हठ से किसी का भला नहीं
जिद यानी हठ से किसी के भी भले के लिए नहीं होती। इस जिद की बलि बहुत कुछ चढ़ जाता है।इतिहास साक्षी है कि जिद के कारण जो रामायण काल में और महाभारत काल में जो विनाश हुआ, उसे न चाहते हुए भी सबको भुगतना पड़ा। हठी राजाओं के कारण विश्व को समय-समय पर बहुत हानि उठानी पड़ी है। राजहठ, बालहठ और त्रियाहठ इन तीनों प्रकार के हठों ने साम्राज्यों को सम्पूर्ण विनाश के कगार पर पहुँचा दिया।
राजहठ के विषय में हम सब लोग जानते हैं। प्राचीन काल के राजाओं के हठ से हम में से कोई अनजान नहीं है। रावण, दुर्योधन, कंस आदि के हठ के कारण देश का इतना अधिक नुकसान हुआ जिसका भुगतान अभी तक हम सब कर रहे हैं। हिटलर व औरंगजेब के कारनामे आज भी इतिहास के पन्नों में मिल जाएँगे। ये नाम तो मात्र प्रतीक रूप हैं। प्राचीन काल में और भी बहुत से राजा ऐसे हुए हैं जिनके हठ के कारण बहुत बड़े-बड़े अनर्थ हुए।
आज राजा तो नहीं रहे पर राज्य चलाने वाले सत्ताधीश तो विद्यमान हैं ही। उनके हठ से हम सभी परिचित हैं। रूस, यूक्रेन, अमेरिका, इजरायल, ईराक, ईरान, चीन, नार्थ कोरिया, पाकिस्तान आदि देशों को भी इस श्रेणी में रख सकते हैं जिनके हठ से हम भली-भाँति परिचित हैं। इन देशों के शासकों ने अपने हठ के कारण न जाने कितने ही मासूमों की बलि दे दी। अभी भी इन देशों के शासक अपने हठ को नहीं छोड़ रहे। पता नहीं और कितने विनाश का साक्षी यह विश्व बनेगा?
त्रिया हठ किसी से छुपा नहीं है। यदि भगवती सीता स्वर्ण मृग लाने की जिद न करती तो शायद सीताहरण न होता। जिसके फलस्वरूप रामायण का युद्ध न होता। ऐसे ही द्रौपदी यदि हठ न करती तो शायद महाभारत का युद्ध टल जाता। वह विनाश न होता जिसका खामियाजा हम आज तक भुगत रहे हैं। इसी प्रकार के अनेक उदाहरण इतिहास के पन्नों में दफन हो चुके हैं जिन्हें हम खोजकर पढ़ सकते हैं।
वैसे तो घर-परिवार में भी त्रियाहठ के उदाहरण यत्र-तत्र मिल जाते हैं। जिस घर में स्त्री का हठ प्रबल हो जाता है, वह घर कभी खुशहाल नहीं रह सकता। और जिस घर में पुरुष अपने मुखिया होने के अहसास के कारण हठ करता है, वहाँ पर सुख-शान्ति कभी नहीं रहती। दोनों ही स्थितियों में घर-परिवार टूटने के कगार पर आ जाता है। इस हठ के कारण पति-पत्नी एक-दूसरे के मानो शत्रु ही बन जाते हैं। उनमें होने वाले अलगाव का दंश बच्चे सारी आयु भोगते हैं।
इस हठ के कारण माता-पिता, भाई-बहन एवं बच्चों में परस्पर मनमुटाव हो जाता है। रिश्तों में अनचाहे खटास आ जाती है। यदि पति-पत्नी में से कोई भी एक अपने हठ पर अड़ा रहे तो घर टूट जाते हैं। जिसकी परिणति तलाक से होती है। उसका दण्ड उनके निर्दोष बच्चे भुगतते हैं जो बेचारे इस सबसे बेखबर होते हैं। घर-परिवार में चाहे बच्चों का हठ हो अथवा बुजुर्गों का हठ हो, शान्ति का कारण बनता है। इससे घर युद्ध का मैदान बन जाता है। वहॉं पर रहने वालों का जीवन नरक से भी बदतर हो जाता है।
बालहठ से तो हम सबका प्रतिदिन सामना होता ही रहता है। आजकल माता-पिता ही अपने बच्चों को हठी बना रहे हैं। यही बच्चे बड़े होने पर जब अपनी जायज-नाजायज जिद मनवाते हैं तो माता-पिता अपनी गलती नहीं मानते। वे अपने बच्चों को भला-बुरा कहते हैं, दोष देते हैं। यानी बच्चों से हार मानकर अपने भाग्य को कोसते हैं। उस समय जब बच्चे हाथ से निकल जाते हैं तब पश्चाताप करने का कोई लाभ नहीं होता। उल्टा वे स्वयं की ही हानि करते हैं।
ऐसे जिद्दी बच्चे जहाँ कहीं भी जाते हैं एक नई मुसीबत खड़ी कर देते हैं। अपने आस-पड़ोस, उनके विद्यालय हर स्थान से उनकी शिकायतें ही माता-पिता को सुननी पड़ती हैं। कोई मित्र या सम्बन्धी ऐसे बच्चों को अपने घर में पसन्द नहीं करता। कोई भी अपने बच्चे को इन हठी बच्चों के साथ खेलने नहीं देना चाहते। सामने मुँह पर लोग कुछ नहीं भी कहेंगे पर पीठ पीछे ऐसे माता-पिता की आलोचना करते हैं और कहते हैं कि उन्होंने अपने बच्चे को अच्छे संस्कार नहीं दिए।
यह बालहठ जब परवान चढ़ता है तब वह बड़े-से-बड़े साम्राज्य तक को हिलाकर रख देता है। हठ कोई भी अच्छा नहीं चाहे वह बालहठ हो या त्रियाहठ हो अथवा राजहठ हो।
जहाँ तक हो सके इस जिद या हठ से किनारा ही किया जाना चाहिए। इस जिद ने बहुत कुछ की बलि ली है। आगे भी न जाने कितने ही बलिदान लेगा। अपने व अपनों को सुख-शान्ति से जीवन व्यतीत करवाने के लिए इससे बचना ही श्रेयस्कर है।
चन्द्र प्रभा सूद
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