बुधवार, 1 अक्टूबर 2025

अन्न से रिश्ता

अन्न से रिश्ता 

अन्न से मनुष्य का बहुत गहरा रिश्ता है। मनुष्य अन्न के बिना बहुत समय तक जीवित नहीं रह सकता। दिन में वह कई-कई बार खाता है, फिर भी उसका पेट नहीं भरता। ईश्वर ने मनुष्य को इस प्रकार बनाया है कि वह इस अन्न को प्राप्त करने के लिए अथक परिश्रम करता है। अन्न को भरतीय संस्कृति में ब्रह्म कहते हैं। 'अन्नं वै ब्रह्म' ऐसा कहकर अन्न के महत्त्व को प्रतिपादित किया गया है। वैसे भी हमारे बड़े-बजुर्ग कहा करते हैं- 'अन्न भगवान होता है। इसे झूठा नहीं छोड़ना चाहिए। यदि इसे झूठा छोड़ो तो भगवान जी नाराज हो जाते हैं।'
             उपनिषद कहती है- 'अन्न प्राण हैं। इसका अपमान न करो। अन्न से अन्न को बढ़ाओ।'
            कहने का अभिप्राय यह है कि यदि अन्न को नष्ट करेंगे तो प्राणों का संकट उत्पन्न हो जाएगा। प्राण नहीं रहेंगे तो फिर जीवन समाप्त हो जाएगा। यदि हम स्वार्थी बन जाएँ तो शायद अन्न को बर्बाद होने से बचा सकते हैं। जो अन्न को नष्ट करता है, ईश्वर उसे क्षमा नहीं करता अपितु नष्ट कर देता है। वर्षा न होने पर अकाल पड़ना इसी अन्न की बरबादी का कारण होता है। ईश्वर हमें समझाना चाहता है पर हम इतने नासमझ हैं जो अनजान बन जाते हैं और समझना ही नहीं चाहते। अतः अपनी मूर्खता के कारण हम कष्ट सहन करने के लिए विवश हो जाते हैं।
               मुट्ठी भर अन्न के दानों को जब किसान बीज के रूप में बोता है तो उससे न जाने कितने क्विंटल अनाज पैदा हो जाता है। जिस अन्न की हम बर्बादी करते हैं, वही बहुत से दूसरे लोगों को खाने के लिए नहीं मिलता। जिस दिन यह सोच हमारे मन को झकझोर देगी, उस दिन से हम अन्न की सुरक्षा करने के लिए कटिबद्ध हो जाऍंगे। कोई दूसरा भी व्यक्ति यदि अन्न का अनादर करेगा तो उसे भी हम रोकने का प्रयास करेंगे। हम जितना भोजन खा सकते हैं, उतना मात्र ही हमें लेना चाहिए। उस अन्न को व्यर्थ में झूठा छोड़कर फैंकना बिल्कुल अच्छी बात नहीं है।
              यह सत्य है कि इस भोजन को पाने के लिए मनुष्य सारे कर्म-कुकर्म करता है, सच-झूठ करता है। वह दिन-रात अथक परिश्रम करके दो जून का खाना जुटाता है। हमारे देश में क्या विश्व में भी बहुत से लोग ऐसे भाग्यहीन लोग हैं जो जी तोड़ मेहनत करने के बाद भी अपने और अपने परिवार के लिए दो समय का भोजन नहीं जुटा पाते। इनसे भी अधिक दुर्भाग्यशाली वे लोग हैं जिन्हें कई-कई दिन तक भोजन नसीब नहीं होता। वे भोजन के लिए तरसते रहते हैं।
              भोजन न मिलने के कारण कुछ लोग और उनके बच्चे कुपोषण का शिकार होकर अनेक बीमारियों की चपेट में आ जाते हैं और अपने प्राणों तक से हाथ धो बैठते हैं। शायद हम में से बहुत से लोगों ने बच्चों को कचरे में से खाने के पदार्थ ढूँढकर या बाहर फैंके हुए अन्न को खाते हुए देखा होगा जो एक सभ्य समाज के लिए बहुत शर्म की बात है। यदि इन लोगों के बारे में हम एक बार भी सोच लें, तो कभी अन्न की बरबादी नहीं कर सकेंगे। हमारे पास ईश्वर की कृपा से पर्याप्त अन्न है तो उसे बर्बाद नहीं करना चाहिए।
             शादियों, पार्टियों एवं होटलों में जहाँ जाते हैं और वहाँ भोजन की थाली में झूठा छोड़ने को हम अपनी शान समझते हैं। कैसी सोच है हमारी कि घर में खाने का नुकसान नहीं करना क्योंकि वह अपने पैसे से खरीदा हुआ होता है। पर घर के बाहर जाते ही वही अन्न हमारी तथाकथित उच्च सोसाइटी के लिए प्रदर्शन का कारण बन जाता है। हम उस समय इस बात को भूल जाते हैं कि वहाँ पर जिस अन्न को हम बर्बाद कर रहे हैं, उसके लिए भी किसी के गाढ़े पसीने की कमाई खर्च की गई है।
              यदि ईश्वर ने दौलत दी है तो कभी-कभार हमें अनाथालयों में जाकर उन यतीम बच्चों को पेटभर भोजन खिलाना चाहिए। उन लोगों को कई-कई दिन तक अन्न का एक भी दाना नसीब नहीं होता। ऐसे भूखे लोगों के लिए लंगर लगवा दीजिए। उनके पेट भरेंगे तो उनके मन से निकली दुआएँ आपको मिलेंगी। इससे मनुष्य इहलोक व परलोक दोनों सुधरेंगे। साथ ही दान देने या सामाजिक दायित्व निभा पाने का सुख व सन्तोष भी मिलेगा जिसको कभी भी दुनियावी सिक्कों से नहीं तौल सकते।
               आजकल कुछ समाजसेवी ऐसा कर रहे हैं कि शादी-पार्टी आदि में बचे भोजन को खरीद कर जरूरतमन्दों को बाँट देते हैं। अपने घर में हम सब कर सकते हैं कि घर में पार्टी आदि होने पर बचे हुए भोजन को किसी अनाथालय में जाकर दे आएँ या उन्हें बुलाकर दे दें। इसके अतिरिक्त अपने आसपास रहने वाले श्रमिकों या गरीबों को वह भोजन दे दें। इससे अन्न को बर्बाद होने से हम बचा सकते हैं और उन लोगों को भी स्वादिष्ट भोजन खाने को मिल सकेगा।
चन्द्र प्रभा सूद 

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