मंगलवार, 21 अक्टूबर 2025

अपने मुॅंह मियॉं मिट्ठू बनना

अपने मुँह मियाँ मिट्ठू बनना

मनुष्य के कार्य ऐसे होने चाहिए जो बिना कहे ही अपना स्वयं परिचय दे सकें और सामने वाले पर अपनी छाप छोड़ दें। लोग स्वयं उनके कार्यों को सदा स्मरण करें, उनकी प्रशंसा करने के लिए विवश हो जाएँ। मुझे आज तक यह बात समझ में नहीं आई कि मनुष्य को अपनी तारीफ करने की आवश्यकता क्यों महसूस होती है? आजकल पता नहीं लोग अपनी प्रशस्तियॉं क्यों बढ़-चढ़कर करते हैं? उन्हें अपने सामने दूसरे लोग क्यों बौने प्रतीत होते हैं? इसे मनुष्य का अहंकार करना ही कहा जा सकता है।
              अपने मुँह मियाँ मिट्ठू बनना तो कोई अच्छी बात नहीं है। इसका सीधा-सा अर्थ यही है कि कोई व्यक्ति केवल अपनी ही तारीफ करता रहता है, दूसरों से अपनी प्रशंसा सुनना ही नहीं चाहता। ऐसा व्यक्ति जो हमेशा अपनी तारीफों के पुल स्वयं बॉंधता रहता है, लोग उसे नापसन्द करते हैं और अहंकारी की पदवी देते हैं। सामने किसी कारणवश उसकी हाँ में चाहे हाँ मिलाएँ पर पीठ पीछे उसकी जमकर निन्दा करते हैं। 
             ऐसे व्यक्ति को लोग आत्म मुग्ध भी कहते हैं। यानी जब मनुष्य अपने आप पर आवश्यकता से अधिक ध्यान देने लगता है, स्वयं को सबसे महान, सबसे अच्छा समझ कर दूसरों की परवाह नहीं करता। अपने आप में ही लीन हो जाने को ही आत्म मुग्धता कहते हैं। ऐसे मनुष्य दीन-दुनिया से बेखबर हो जाते हैं और हानि उठाते हैं।
              दूसरे लोगों की प्रशंसा में प्रशस्ति गान करना चारण और भाटों का ही कार्य माना जाता था। उन्हें समाज में कोई ऐसा विशेष सम्मान नहीं मिलता था। आजकल भी हमारे आसपास इस केटेगरी के बहुत से लोग विद्यमान हैं या यूँ कहें कि बहुतायत में मिल जाते हैं। 'चमचे या कड़छे' कहकर लोग उनका उपहास करते हैं। ये लोग चिकने घड़े होते हैं, इन लोगों पर सामने वाले के कटाक्षों का कोई प्रभाव नहीं पड़ता। ये लोग इन सम्बोधनों को सुनकर प्रसन्न होते हैं।
        यदि हम दूसरों से अपनी प्रशंसा सुनना चाहते हैं तो सबसे पहले हमें अपने व्यवहार को बदलना होगा। अपने अंतस की कमियों को ढूँढ-ढूँढ कर उन्हें दूर करना होगा। देश, धर्म, समाज और अपने घर-परिवार के सभी दायित्वों को दक्षता से पूरा करना होगा। जहाँ तक हो सके अपने मानस को भी आलोचना के लिए भी तैयार करना होगा। दुनिया दुर्जनों की आलोचना करती है तो सज्जनों का विरोध करने से भी नहीं चूकती। इसके लिए बताने की आवश्यकता नहीं है। सभी महापुरुषों, समाजसेवियों को हम इस श्रेणी में रख सकते हैं जिन्हें अपने जीवनकाल में असहनीय कष्टों का सामना करना पड़ा पर वे धीर लोग अपने लक्ष्य से नहीं हटे।न
           एक उदाहरण देखते हैं। एक कुम्हार अपने बेटे और गधे के साथ पैदल चल रहा था। किसी ने छींटाकशी की, '"कितना पागल है? सवारी साथ है पर दोनों बाप-बेटा पैदल चल रहे हैं।" 
           कुम्हार ने अपने बेटे को गधे पर बिठा दिया और पैदल चलने लगा। थोड़ी देर बाद किसी ने ताना मारा, "बूढ़ा बाप पैदल चल रहा है और जवान बेटा सवारी कर रहा है।" 
           अब कुम्हार स्वयं गधे पर बैठ गया और बेटा पैदल चलने लगा। कुछ दूरी तय करने पर फिर किसी ने कुम्हार को कोसा, " बच्चा बेचारा पैदल चल रहा है। बाप को शर्म भी नहीं आ रही।"
             लोगों के थाने सुन-सुनकर कुम्हार और उसका बेटा दोनों परेशान हो गए। अब वे दोनों गधे पर सवार हो गए तो फिर किसी मनचले ने कटाक्ष किया, "दोनों बाप-बेटे इस बेजुबान की जान लोगे क्या?" 
             अब उन दोनों को गुस्सा आ गया और वे दोनों गधे को उठाकर चलने लगे। तब भी लोगों को चैन नहीं आया और उनका उपहास करने लगे,"इन बाप-बेटे जैसा मूर्ख नहीं देखा जो गधे जैसी सवारी के होते हुए पैदल चल रहे हैं। इन  लोगों ने गधे को उठा रखा हैं।"
              कहने का तात्पर्य यह है कि कुछ भी कर लो यह दुनिया तो किसी भी तरह से जीने नहीं देती। हमें हार नहीं माननी है। संसार को झुकने पर विवश कर देना है। जब लोग देखते हैं कि व्यक्ति विशेष की कितनी भी आलोचना कर लो, उस पर कोई असर नहीं होता। इसके गुणों की कीर्ति की सुगन्ध चारों ओर फैलती ही जा रही है तो वे हारकर चुप हो जाते हैं। लोगों को अपने गुणों का आकलन करते रहने दीजिए। समय बीतते-बीतते वे स्वयं समझ जाएँगे कि फलाँ व्यक्ति गहरे पैठा हुआ है। उसके गुणों से प्रभावित हुए बिना कोई नहीं रह सकता तो वे भी उनका बखान भी वे अवश्य ही करेंगे। 
          अपनी प्रशंसा में कसीदे पढ़कर ओछा या अहंकारी बनने से अच्छा है कि समाज को परखने का अवसर दीजिए। अपनी अच्छाइयों को आप पर्दों में छिपाकर नहीं रख सकते। वे तो फूलों की सुगन्ध की तरह सभी दिशाओं को सुवासित करेंगी। शेष सब ईश्वर पर छोड़ दें। वह आपके सद् गुणों व सुचरित्र को निस्सन्देह सराहेगा।
चन्द्र प्रभा सूद 

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