दीनबन्धु बन सकते हैं। अपने व्यवहार को सन्तुलित करके भी हम अन्यों को सन्तुष्ट कर सकते हैं। ओल्ड होम, अनाथालय, अन्धविद्यालय आदि स्थानों पर जा सकते हैं। उन लोगों के साथ कुछ पल बिताकर, उनकी बातों में रुचि दिखाकर भी उन्हें खुशियों के कुछ पल दे सकते हैं। इनके लिए कोई मूल्य भी नहीं चुकाना पड़ता।
            खुशियाँ फूलों की भाँति बहुत कोमल होती हैं। ये चारों ओर अपनी सुगन्ध से सबको सुवासित करती हैं और अपने सौन्दर्य से सबको मोहित कर लेती हैं। इन्हें निस्वार्थ भाव से बॉंटने पर दूसरों को प्रसन्नता तो मिलती ही है, अपना मन भी खुश व शान्त रहता है। ऐसा करने पर एक आत्मतुष्टि का भाव अपने मन में रहता है कि हमने जीवन में कुछ सकारात्मक कार्य किया। यथासम्भव अनमोल खुशियों की चाँदनी बिखेरते रहने का यत्न हम सभी को करना चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें