शुक्रवार, 17 अक्टूबर 2025

ईश्वर रूपी कस्तूरी

ईश्वर रूपी कस्तूरी

कस्तूरी मृग की भॉंति हम ईश्वर रूपी सुगन्ध को ढूढँने के लिए भटकते रहते हैं। मनीषी कहते हैं कि कस्तूरी हिरण की नाभि में होती है। उसे खोजने के लिए वह जंगल में मारा-मारा फिरता है। परन्तु वह उसे नहीं मिल पाती। जो कस्तूरी उसकी नाभि में विद्यमान है, वह भला जंगल में भटकने से कैसे प्राप्त हो सकती है? 
            उसी प्रकार हम मनुष्यों का भी वही हाल है। ईश्वर रूपी कस्तूरी हमारे हृदयों में बसी हुई है पर हम उसे खोजने के लिए भटकते फिरते रहते हैं। हम उसे ढूँढने के लिए  कभी तीर्थ स्थलों की सैर करते हैं, कभी जंगलों में भटकते फिरते हैं अथवा धार्मिक स्थानों पर जाकर माथा रगड़ते हैं। पवित्र नदियों के जल में स्नान करके आत्मशुद्धि का व्यर्थ प्रयास करते हैं। इसी कड़ी में तथाकथित पाखण्डी धर्मगुरुओं, तन्त्र-मत्र वालों के जाल में फंसते जाते हैं। पर ईश्वर तो फिर भी कहीं नहीं मिलता। वह तो हमें तभी मिलेगा न जब हम उसकी सच्चे मन से  तलाश करेंगे।
                हम यह मानते हैं ईश्वर कण-कण में और जर्रे-जर्रे में विद्यमान है। उसे खोजने की कोई आवश्यकता नहीं होती है क्योंकि वह हर घड़ी, हर पल हमारे अंग-संग रहता है। उसका निवास स्थान तो हमारा हृदय है जिसे हमने मन्दिर की तरह पवित्र बनाना है। ऐसा तभी होगा जब हम यम-नियमों का पालन सख्ती से करेंगे।
          'मनुस्मृति:' में मनु महाराज ने धर्म के लक्षण बताते हुए कहा है -
      धृति: क्षमा दमोsस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रह:।
      धीर्विद्या सत्यमक्रोधो दशकों धर्मलक्षणम्।।
अर्थात् धर्म के दसों लक्षण हैं - धैर्य, क्षमा, संमय, चोरी न करना, तन-मन की पवित्रता, इन्द्रियों को वश में करना, सद् बुद्धि रखना, विद्या ग्रहण, सत्य बोलना करना और क्रोध न करना।
             महर्षि पातंजलि ने योगशास्त्र में योग के आठ अंग बताए हैं- यम, नियम, आसन, प्रत्याहार, प्रणायाम, धारणा, ध्यान और समाधि। इन आठों अंगों का पालन करते हुए मनुष्य समाधि के द्वारा ईश्वर को प्राप्त करता है। मनुष्य का सारा जीवन व्यतीत हो जाता है यम और नियम का पालन करते हुए पर उनकी पूर्ण रूप से अनुपालना नहीं कर पाता। जिस प्रकार नींव के बिना यदि घर बनाया जाए तो वह बहुत दिन तक टिका नहीं रह सकता, उसी प्रकार यम और नियम के बिना समाधि तक पहुँच पाना असम्भव होता है। योग की पहली सीढ़ी यम है इसके पालन के बिना नियम की अनुपालना नहीं हो सकती। इन दोनों के पालन से अन्त:करण पवित्र होता है। इनके पालन के बिना प्राणायाम का भली-भाँति होना बहुत कठिन होता है।
          इन यम-नियमों और धर्म  का पालन करके हम अपने जीवन को सात्विक बना लेंगे। उस समय जब चाहेंगे अपने मन में उस प्रभु का ध्यान लगाकर उसका साक्षात्कार करने में सक्षम हो सकेंगे।
           हम उस परमपिता का अंश हैं, वह सदा ही हमें अपने में समेटे रखना चाहता है। इसलिए वह सदा ही हमारे साथ रहता है। वह कभी हमें अपने से दूर नहीं करना चाहता। पर हम अड़ियल व नादान बच्चे की तरह उसकी अंगुली छुड़ाकर इधर-उधर भागते रहते हैं। इस संसार के आकर्षण इतने अधिक लुभावने हैं कि हम ललचाते हुए सब कुछ छोड़कर उनकी ओर भाग जाना चाहते हैं। ईश्वर की ओर अपना ध्यान लगाना ही नहीं चाहते। इस कारण हम दुःखों-परेशानियों में घिर जाते हैं।
              यहाँ एक उदाहरण देना चाहती हूँ। बच्चे अपने कैरियर, पढ़ाई या किसी अन्य आकर्षण के कारण अपने माता-पिता को छोड़कर देश में अन्यत्र अथवा विदेश कहीं भी चले जाते हैं। तब उनके माता-पिता पलक-पाँवड़े बिछाए उनकी राह निहारते रहते हैं और पल-पल उनकी प्रतीक्षा करते रहते हैं। इसी प्रकार ईश्वर भी हरपल इसी प्रतीक्षा में रहता है कि हम उसके बच्चे कब उसकी ओर उन्मुख होंगे? हम ऐसे नालायक बच्चे हैं कि संसार के झमेलों से मुक्त ही नहीं हो पाते। उसके विषय में सोचना ही नहीं चाहते।
          यही स्थिति हमारी है हम भौतिक आकर्षणों के कारण, कभी सांसारिक बन्धनों को निभाने के नाम पर, कभी अपनी बिमारियों का ढोल पीटते हुए या फिर अपनी व्यस्तताओं का रोना रोते हुए उस प्रभु से दूर होते जाते हैं। हमारे लौट आने की प्रतीक्षा करता हुआ वह वहीं खड़ा रहता है। जब हम सच्चे मन से भाव-विभोर होकर उसे पुकारते हैं तो वह हमें अपने में समेट लेने के लिए आतुर हो जाता है। जब हम तन और मन से पवित्र हो जाते हैं, तब ईश्वर के और करीब हो जाते हैं।
              हमारे विद्वान मनीषी हमें समझाते हैं कि कस्तूरी की तरह हमारे अपने हृदय में विद्यमान उस परमेश्वर की सुगन्ध को पाने के लिए अनावश्यक भटकाव से मुक्त होकर स्वयं को उसके योग्य बनाओ। अपने मन को मन्दिर की तरह पवित्र बनाने के लिए वे बल देते हैं ताकि वहाँ पर ईश्वर का वास हो सके। दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं कि तभी हम ईश्वर के साथ एकाकार या ईश्वरमय हो सकते हैं।
चन्द्र प्रभा सूद 

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें