सोमवार, 6 अक्टूबर 2025

ओल्ड होम्स की आवश्यकता

ओल्ड होम्स की आवश्यकता

ओल्ड होम्स की आवश्यकता भारतीय संस्कृति के अनुसार है ही नहीं। हमारे पारिवारिक ढाँचे की ऐसी परिकल्पना की गई है कि उसमें इन होम्स की जरूरत को महसूस ही नहीं किया जाता।
              हमारे ऋषि-मुनियों और ग्रन्थों ने हमें घुट्टी में पिलाया है -
             मातृदेवो भव पितृदेवो भव 
अर्थात् माता-पिता भगवान का रूप होते हैं। वे इस संसार में लाने का जो उपकार हम पर करते हैं। उस ऋण को जीवन भर उनकी सेवा करके नहीं चुकाया जा सकता। मन्दिरों में न जाकर भी यदि बच्चे अपने माता-पिता की सेवा-सुश्रुषा करते हैं, उनकी सभी आवश्यकताओं को पूरा करते हैं तो उन्हें ईश्वर की पूजा जैसा ही फल मिलता है।
                 वरिष्ठ नागरिकों को, अपनी सेवानिवृत्ति के बाद प्रायः अनेक समस्याओं का सामना करना पड़ता है।‌ सामाजिक मेलजोल में कमी के कारण, जीवनसाथी की कमी से लेकर शहरों में जीवन की आपाधापी के साथ तालमेल न बिठा पाने के कारण उन्हें मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य से जुड़ी समस्याओं का सामना करना पड़ता है। सामाजिक अलगाव के मूल तथ्य से अन्य समस्याग्रस्त मुद्दे उत्पन्न हो सकते हैं। उनके स्वर्णिम वर्षों को जो आराम और शान्ति से व्यतीत किए जाने चाहिए, एक कठिन संघर्ष में बदल सकते हैं।
                 ओल्ड होम्स ऐसे स्थान होते हैं जहाँ वृद्धावस्था में वे लोग रहते हैं जो किसी भी कारण से असहाय होते हैं या फिर उनकी देखभाल करने वाला कोई नहीं होता। इन होम्स में उनका ध्यान रखा जाता है। बीमार पड़ने पर इलाज कराया जाता है। वहीं पर वे खाते-पीते हैं, मनोरंजन करते हैं।    वहॉं पर नियमित स्वास्थ्य जाँच, टीकाकरण और स्वास्थ्य सलाह जैसी चिकित्सा देखभाल और स्वास्थ्य सेवाएँ दी जाती हैं। वृद्धजनों को पौष्टिक भोजन भी प्रदान करते हैं। वे भ्रमण, पिकनिक, सैर-सपाटे और अन्य सामाजिक गतिविधियों का भी आयोजन करते रहते हैं।
             अपने जैसे साथियों के साथ रहकर लोग अन्तिम समय में जीवन के दिन गिन-गिनकर व्यतीत करते हैं। अपनी यादों के सहारे वे असहाय वृद्ध रोते-बिलखते हुए अपने बचे हुए दिन पूरे करते हैं। वहाँ रहते हुए कभी वे ईश्वर से अपने असहाय होने के बारे में पूछते रहते हैं और कभी बैठे हुए अपने दुर्भाग्य पर आँसू बहाते रहते हैं। इसके अतिरिक्त वे वृद्ध बेचारे और कुछ भी नहीं कर सकते।
          पश्चिमी सभ्यता में इन होम्स की जरूरत महसूस की जाती है। वहाँ की पारिवारिक परम्पराएँ चरमरा रही हैं। वहाँ युवा होते ही बच्चे माता-पिता को छोड़कर अपना बसेरा बना लेते हैं। वहाँ लोग बड़ी शान से अपने अगणित विवाहों की संख्या को बताते हैं। यह कहना गलत नहीं होगा कि उन देशों में वृद्धावस्था में माता-पिता ओल्ड होम्स में रहने के लिए विवश होते हैं या यूँ कहें कि उनके पास कोई और चारा नहीं होता। 
        उन देशों में वृद्धों की देखभाल का दायित्व सरकार पर होता है। बच्चे उन्हें यदाकदा मिलने आ जाते हैं। उनके लिए वही इक्के-दुक्के दिन त्योहार की तरह बन जाते हैं। 
            हमारे देश में कुछ समय पूर्व तक संयुक्त परिवार हुआ करते थे। वहॉं घर के बुजुर्गों की देखभाल सुविधापूर्वक हो जाती थी। आजकल किसी भी कारण से एकल परिवारों का प्रचलन बढ़ रहा रहा है। पति-पत्नी दोनों ही नौकरी करते हैं। इसलिए यह समस्या बढ़ने लगी है। स्थिति कोई भी हो पर माता-पिता की सुरक्षा और सेवा का दायित्व बच्चों पर होता है। वे अपने इस दायित्व से मुॅंह नहीं मोड़ सकते।
          भारतीय सामाजिक व्यवस्था में चार आश्रमों का विधान है- 
1. ब्रह्मचर्याश्रम में पच्चीस वर्ष तक शिक्षा ग्रहण की जाती है।
2. गृहस्थाश्रम में विवाहोपरान्त अपने दायित्वों का निर्वहण किया जाता है।
3. वानप्रस्थाश्रम में अपने घर-परिवार के दायित्वों को पूर्ण करके ईश्वर की ओर उन्मुख होना होता है।
4. सन्यासाश्रम में अपने ज्ञान व अनुभव को लोगों को बाँटना होता है। इसके लिए आवश्यक नहीं कि घरबार छोड़ दिया जाए। बल्कि ईश्वर की उपासना करते हुए निस्पृह जीवन व्यतीत करना होता है।
               मेरा मानना है कि वे सभी बच्चे बड़े बहुत दुर्भाग्यशाली होते हैं जो स्वप्न में भी अपने माता-पिता को अपने से अलग करके वृद्धाश्रम में भेजने के विषय में सोचते हैं। उन्हें अपने घर से निकाल कर असहाय बना देते हैं या ओल्ड होम्स में रहने के लिए विवश करते हैं। भारतीय समाज ऐसे बच्चों को सदा लानत भेजता है और उनके प्रति अपने हृदयों में दुर्भावना रखता है।  
            अपने माता-पिता की सारी सुख-सुविधाओं का ध्यान रखने वाले बच्चों को आज भी श्रवण कुमार कहकर सम्मानित किया जाता है। ऐसे बच्चों व उनके माता-पिता सभी के आदर्श होते हैं। सारा जीवन परिश्रम करने वाले जीवन के इस अन्तिम पड़ाव में आकर वृद्धों को अपनों से दूर परायों के साथ जीने के लिए विवश होना पड़ता है। यह स्थिति किसी भी सभ्य समाज के लिए सह्य नहीं है।
चन्द्र प्रभा सूद 

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