सबके मंगल की कामना
हम उस ईश्वर से क्या मॉंगें जो बिना माँगे ही हमें हर प्रकार से मालामाल कर देता है। दिन हो या रात वह सदा हमारी ही चिन्ता में रहता है। हम उसकी इस दयालुता को समझ पाने में असमर्थ रहते हैं। हमारे ऋषि-मुनि हमें कहते हैं सबके मंगल की कामना की परमात्मा से करो।
'बृहदारण्यक उपनिषद' का एक प्रसिद्ध मन्त्र है। निम्न मन्त्र में सभी मनुष्यों के सुखी और स्वस्थ जीवन की कामना की गई है -
सर्वे भवन्तु सुखिन:
सर्वे सन्तु निरामया:।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु
मा कश्चित् दुखभाग्भवेत्॥
अर्थात् सभी लोग सुखी रहें, सभी स्वस्थ रहें, सभी कल्याण को देखें और किसी के पास कोई कष्ट न आए।
यह मन्त्र एक सार्वभौमिक भावना व्यक्त करता है। हम सभी एक-दूसरे के साथ जुड़े हुए हैं और हम सभी को खुशी और समृद्धि का जीवन जीना चाहिए। सबके मंगल की कामना है का अर्थ है सभी के कल्याण की इच्छा है। सबका भला हो, यह एक प्रार्थना है जो सभी के अच्छे स्वास्थ्य, खुशी और समृद्धि के लिए की जाती है। यह एक प्रकार से सकारात्मक भावना है जो दूसरों के प्रति सहानुभूति और प्रेम व्यक्त करती है। यह एक लोकप्रिय प्रार्थना है जो अक्सर धार्मिक और आध्यात्मिक सन्दर्भों में कही जाती है।
यदि ऐसी कामना सभी मनुष्य करने लगें तो स्वार्थ परमार्थ में बदल जाएगा। मैं, मेरा घर, मेरा परिवार, मेरे बच्चे, मेरी गाड़ी, मेरा व्यापार आदि की संकुचित भावना से हम ऊपर उठकर हम व्यष्टि (सब) के बारे में सोचेंगे तो निश्चित ही ईश्वर प्रसन्न होता है। वह स्वयं प्राणिमात्र का हित चिन्तक है। उसे स्वार्थी लोग बिल्कुल पसन्द नहीं आते। है। वह सबके साथ एक जैसा व्यवहार करता है। इसलिए वह चाहता है कि उसकी बनाई हुई इस सृष्टि के साथ हम लोग भी वैसा ही व्यवहार करें। किसी के साथ भेदभाव न करें।
हमारे देश में जो भी समाज सुधारक हुए हैं, उन्होंने समाज की दिशा और दशा बदलने के लिए अपने दिन-रात का सुख-चैन गॅंवाकर कार्य किए। वे सदा यत्न करते रहे कि सभी के हित को साध सकें। वे बिना किसी भेदभाव के निस्वार्थ भाव से मानवता की सेवा में जुटे रहे। इसी प्रकार परोपकारी लोग भी अपने घर-परिवार के साथ-साथ सबकी भलाई के कार्य करते हैं। तभी वे इस संसार में अग्रणी बन जाते हैं और युगों तक स्मरण किए जाते हैं।
महापुरुष सदा रंग-रूप, जाति-पाति, ऊँच-नीच, अमीर-गरीब आदि के बन्धनों से परे रहते हैं। सभी इनकी नजर में बराबर रहते हैं। तभी ये लोग समाज में कल्याण के कार्य कर पाते हैं। और हम लोग उनके धैर्य की परीक्षाएँ लेते रहते हैं। कभी उन्हें विष देकर, कभी सूली पर लटका कर, कभी पत्थर मारकर या कभी उन्हें अपमानित करके सुकून महसूस करते हैं और उनके इस दुनिया से विदा लेने पर उनकी प्रशंसा में गीत गाते हैं।
कबीरदास जी इसी तरह सबके मंगल की कामना करते हुए कहते हैं-
कबीरा खड़ा बाजार में मांगे सबकी खैर।
न काहू से दोस्ती और न काहू से बैर॥
अर्थात इस संसार रूपी मण्डी में कबीरदास जी सबका हित चाहते हुए ईश्वर से प्रार्थना करते हैं। उन्हें न किसी से शत्रुता है और न ही मित्रता है। सभी उनके अपने हैं, कोई भी पराया नहीं।
'महोपनिषद' में कहा गया यह मन्त्रॉंश हमारी महान भारतीय संस्कृति का एक महत्वपूर्ण नैतिक मूल्य माना जाता है -
वसुधैव कुटुम्बकम्
अर्थात् सम्पूर्ण पृथ्वी हमारा परिवार है। यह कहकर हमारे शास्त्रों ने हम लोगों को अनुशासित करने का प्रयास किया है। यह एक दार्शनिक अवधारणा है जो सार्वभौमिक भाईचारे और एकता के विचार को बढ़ावा देती है।
इस प्रकार यदि हम सभी प्राणियों का हित साधने के लिए ईश्वर से याचना करेंगे तो हम भी उन सबमें आ जाएँगे। तब हमें स्वयं के लिए अलग से मॉंगने की आवश्यकता ही नहीं रह जाएगी। हमारे मन को असीम शान्ति का अनुभव होगा जिसके लिए हम तथाकथित साधु-सन्तों के पास जाते हैं। तीर्थ स्थानों पर जंगलों में भटकते रहते हैं। जंगलों की खाक छानते हैं। परन्तु वह मन की शान्ति हमें कहीं नहीं मिलती।
हमें ईश्वर से भौतिक सुख-समृद्धि न मॉंगकर धैर्य, जिजीविषा, सद् बुद्धि और परोपकार की शक्ति आदि की कामना करनी चाहिए। ऐसी विद्या मॉंगनी चाहिए जो हमें प्रभु तक हमें पहुँचा सके। इन सबके साथ ही हमें हर समय और हरपल उसकी उपासना करने की सामर्थ्य की याचना करनी चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद
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