बुधवार, 22 अक्टूबर 2025

सफलता का मित्र अकेलापन

सफलता का मित्र अकेलापन

हर मनुष्य चाहे वह किसी भी क्षेत्र में हो, अपने जीवन में सफल ही होना चाहता है। वह कभी भी असफलता का मुॅंह नहीं देखना चाहता। उसके लिए अपनी सामर्थ्यानुसार जी-तोड़ परिश्रम भी करता है। इस प्रयत्न में वह कभी सफल हो जाता है तो कभी असफल होता है। जैसे-जैसे मनुष्य सफलता की सीढ़ियॉं चढ़ता जाता है, अकेलापन उसका साथी बन जाता है। गम्भीरतापूर्वक विचार करने योग्य यह प्रश्न यह उठता है कि सफलता ढिंढोरा पीटते हुए क्यों नहीं आती? उसका मित्र अकेलापन ही क्यों बन जाता है? 
            हम यदि कोई कार्य करते हैं तो उसके लिए आडम्बर रचाते रहते हैं। अपनी तारीफों के पुल बॉंधते नहीं थकते। जोर-शोर से चारों ओर अपनी हवा फैलाते हैं। ये सब हम समाचार पत्रों में पढ़ते रहते हैं, टीवी पर देखते हैं, रेडियो पर सुनते हैं, सोशल मीडिया पर पढ़ते हैं। यानी प्रतिदिन पढ़ते, देखते व सुनते रहते हैं। उनके ये कार्य कितने सफल हो पाते हैं या वे असफल होते हैं, इस विषय में केवल समय ही बता सकता है। यदि वे सफल हो जाते हैं तो पूरे नहीं समाते। असफल होने पर बगलें झॉंकने लगते हैं।
             हम लोग सदा अपनी-अपनी हाँकते रहते हैं। किसी दूसरे व्यक्ति की बात हम बिल्कुल सुनना नहीं चाहते। हमें अपने बराबर कोई दूसरा दिखाई नहीं देता। हमें समाज की अथवा जन साधारण की कोई परवाह नहीं होती। ऐसे अवसरों पर हमारी चमड़ी मोटी हो जाती है। हम चिकने घड़े की तरह बन जाते हैं और निर्लज्ज होकर बस दाँत निपोरते रहते हैं। यह स्थिति किसी तरह से उचित नहीं कही जा सकती।
            जब व्यक्ति जीवन में दिन-प्रतिदिन सफलता की सीढ़ियाँ चढ़ता जाता है तब वह धीरे-धीरे अकेला होने लगता है। कार्य की अधिकता के कारण उसके पास अपने लिए ही समय नहीं बचता तो घर-परिवार के लिए कहाँ से समय निकाले? प्रातः घर से जल्दी निकलना और देर रात घर पर वापिस लौटना ही उसके कार्यक्रम का अंग बन जाते हैं। यदि वह कभी अस्वस्थ हो जाए तो आराम करने का समय भी अपने लिए नहीं निकाल पाता। उसकी व्यस्तता उसे सबसे काटकर अलग-थलग कर देती है। इसके अतिरिक्त नौकरी या व्यवसाय के कारण कई दिनों तक घर से बाहर देश अथवा विदेश जाना हो तो समस्या और बढ़ जाती है।
            उसे अपने माता-पिता, पत्नी, बच्चों, मित्रों व रिश्तेदारों आदि के उलाहनों का सामना तो नित्य प्रतिदिन करना पड़ता है। अपने घर और बच्चों के लिए वह हर तरह की सुख-सुविधाएँ जुटाता है। उसके द्वारा लाए गए कीमती उपहारों की शान सभी लोग बघारते हैं और उनका उपभोग भी करते हैं। फिर भी वे उसे जिम्मेदारियों से भागने का या मुँह मोड़ लेने का दोष देने से नहीं चूकते। ऐसा करके वे उसके मन को जाने-अनजाने कष्ट पहुॅंचाने का कार्य करते हैं।
            सभी लोग उससे सदा नाराज रहते हैं। कोई उसकी विवशताओं को समझना ही नहीं चाहता। सभी सोचते हैं कि ऊँची पदवी पर पहुँचा वह किसी के साथ सम्बन्ध ही नहीं रखना चाहता क्योंकि उसकी नाक नीची होती है। इसलिए सबसे न मिलने के लिए नित्य नये बहाने बनाता रहता है। लोग यह बात नहीं समझते कि जितने उच्च पद पर व्यक्ति होता है, उसका उत्तरदायित्व उतना ही बढ़ जाता है। उसके पास वास्तव में समय का अभाव हो जाता है। वह चाहकर भी अपने बन्धु-बान्धवों को मनचाहा समय नहीं दे पाता। 
               उसकी कठिनाइयों को कोई भी समझना नहीं चाहता। धीरे-धीरे वह मशीन की तरह बन जाता है। उसके पास इन सब ऊल-जलूल प्रश्नों के उत्तर देने का समय नहीं होता। अपने कार्यों में खोया रहता है और उन्हीं को ही आगे बढ़ाता रहता है। वैसे देखा जाए तो जितनी ऊॅंचाई पर मनुष्य खड़ा होता है, उसे नीचे खालीपन ही दिखाई देता है। ऐसा तो नहीं हो सकता कि मनुष्य अपने जीवनकाल में इसलिए ऊपर न उठे कि उसे अकेलेपन का दंश झेलना पड़ेगा।
             इस सृष्टि का नियम है कि जो अपने कार्यों का सफलतापूर्वक निर्वहण करता है, वह सूर्य की तरह आकाश में अकेला ही चमकता है। सिंह की भाँति जंगल में वह अकेले ही विचरण करता है। उसका तेज उसे दूसरों की तुलना में विलक्षण बनाता है। रवीन्द्रनाथ टैगोर ने कहा है, 'एकला चलो रे' इसीलिए कहा है। इसका अर्थ है अकेले चलो। इस बात को हम इस प्रकार भी कह सकते हैं कि इस संसार में मनुष्य अकेला आता है और अकेले ही प्रस्थान करता है।
            एवंविध यह तो सत्य है कि सफलता अपने साथ अकेलेपन को लेकर आती है। ऐसे सफल व्यक्तियों से ईर्ष्या न करके उनसे कुछ सीखने की आवश्यकता है। उनके पदचिह्नों पर चलकर महान लोगों की श्रेणी में आने का यथासम्भव प्रयास सभी को करना चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद 

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