गुरुवार, 23 अक्टूबर 2025

आलस्य की प्रवृत्ति का त्याग

आलस्य की प्रवृत्ति का त्याग

बड़े-बजुर्ग कहा करते थे कि हमारा जो यह शरीर है इसे चील-कौवे जैसे जीवों ने भी नहीं खाना है। इसका तात्पर्य यह है कि इस शरीर से जहॉं तक हो सके परिश्रम कर लो। अन्यथा यह आलस्य करने से किसी काम का नहीं रह जाता। इसको जितना चलाते रहोगे, उतना ही रोगों से दूर रहोगे। इसलिए अपने हाथ-पैर हिला लो अर्थात् मेहनत करो। बिना परिश्रम किए कुछ नहीं मिलता। अपने जीवन में कुछ ऐसे कार्य कर लेने चाहिए जिससे इस संसार से विदा लेने के पश्चात भी यह दुनिया हमें याद करने के लिए विवश हो जाए।
            आलसी प्रवृत्ति के लोग परिश्रम नहीं करना चाहते। वे बस निठल्ले बैठकर संसार के सारे ऐश्वर्यों का भोग करना चाहते हैं। परन्तु ऐसा होना असम्भव होता है। सारे सुख प्राप्त करने के लिए धन कमाना पड़ता है। धन बिना मेहनत किए कभी कमाया नहीं जाता। न ही कोई बन्धु-बान्धव उन्हें धन उपहार स्वरूप देने आता है। वे बस शेखचिल्ली की भॉंति दिवास्वप्न देखते रहते हैं और मस्त रहना चाहते हैं। इस कारण वे सदा शार्टकट का सहारा लेने की सोचते हैं। उस चक्कर में चाहे उनकी यात्रा कितनी ही लम्बी क्यों न हो जाए। 
            ये लोग पुराने समय के 'चार्वाक् दर्शन' के अनुयायियों की तरह विश्वास करते हैं -
    यावज्जीवेत् सुखं जीवेत् ऋणं कृत्वा घृतं पिबेत्।
अर्थात् चार्वाक समर्थक कहते हैं जब तक जीना है ऐश से जीओ और अपनी मौज-मस्ती में कमी नहीं आनी चाहिए। यदि पैसा पास नहीं है तो उधार लेकर ही घी पीओ। 
             इससे भी बढ़कर निठल्लेपन की हद है कि वे सोचते हैं कि जिसने पैदा किया है, वह पेट भरने का जुगाड़ तो करेगा ही। भूखे थोड़ा ही मारने देगा। मलूकदास जी ने उन लोगों की स्थिति का वर्णन इन पंक्तियों में किया है-
        अजगर करे न चाकरी पंछी करे न काम।
        दास मलूका  कह गए सबके दाता  राम॥
अर्थात् अजगर किसी की नौकरी नहीं करता, पक्षी कोई काम नहीं करते। मलूकदास जी कहते हैं सबको देने वाले भगवान हैं।
             ऐसे मनुष्य चाहते हैं कि उन्हें हाथ-पैर न हिलाने पड़ें, बस बैठे बिठाए ही कारू का खजाना उनके हाथ जाए या ऐसा ही कोई जिन्न मिल जाए या अलाद्दीन का चिराग उनके हाथ लग जाए। रातों रात वह उनके लिए समस्त भौतिक ऐश्वर्यों को जुटा दे जिनकी मात्र कल्पना करना भी उनके लिए असम्भव है। पर संसार में ऐसा होता नहीं। सयाने कहते हैं - 
         आप न मरें तो स्वर्ग कैसे जाएँ 
अर्थात् स्वर्ग जाने की यदि सोचते हैं तो पहले मरना पड़ता है। कहने का तात्पर्य है कि स्वर्ग की प्राप्ति और वहाँ के सुखों को पाना भी मुफ्त में नहीं होता। पहले आपने इस जीवन का त्याग करना पड़ता है तब जाकर सब कल्पित भोगों की प्राप्ति होती है अन्यथा कोई रास्ता नहीं है।
              उन्हें फिर अपनी ही जिन्दगी उस समय बोझ लगने लगती है जब उनको अपने जीवन की वास्तविकताओं से दो-चार होना पड़ता है तब नानी याद आ जाती है। अपने जीवनकाल में ऐसे यत्न करने चाहिए कि जिन्दगी न अपने लिए बोझ लगे और न ही दूसरों के द्वारा अपमानित होना पड़े। घर-परिवार की आवश्यकताओं को पूरा करना उनका दायित्व होता है। जब अपनी व परिवारी जनों की जरूरतों को पूर्ण न कर सकें तो उठते-बैठते, सोते- जागते, खाते-पीते उनके व्यंग्य बाणों को सहन करना उनकी नियति बन जाती है।
             आलस्य की प्रवृत्ति का सदा त्याग करके अपने आवश्यक कार्यों को पूरा करने का प्रयास करना चाहिए। ऐसा करने से मन को एक प्रकार से सन्तुष्टि तो मिलती ही है, साथ ही आत्मविश्वास की भी वृद्धि होती है। तब मनुष्य कुछ भी कर गुजरने के लिए तत्पर रहता है। अपने सुख-सुविधाओं को जुटाने के लिए उसे निराश नहीं होना पड़ता। उसे किसी का मुॅंह देखने की आवश्यकता भी नहीं होती। वह स्वयं को ही योग्य बना लेता है। तब उसे समझ में आ जाता है कि वह आकाश की ऊॅंचाइयों को छूने की शक्ति रखता है और सागर से मोती भी ला सकता है।
             एक बार मनुष्य के हाथ जब सफलता लग जाती है तो फिर उसे बार-बार सफलता का सुख चखने की इच्छा होती है। यदि मन में सच्ची लगन व कर्मठता का भाव उत्पन्न हो जाए तो वह मनुष्य कभी दूसरों से ईर्ष्या नहीं करता। न ही वह अपने स्वाभिमान को कभी गिरवी रखने के बारे मेें सोचता है। वह अपने बलबूते ही सब कार्य करने के लिए सामर्थ्यवान हो जाता है। उसे परिश्रम का महत्त्व अच्छी तरह समझ में आ जाता है। तब उसके लिए कोई कार्य कठिन नहीं रह जाता।
          ईश्वर ने यह मानव जीवन हमें बड़ी परीक्षाओं के बाद दिया है। इसे व्यर्थ न गंवाना चाहिए। जो सद् कार्य कर सकते हैं, उन्हें इसी जन्म में यह सोचकर करें कि हमने पुनः मानव जन्म पाना है। अन्यथा पता नहीं कौन-कौन सी योनियों में जन्म लेकर स्वयं को सिद्ध करना पड़ेगा।
चन्द्र प्रभा सूद 

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