सोमवार, 25 अगस्त 2025

मन को मन्दिर बनाऍं

मन को मन्दिर बनाऍं 

मानव शरीर में मन एक बहुत पवित्र स्थान है। हमारे ऋषि-मुनि इसे मन्दिर की संज्ञा देते हैं। मनीषी उसमें ईश्वर की प्राण प्रतिष्ठा करके उसकी आराधना करने का परामर्श देते है।
      विचारणीय है कि यह मन मन्दिर कैसे बने? इसे मन्दिर को बनाने का तरीका क्या है? इस मन को मन्दिर बनाने का बहुत ही सरल उपाय भुल्ले शाह जी ने हमें सुझाया है। वे कहते हैं-
'भुलया रब दा की पाना एत्थे पुटना ओत्थे लाना।'
अर्थात् ईश्वर को पाना बहुत ही सरल है। मन को इधर से हटाकर उधर प्रभु की ओर मोड़ दो।
          दूसरे शब्दों में कहें तो हम सभी जानते हैं कि चावल की खेती करते समय उसे एक स्थान पर बोया जाता है। कुछ समय पश्चात उसे वहाँ से उखाड़कर दूसरे स्थान पर रोपा जाता है। भुल्ले शाह जी का मानना है कि चावल की खेती की तरह अपने मन को सांसारिक बन्धनों से विमुख करके बस ईश्वर की ओर उन्मुख कर दो। जितना कहना सरल है, क्रियात्मक रूप में उसकी अनुपालना उतनी ही कठिन है।
         सन 1965 में बनी फिल्म काजल का भजन है, जिसे लिखा है साहिर लुधियानवी जी ने। साहिर जी के गीतों से मालूम होता है कि वे मन और कर्म को बहुत महत्वपूर्ण मानते थे। श्रीमती आशा भोंसले ने यह गीत गया था। गीत के बोल इस प्रकार हैं- 
मन ही देवता, मन ही ईश्वर, मन से बड़ा न कोई, 
मन उजियारा, जब जब फैले, जग उजियारा होए,
इस उजले दर्पण पर प्राणी, धूल न जमने पाए।
सुख की कलियॉं दुख के कॉंटे, मन सबका आधार,
मन से कोई बात छुपे न, मन के नैन हजार,
जग से चाहे भाग ले कोई, मन से भाग न पाए।
तन की दौलत ढलती छाया, मन का धन अनमोल,
तन के कारण मन के, धन को मत माटी में रोल,
मन की कदर भूलाने वाला, हीरा जनम गंवाए ॥
        इस गीत में मन को ईश्वर कहा है। मन से बड़ा इस संसार में कोई नहीं है। मन के प्रकाशित होने पर विश्व में प्रकाश होने लगता है। मन एक दर्पण है, जिस पर कवि धूल न जमने के लिए कह रहे हैं। मनुष्य का मन सुख और दुख का आधार है। मन से इन्सान कोई बात नहीं छुपा सकता। इसकी हजारों ऑंखें हैं। दुनिया से व्यक्ति भाग सकता है पर अपने मन से नहीं। शरीर समयानुसार ढलने लगता है। मन रूपी धन बहुत अनमोल है। इसका तिरस्कार नहीं करना चाहिए। मन का सम्मान न करने वाला व्यक्ति, हीरे जैसे अमूल्य जीवन को निस्सन्देह गॅंवा देता है।
       कहने के लिए मन को साधना बड़ा सरल है।  परन्तु मनुष्य का सम्पूर्ण जीवन बीत जाता है, इस चंचल मन को साधते-साधते। यह एक ऐसा बेलगाम घोड़ा है जो किसी के वश में आता ही नहीं। इस मन को नियन्त्रित करने के लिए भगवान श्रीकृष्ण ने 'श्रीमद्भगवद्गीता' के छटे अध्याय में कहा हैं-  
      असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलं।
       अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते।।
अर्थात् हे अर्जुन! मन को अभ्यास और वैराग्य के द्वारा वश में किया जा सकता है।
       इसे नियन्त्रित करने के लिए पहला उपाय है निरन्तर अभ्यास करना। मन को बार-बार ईश्वर की आराधना में प्रवृत्त करना। वह इधर-उधर भागेगा, उसे पुनः वापिस लेकर आना। दूसरा उपाय है वैराग्य यानी सांसारिक पदार्थो से आसक्ति का त्याग। सभी सांसारिक कार्यों को करते हुए असार संसार में उसी प्रकार रहना जैसे जल में कमल रहता है।
        हमारा मन एक ऐसा पात्र है जिसमें प्रभु के प्रति श्रद्धा व भक्ति के भाव होने चाहिएँ। हम लोगों ने अपने मन को ईर्ष्या, द्वेष, काम, क्रोध, अहंकार आदि दुर्गुणों का आश्रय बना रखा है। जब तक ये सभी वहाँ घर बनाकर रहेंगे तब तक ईश्वर का निवास नहीं बन सकता।
        जैसे किसी पात्र में हमने कोई वस्तु डालनी हो तो पहले यह विश्वास करना पड़ता है कि वह खाली हो। यदि उसमें पहले से कुछ डालकर रखा हो तो नया पदार्थ उसमें नहीं आ सकेगा। इसलिए बर्तन को पहले खाली करना पड़ेगा और धोकर सुखाना होगा तभी नया पदार्थ उसमें आ पाएगा।
        उसी प्रकार हमें अपने मन में विद्यमान इन सभी दुर्गुणों को वहाँ से दूर करके मन रूपी पात्र को खाली करना होगा। फिर उसमें उस मालिक के नाम की लौ जगानी होगी। तभी वह धुल-पुछकर स्वच्छ होगा। ईश्वर का वास हमारे मन में तभी हो सकता है यदि उसमें प्यार, भाईचारा, दया, ममता,  आपसी विश्वास, परोपकार आदि सद् भावनाओं का उदय होगा।
          ईश्वर हमारे इस मन में सदा ही वास करता है पर हम अपने अहंकार व दुर्गुणों के कारण उससे दूर होते जाते हैं। एक समय ऐसा आता है जब हम न उसे अपने अंतस में महसूस कर सकते हैं और न ही उसकी चेतावनी एवं उत्साहवर्धक प्रेरणा को सुन  पाते हैं। वह तो हमारी रक्षा हर कदम पर करता है। हमारा दुर्भाग्य है कि हम अज्ञ जन उसकी कृपा को समझ ही नहीं पाते हैं।
        जब हम अपने मन को सद् गुणों से प्रकाशित करेंगे तभी वास्तव में, सही मायने में वह चमकता हुआ मन्दिर बन जाएगा। तब हम वहाँ हम अपने इष्ट को, प्रभु को प्रतिष्ठित कर सकेंगे। तभी इस गीत की पंक्ति को सार्थक कर सकेंगे-
 तेरे पूजन को भगवान बना मन मन्दिर आलीशान।
चन्द्र प्रभा सूद 

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