भारतीय संस्कृति पर कुठाराघात
हम अपनी भारतीय संस्कृति पर बहुत गर्व करते हैं। हमारे ऋषि-मुनियों ने बहुत सोच-समझकर सारी व्यवस्थाऍं बनाई हैं। हमारी इस भारतीय संस्कृति पर कुठाराघात करने के लिए पाश्चात्य लोग तैयार बैठे हुए हैं। उनके पिछलग्गू हमारे देशीय महानुभाव भी आग में घी डालने कार्य कर बखूबी निभा रहे हैं। इसका दुष्परिणाम यह है कि वे विवाह जैसी पवित्र सामाजिक व्यवस्था को वे तहस-नहस कर देना चाहते हैं। पर शायद वे भूल रहे हैं-
यूनान, मिस्र, रोमा सब मिट गए जहाँ से
बाकी बचा है अब तक नामो-निशाँ हमारा।कहने का तात्पर्य यह है कि कितने देश और कितनी ही सभ्यताऍं इस धरा से मिट गई हैं। परन्तु हमारी सांस्कृतिक विरासत की जड़ें इतनी मजबूत हैं कि उनको हिला पाना असम्भव है। वह अभी तक दृढ़ता से विद्यमान है।
हालॉंकि आज के इस भौतिकतावादी युग में देखादेखी जीवन मूल्यों का ह्रास होता जा रहा है। इसका परिणाम है तलाक के बढ़ते मुकदमे। पहले तो अधिक आयु में बच्चे विवाह करते हैं। दोनों पति-पत्नी अच्छे पदों पर कार्य करते हैं और अच्छा कमाते हैं। बच्चों में धैर्य की कमी के कारण आपसी सामंजस्य में कठिनाई आ रही है। कोई भी झुकने के लिए तैयार नहीं होता। ये युवा भूल जाते हैं कि उनके परिवारी जन उनकी ऐसी दशा देखकर कितना कष्ट भोग रहे हैं। उधर बेचारे उनके निर्दोष बच्चे सबसे अधिक प्रभावित होते हैं जिनका इस सबमें कोई दोष ही नहीं होता।
कुछ परिस्थितियों में तलाक लेना उचित हो सकता है पर हर केस में नहीं। पति का पत्नी पर अपने अहं के कारण कटाक्ष करना, मानसिक व शारीरिक शोषण करना, दहेज के लिए प्रताड़ित करना आदि सर्वथा अनुचित है। इस प्रकार की स्थिति होने पर भारतीय दण्ड संहिता में महिलाओं की सुरक्षा के लिए बहुत से कानूनों का प्रावधान किया है। उनका उपयोग वह कर सकती है। ये कानून महिलाओं के प्रति बढ़ते उत्पीड़न से रोकने के लिए बनाए गए हैं। इसका यह अर्थ कदापि नहीं है कि इनकी आड़ में अपना स्वार्थ साधा जाए या निर्दोष साथी को फंसाया जाए।
कुछ महिलाएँ विवाहेत्तर सम्बन्ध के चलते, पति से अधिक कमाने के कारण, पति का दुर्घटना में विकलांग हो जाने की स्थिति में, उसका नपुंसक होने आदि किसी भी कारण से अपने पति से अलग होना चाहती हैं। दुर्भाग्य है कि वे अपने पति सहित ससुराल के अन्य सभी सदस्यों पर दहेज या प्रताड़ना का झूठा केस दर्ज करवा देती हैं। मेरे विचार से यह सर्वथा अनुचित है। अब अदालतें उन महिलाओं के घड़ियाली आँसुओं से पिघलने वाली नहीं हैं। गलत बयानी करने वालों को सावधान हो जाना चाहिए क्योंकि ऐसा करने पर उन्हें सजा भी हो सकती है। कानून को मजाक समझना बन्द कर देना चाहिए।
विवाह जैसे पवित्र बन्धन को दूषित करने वाले चाहे पुरुष हों या महिलाएँ किसी को भी यह समाज क्षमा नहीं करेगा। यह बात गाँठ बॉंध लें कि अपनी सांस्कृतिक विरासत का अपमान करने और दूसरी संस्कृति को आधे-अधूरे मन से अपनाने वालों की स्थिति धोबी के कुत्ते जैसी हो जाती है जो न घर का रहता है न घाट का। दूसरे शब्दों में हम ऐसा कह सकते हैं कि अपनी विरासत का सम्मान कीजिए। व्यर्थ अहं के कारण उसका तिरस्कार कदापि नहीं करना चाहिए। दूसरों की अच्छाइयों को अपनाने में कोई बुराई नहीं पर उन्हें अपने मूल्यों की कसौटी पर पहले परख लें। ऐसा न हो कि बाद में पश्चाताप करने का अवसर भी हाथ से चला जाए।
आज विदेशों की तरह हमारे भारत में भी युवाओं को लिविंग रिलेशनशिप भाने लगी है। अपने मन में विचार कीजिए कि इस सम्बन्ध में अपना कहने के लिए कौन है? दोनों के माता-पिता व सम्बन्धी शायद ही इस सम्बन्ध को मन से स्वीकार कर पाएँ। परन्तु सामाजिक संस्कारों से मुक्त होने का दावा करने वाले ऐसे दूषित विचारों वाले युवा जो अपने साथी की बेवफाई सहन नहीं कर पाते तो क्या इस सम्बन्ध में आँखों देखी मक्खी निगल सकेंगे?
मेरे विचार में जिन्हें परिवार में रहकर सम्बन्ध निभाने नहीं आते, वे इसे भी अधिक समय तक नहीं निभा सकते। वहाँ भी नित्य प्रति के होने वाले लड़ाई-झगड़ों से वे दो-चार होते रहेंगे। इस स्थिति में उनका शीघ्र ही अलगाव होना निश्चित है। इस प्रकार भेड़चाल चलने से हमारा अपना ही नुकसान होता है। यथासम्भव इससे बचने का प्रयास करना चाहिए। अपनी घर-गृहस्थी की जिम्मेदारियों को प्रसन्नतापूर्वक निभाइए फिर देखिए आपको निस्सन्देह चारों ओर खुशियों की वर्षा होती हुई दिखाई देगी।
चन्द्र प्रभा सूद
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