सोमवार, 27 अक्टूबर 2025

मनुष्य एक मुसाफिर

मनुष्य एक मुसाफिर 

मनुष्य इस असार संसार में एक मुसाफिर (यात्री) की तरह होता है। वह यहाँ आता है, कुछ समय तक रहता है, अपने हिस्से के कार्य निपटाता है और फिर इस संसार से विदा लेकर चल पड़ता है, एक नए पड़ाव की यात्रा के लिए। उसकी इन अनन्त यात्राओं का क्रम तब तक जारी रहता है जब तक वह अपने स्थायी निवास यानी परमधाम मोक्ष को प्राप्त नहीं कर लेता। मनुष्य का जीवन अपने परमधाम से आरम्भ होता है, उसकी समाप्ति भी वहीं पर जाकर ही होती है।     
              इस कथन को हम इस प्रकार समझते हैं। भौतिक जीवन में हमारा अपना एक घर होता है। वहॉं पर हम अपने परिवार के साथ सुखपूर्वक रहते हैं। समय-समय पर हम भ्रमण के लिए भी जाते हैं। यात्रा का समय और स्थान निश्चित करके आवश्यक कार्यवाही कर लेते हैं। फिर निर्धारित समय पर हम अपनी मनचाही यात्रा के लिए खुशी-खुशी निकल जाते हैं। वहॉं मौज-मस्ती करके प्रसन्न होकर हम अपने घर वापिस लौट आते हैं। ठीक उसी प्रकार जैसे हमारी आत्मा संसार में अपना मिला हुआ समय बिताकर वापिस चली जाती है।
          हम सब लोग यात्राएँ करते रहते हैं। इसलिए सभी भली-भाँति यह बात जानते हैं कि जब कभी हम किसी होटल या रिसार्ट में कुछ दिनों के लिए ठहरते हैं, वह हमारा स्थायी निवास नहीं होता। हम उस स्थान को दो-चार दिन ठहरने के लिए किराए पर ले लेते हैं। जब निश्चित अवधि समाप्त हो जाती है तब उसे खाली करके वापिस अपने घर लौट आते हैं। उस समय हमारे मन में उस स्थान को छोड़ने का कोई दुख नहीं होता। हम खुशी-खुशी उस स्थान को छोड़ कर लौटते हैं।
              इसका तात्पर्य यही हुआ कि उस स्थान विशेष से हमें कोई मोह नहीं होता। हम वहॉं पर यही सोचकर जाते हैं कि हमने कितने दिन वहाँ रुकना है। हम घूमते-फिरते हैं और मौज-मस्ती करके आनन्दित होते हुए लौट आते हैं। उसी प्रकार यह संसार भी एक होटल या रिसार्ट की तरह ही है जहाँ हम कुछ समय के लिए आते हैं। वह अवधि हमारे पूर्वजन्म कृत कर्मों के अनुसार ईश्वर हमें देता है। उस अवधि के पूर्ण हो जाने पर इस संसार को छोड़कर जाना होता है। हम इस संसार को अपना घर मान लेते हैं। इसलिए इससे विदा लेना नहीं चाहते। यदि कोई हमें कह दे कि हमारी आयु के कुछ दिन शेष बचे हैं तो सुनकर अच्छा नहीं लगता। हम उसे बुरा-भला कहने में संकोच नहीं करते।
            एक गीत की पंक्ति मुझे इस विषय पर याद आ रही है-
       यह दुनिया मुसाफिर खाना सराय
       कोई आ आए कोई चला जा रहा।
इस दुनिया में आकर हम लोगों को अपने कर्मानुसार सांसारिक रिश्ते-नातों का उपहार मिलता है। उनमें हम इतना अधिक खो जाते हैं कि दीन-दुनिया को भुला बैठते हैं। हमारा सारा व्यापार इन्हीं के इर्द-गिर्द घूमता रहता है और हमारे प्राण भी इन्हीं में ही बसते हैं। उन्हीं को लेकर हम अपनी एक दुनिया बना लेते हैं। हमारा जीना-मरना सब उनके लिए होता है। सब पाप-पुण्य और छल-फरेब हम उन्हीं के लिए करते हैं। इस जीवन को पाने की वास्तविकता को हम भूल जाते हैं।
             ऋषि-मुनि और विद्वान हमें समय-समय पर सचेत करने का प्रयास करते रहते हैं कि यह मोह-माया मात्र मृगतृष्णा है और कुछ नहीं। जाग जाओ और उस प्रभु में अपना ध्यान लगाओ। पर हम ऐसी नींद सो रहे हैं कि जागना ही नहीं चाहते। इसीलिए किसी ने कहा है-
      उठ जाग मुसाफिर भोर भयी 
      अब रैन  कहाँ  जो  सोवत है।
      जो  सोवत  है वह  खोवत  है
      जो  जागत  है सो  पावत  है।।
ये पंक्तियाँ हमें जगा रही हैं कि अब तो उठ जाओ आलस्य छोड़ो। यह सोने का समय नहीं है। प्रभु की कृपा पाने का यह समय है उसे व्यर्थ न गंवाओ। जब हमारा यह शरीर अशक्त हो जाएगा तब चाहकर भी हम उस मालिक का ध्यान नहीं कर सकेंगे। केवल पश्चाताप करते रह जाना पड़ेगा। इसलिए अभी से सावधान हो जाओ। जो जागता है वही परमेश्वर का कृपापात्र बनता है। जो सचेत नहीं होना चाहता वह इस संसार में बहुत कुछ गंवा देता है उसे जन्म-मरण के चक्र से छुटकारा नहीं मिलता। 
             सुधीजन जानते हैं कि ईश्वर सच्ची लगन और भावना चाहता है, प्रदर्शन नहीं। उसे हम लोगों से और कुछ भी नहीं चाहिए होता। वह तो स्वयं ही सारे ऐश्वर्यों का भण्डार है। वह बिनमॉंगे हमें सब नेमते देता रहता है। हमारे पास उसे देने के लिए और कुछ भी नहीं है। इसलिए सच्चे मन से उसका स्मरण करना चाहिए। तभी भवबन्धन से मुक्ति सम्भव हो सकती है। अन्यथा चौरासी लाख योनियों के फेर में जीव भटकता रहता है। उसे कहीं भी शान्ति नहीं मिल पाती। 
चन्द्र प्रभा सूद 

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें