सोमवार, 30 जून 2025

बड़े होने की जल्दी

बड़े होने की जल्दी

मनुष्य जब बच्चा होता है तो उसे बड़े होने की बहुत जल्दी होती है। वह सोचता है कि कब वह बड़ा होगा और अपनी मनमर्जी के अनुसार चलेगा। उसे यह लगता है कि घर में जो बड़े हैं वे हमेशा उस पर हुक्म चलाते हैं। न चाहते हुए भी उसे सबका कहना मानना पड़ता है। वह यह भी सोचता है उसकी तो जैसे कोई इच्छा ही नहीं है। वह किसी से भी ऊँची आवाज में बात नहीं कर सकता। अगर आस-पड़ोस या स्कूल से शिकायत आ जाए, फिर तो बस उसकी खैर नहीं। 
             बच्चा हमेशा यही सोचता है कि मुझ बेचारे को मारने, पीटने और डॉंटने का अधिकार घर के सब बड़े लोगों को है। वह बेचारा तो किसी भी बात का विरोध भी नहीं कर सकता। यदि वह कभी ऐसा कर देता है तो उसे कटघरे में खड़ा कर दिया जाता है। उसे तब बहुत बुरा लगता है जब उससे छोटी-सी गलती हो जाने पर उसे सब लोगों से डॉंट खानी पड़ जाती है। उसे समझ नहीं आता उउस समय पता नहीं सभी घर के सदस्यों का प्यार पता नहीं कहॉं उड़न छू हो जाता है।
             घर में हर कोई उसे बात-बात पर टोकता है। कभी पढ़ाई के नाम और कभी खेलने के बहाने से वह बच्चा बेचारा सबकी नसीहतें सुन-सुनकर परेशान होता रहता है। घर हो अथवा स्कूल हर तरफ उसे अपने बड़ों की मर्जी से ही चलना पड़ता है। हर कदम पर यानी उठने-बैठने, खेलने-कूदने, पढ़ने-लिखने के समय उसे वह बलि का बकरा बनना पड़ता है। 
            बच्चा हमेशा सोचता है कि बड़े लोग बहुत सुखी होते हैं। उन्हें सवेरे जल्दी उठकर नींद खराब करके स्कूल नहीं जाना पड़ता। उन्हें होमवर्क करने की कोई चिन्ता नहीं होती है और न परीक्षा व उसके परिणाम का डर होता है। जहाँ उनका दिल चाहता है वे बिना पूछे, बिना रोक-टोक के‌ चले जाते हैं। किसी से इजाजत लेने की भी आवश्यकता नहीं होती। वह अपने भविष्य के सपने देखता है कि स्कूल पास करके कालेज जा रहा है। फिर कालेज की पढ़ाई पूरी करके वह नौकरी कर रहा है। इस तरह वह धीरे-धीरे अपने खुशहाल जीवन के सपनों में खोने लगता है। 
            जब वह थोड़ा और बड़ा होता है तब अपनी गृहस्थी बसाने के लिए उत्साहित होता है। घर-गृहस्थी और नौकरी की चक्कर-घिन्नी में फंसा जब वह कोल्हू का बैल बनने लगता है तब उसे आपने बचपन की खट्टी-मीठी यादें सताने लगती हैं। तब वह गुहार लगता है कि कोई मुझे मेरा बचपन लौटा दे। कहने का तात्पर्य यह है कि जब बच्चा बड़ा हो जाता है तब उसे अपना बचपन याद आने लगता है। फिर वह सोचता है काश उसका पहले वाला बचपन लौट आए।
           उस समय वह युवा बच्चा बनना चाहता है। पर बचपन का समय तो कहीं पीछे छूट जाता है। वह लौटकर वापिस नहीं आता। वह सोचता है कि माता-पिता की छत्रछाया में बहुत आनन्द था। उसे न कोई चिन्ता थी, न कोई फिक्र थी। खाना-पीना और मस्ती करना बस यही उसके काम हुआ करते थे। यदि किसी ने उसे कुछ कहा या सुना दिया तब चीख-चिल्ला लिए और यदि उसे पुचकार दिया तो अपने को खुदा समझ लिया। 
             अपनी छोटी-छोटी इच्छाओं के लिए जिद करना और उनके पूरा होने पर उत्सव मनाने जैसा आनन्द ही तो जीवन होता था। यदि इच्छा पूरी नहीं होती थी तो जिद करके रूठ जाता था। फिर सबके प्यार और मनुहार करने पर मान जाता था। तब मम्मी-पापा आदि घर के सभी लोग खुश हो जाते थे। जीवन के आने वाले थपेड़ों से माता-पिता उसे ‌बचाते थे। स्वयं कष्ट सहकर भी हमारी सारी जरूरतें पूरी करते थे। उस समय हम राजा हुआ करते थे। अपनी बालहठ 'येन केन प्रकारेण' अर्थात् किसी भी तरह मनवा लेते थे।
            जीवन इसी तरह चलता रहता है। एक पड़ाव को पार करके उसमें लौटना किसी भी प्रकार से सम्भव नहीं होता। अपने आने वाले अगले पड़ाव को हम आशा भरी नजरों से देखते हैं। एक को खोने का गम व दूसरे को पाने का आनन्द भी स्थायी नहीं रह पाता। जीवन की जिस भी अवस्था में हम जी रहे हैं, उसमें ईश्वर का धन्यवाद करते हुए आगे बढ़ते रहें तो फिर आनन्द-ही-आनन्द होता है। यही मानव जीवन का सार है जिसे समझकर उदासीनता से मुक्त हुआ जा सकता है।
चन्द्र प्रभा सूद 

रविवार, 29 जून 2025

स्वर्ग और नरक की परिकल्पना

स्वर्ग और नरक की परिकल्पना

स्वर्ग और नरक की परिकल्पना प्रायः सभी धर्मो में मिलती है। इसके विषय में बहुत कुछ कहा व सुना जाता है। स्वर्ग व नरक के विषय में यदि विचार किया जाए तो मन इसके विपरीत सोचता है। माना यही जाता है कि बुरे कर्म करने वालों को नरक मिलता है जहाँ बदबू होती है, कड़ाहों में तेल उबलता रहता है जिसमें दुष्कर्म करने वालों को डाला जाता है आदि। कहने का तात्पर्य है कि वहाँ जीव को तरह-तरह की प्रताड़ना मिलती है। इसके विपरीत स्वर्ग है, वहाँ भोग विलास के सभी साधन हैं। वहॉं अपसराएँ हैं, हरियाली है आदि। यानी कि सद् कर्म करने वालों को स्वर्ग मिलता है।‌ वहॉं सभी प्रकार के ऐशो आराम मिलते हैं।
               कहते हैं कि ईश्वर का परमधाम एक स्थान विशेष है जिसे प्राप्त करके मनुष्य जन्म-मरण के बन्धन से मुक्त हो जाता है। वहॉं पर विद्यमान चित्रगुप्त सभी प्राणियों के लेखेजोखे का हिसाब रखने के लिए खाता रखते हैं। मृत्यु के पश्चात जब मृतक ऊपर जाता है तो उसे जीवन में किए गए कर्मों को पढ़कर सुनाया जाता है। तदनुसार उसे स्वर्ग या नरक उपहारस्वरूप या सजा के रूप में दिया जाता है। मृत्यु के देवता यमराज जीव के शरीर में विद्यमान आत्मा को ले जाने के लिए अपने दूतों यानी यमदूतों को भेजते हैं।
            अब यह विचारणीय है कि हमारे शरीर में रहने वाली आत्मा, अजर, अमर व नित्य है और इस पर किसी की स्थिति का कोई प्रभाव नहीं पड़ता। 'श्रीमद्भगवद्गीता' में भगवान श्रीकृष्ण ने इस विषय में हमें समझाते हुए कहा है-
            न जायते म्रियते वा कदाचन 
            नायं भूत्वा भविता वा न भूय:।
            अजो नित्यं शाश्वतोsयं पुराणो 
               न हन्यते हन्यमाने शरीरे॥
अर्थात् आत्मा का कभी न जन्म होता है और न मृत्यु ही होती है। ऐसा न कभी हुआ है और न कभी होगा। आत्मा अजर, नित्य, शाश्वत व प्राचीन है। शरीर के मारे जाने पर भी वह नहीं मरती।
'श्रीमद्भगवद्गीता' का यह श्लोक भी देखिए जिसमें आत्मा की अमरता‌ के विषय में कहा है -
       नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावक:।
       न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुत:॥
अर्थात् यह श्लोक हमें समझा रहा है कि आत्मा को न शस्त्र काट सकते है, न इसे आग्नि जला सकती है। जल इस आत्मा को गीला नहीं कर सकता और हवा इसे‌ सुखा नहीं सकती।
             अब प्रश्न यह उठता है कि सभी सुख-दुख, लाभ-हानि, जीवन-मरण आदि स्थितियाँ अथवा भोग इस शरीर के हैं, आत्मा के नहीं। तो फिर स्वर्ग अथवा नरक में दण्ड किसे मिलता है और किसे सारी सुख-सुविधाएँ मिलती हैं?
             इस भौतिक शरीर को मृत्यु के पश्चात तो अपने-अपने धर्म के अनुसार जला दिया जाता है या दफना दिया जाता है। इसका सीधा-सा यही अर्थ है कि इस शरीर का सम्बन्ध इसी पृथ्वी पर ही समाप्त हो गया है। फिर इस शरीर को सजा या पुरस्कार नहीं मिल सकता। आत्मा को तो हमारे ग्रन्थ इन भोगों से परे  मानते हैं। इसका अर्थ यह हुआ कि आत्मा भी इस सजा या पुरस्कार की अधिकारी नहीं है। हमारे मनन करने का विषय यह है कि अनश्वर आत्मा और नश्वर शरीर जब दोनों ही स्वर्ग और नरक के सुख-दुख के अधिकारी नहीं हैं तो फिर और कौन है?
              हमारी तर्क बुद्धि यही कहती है कि स्वर्ग व नरक किसी विशेष निश्चित स्थान पर नहीं हैं। वे दोनों इसी धरा पर ही हैं। दूसरे शब्दों में कह सकते हैं तो जब हम सुख-सुविधाओं से सम्पन्न होते हैं, अपने बन्धु-बान्धवों के साथ हर प्रकार से सुखी और समृद्ध जीवन व्यतीत कर रहे होते हैं तो हम स्वर्ग में रहते हैं या स्वर्ग के समान सुख भोग रहे होते हैं।  उसकी सुगन्ध चारों ओर फैलती है।
               इसके विपरीत हम दुखों-परेशानियों में भी घिर जाते हैं। उस समय हम सबसे अलग-थलग रहकर कष्टों का सामना करते हैं। उस समय मानो हम नरक तुल्य जीवन जीते हैं। वह समय हमारे लिए बहुत ही कष्टकारी होता है। उस समय ऐसा लगता है कि हमारा साया भी साथ छोड़कर चला गया है। तब सभी बन्धु-बान्धव भी हमसे किनारा कर लेते हैं। उन्हें लगता है कि कहीं सहायता न करनी पड़ जाए। उस समय हम नरक तुल्य कष्ट भोग रहे होते हैं।
              हम कह सकते हैं कि स्वर्ग व नरक दोनों किसी आसमान पर विद्यमान नहीं हैं। बल्कि इसी धरती पर हैं। हम अपने इस जीवनकाल में पूर्वजन्म कृत सभी शुभाशुभ कर्मों को भोगते हैं। इसे ही हम स्वर्ग और नरक का भोगना कहते हैं। स्वर्ग और नरक के इन सुखों और दुखों को हमें निश्चित ही भोगना पड़ता है। इसका विचार करके अपने कर्मों की ओर ध्यान देना चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद 

शनिवार, 28 जून 2025

ईश्वर की उपासना सच्चे मन से

ईश्वर की उपासना सच्चे मन से

ईश्वर को हम सभी लोग अपने-अपने तरीके से स्मरण करते हैं और उसे पाने का प्रयास करते हैं। इसके लिए कुछ लोग कर्मकाण्ड करते हैं, कुछ लोग पूजा-पाठ करते हैं, कुछ लोग जप-तप करते हैं और कुछ लोग व्रत आदि के द्वारा प्रभु को पाने का भरसक प्रयत्न करते हैं। हम अपनी भक्ति में सफल हो पाते हैं या नहीं, इस विषय में हम नहीं जानते। केवल वह मालिक ही इस सत्य को जानता है कि उसे हमारी आराधना में सच्चाई दिखाई देती है या मात्र प्रदर्शन ही दिखता है।
             ईश्वर की उपासना यदि ईमानदारी व सच्चे मन से की जाए तभी वह उसे भाती है। प्राणीमात्र के प्रति मन में सद् भावना न हो तो मनुष्य उस प्रभु का प्रिय नहीं बन सकता। हम अपने बच्चों और अपने बन्धु-बान्धवों से बहुत प्यार करते हैं। सदा उनके सुख-दुख में हर्ष और शोक का अनुभव करते हैं। उसी प्रकार वह मालिक चाहता है कि उसकी बनाई हुई इस सृष्टि के समस्त जीवों से भी हम लोग बिना किसी भेदभाव के अपने मन की गहराई से प्यार करें जैसा स्नेह वह हम सबके प्रति रखता है।
             हम में से बहुत से लोग ऐसे भी होंगे जो अपने आपको ईश्वर का सबसे बड़ा भक्त मानते हैं। बाकी सबको अपने समक्ष तुच्छ समझते हैं। चाहे वे स्वयं प्रभु भक्ति का प्रदर्शन ही क्यों न कर रहे हों। वे यह दावा करते हैं कि वे ईश्वर के बहुत पास हैं या यूँ कहें कि वे स्वयं को ही ईश्वर मानते हैं। दूसरों पर अत्याचार करके, उन्हें हिकारत की नजर से देखकर अपने अहं को तुष्ट करते हैं। जबकि ईश्वर को यह सब बिल्कुल अच्छा नहीं लगता। वह हमसे प्राणीमात्र के प्रति दयाभाव रखने के लिए कहता है। परमात्मा स्वयं भी दीन-दुखियों की सहायता करता है। इसलिए हम ईश्वर को दीनबन्धु कहते हैं।
              एक ऐसी ही कथा सुनी थी। नारद जी को बड़ा अभिमान था कि वे प्रभु श्री हरि विष्णु के सबसे बड़े भक्त हैं। ऐसा माना जाता है कि नारद मुनि जी सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में विचरण करते रहते हैं।एक बार नारद जी भगवान विष्णु जी के पास गए और कहा, "हे भगवन! मुझसे बड़ा आपका कोई अन्य भक्त संसार में नहीं है।"
             प्रभु ने उन्हें यह कहकर निराश किया, "वे उनके सबसे बड़े भक्त नहीं बल्कि उनसे भी बड़ा भक्त कोई और है।" 
             नारद जी के पूछने पर प्रभु ने कहा, "एक किसान है जो किसी गॉंव में रहता है। वह मेरा सबसे बड़ा भक्त हैं।"
            यह सुनकर नारद जी को अच्छा नहीं लगा, वे बहुत परेशान हो गए। नारद जी उसी समय उस परम भक्त से मिलने के लिए चले गए। वे जब उस किसान से मिले तो आश्चर्यचकित रह गए, 'वह किसान दिन में सिर्फ तीन बार प्रभु को याद करता है। एक बार प्रातः खेत में जाते समय, दूसरा दिन में खाना खाते समय और तीसरी बार जब वह वापिस घर आता है।'
               नारद जी को यह सब समझ नहीं आया।  वे प्रभु के पास गए और पूछा, "भगवन! दिन में केवल तीन बार आपको याद करने वाला किसान मुझसे आपका बड़ा भक्त कैसे हो गया?"
               श्री हरि मुस्कुराए और तेल से भरा हुआ एक पात्र नारद जी को देते हुए बोले, "नारद! जाओ पृथ्वी का एक चक्कर लगाकर आओ। पर यह याद रखना कि तेल की एक भी बूँद धरती पर गिरनी नहीं चाहिए।"
              नारद जी भ्रमण करके, प्रभु का कार्य सम्पन्न करके वापिस लौट आए। प्रभु से प्रशंसा पाने की कामना से कार्य पूर्ण के करने की चर्चा करने लगे। तब प्रभु ने उनसे पूछा, "इस कार्य को करते समय मुझे कितनी बार मुझे याद किया?" 
              नारद जी ने इन्कार में सिर हिला दिया और कहा, "प्रभु! आपका आदेश था कि तेल पात्र से गिरना नहीं  चाहिए। मैं आपका काम कर रहा था। बस इसी में ध्यान लगा रहा। आपके नाम का स्मरण नहीं किया।"
            तब प्रभु ने नारद जी को समझाया, "जो व्यक्ति मुझे सच्चे मन से याद करता है और अपने कर्तव्य को करते हुए समय मेरा स्मरण करता है, वही मेरा प्रिय भक्त कहलाता है। 
            इस दृष्टान्त से समझने वाली मुख्य बात यह है कि ईश्वर मनुष्य की भावना को देखता है। वह दिखावे या रिश्वत वाली भावना को पसन्द नहीं करता। वह सदा हमारे अपने मन में विद्ममान रहता है। जब चाहे अपने मन में झॉंककर उसे प्राप्त कर लो। ईश्वर को निश्छल, ईर्ष्या-द्वेष से रहित, सच्चे व ईमानदार लोग पसन्द आते हैं। इसलिए हम अपने अन्तस में जितना अधिक सद् गुणों का विस्तार करेंगे उतना ही ईश्वर के समीप जाएँगे।
चन्द्र प्रभा सूद 

शुक्रवार, 27 जून 2025

द्वन्द्व सहन करना

द्वन्द्व सहन करना

भगवान श्रीकृष्ण ने गीता में द्वन्द्व सहन करने पर बल दिया है। समझने वाली बात है कि यह द्वन्द्व किस चिड़िया का नाम है? द्वन्द्व का अर्थ है विरूद्ध स्वभाव वाली स्थितियों को सहन करना। हम इनका विषलेषण इस प्रकार कर सकते हैं- सुख-दुख, हर्ष-शोक, लाभ-हानि, जय-पराजय, मान-अपमान, सफलता-असफलता आदि विरोधाभासी स्थितियों का सामना करना। इसी प्रकार सर्दी-गर्मी, दिन-रात, अतिवृष्टि-अनावृष्टि आदि प्राकृतिक द्वन्द्वों को भी नित्य प्रति सहन करना पड़ता है।
              ये सभी स्थितियाँ हमारे जीवन में अपने क्रम से आती हैं। संस्कृत भाषा के सुप्रसिद्ध महाकवि कालिदास ने 'कुमासम्भवम्' में इस श्लोक के माध्यम से हमें बताया है -
     कस्यात्यन्तं सुखमुपनतं दुःखमेकान्ततो वा।    
     नीचैर्गच्छत्युपरिच दशा चक्रनेमिक्रमेण​।। 
अर्थात् किसी को सदा सुख नहीं मिलता और उसी प्रकार सदा दुख भी नहीं मिलता। जिस प्रकार पहिए के चलने पर उसमें में लगे हुए अरे(तीलियाँ) ऊपर और नीचे होती रहती हैं, उसी प्रकार ही हमारे जीवन में सुख और दुख की स्थिति होती है। 
            ये स्थितियाँ हमारे जीवन में निरन्तर आती रहती हैं। यह क्रम अनवरत चलता रहता है। कभी सुख-समृद्धि के हिण्डोले में झूलते हुए हम जीवन का आनन्द लेते हैं और कभी दुख-परेशानियों में घिर कर व्यथित होते हैं। जीवन में एक समय ऐसा भी आता है जब हम उन्नति की पराकाष्ठा को छूते हैं और फिर दूसरे ही पल ऐसी पटखनी खाते हैं कि जमीन में लग जाते हैं।
              'श्रीमद्भगवद्गीता' में हमें भगवान श्रीकृष्ण ने स्पष्ट शब्दों में समझाया है कि ये सारे द्वन्द्व मानव जीवन में बारी-बारी से आते हैं। कभी हमें सुख मिलता है कभी दुख। कभी हम उन्नति की सीढ़ियाँ चढ़ते हैं तो कभी कठोर श्रम करने पर भी अवनति के गर्त में गिरते हैं। जब कभी हमारा यश चारों ओर फैलता है तब हम आसमान में उड़ने लगते हैं। हम अपने झूठे अहंकार में डूबकर अपने चारों ओर एक अभेद्य-सी दीवार खड़ी कर लेते हैं। तब हम हर किसी को कीट-पतंगों की भाँति समझने लगते हैं। हम भूल जाते हैं कि ऐसा करने से हम निश्चित ही अपयश के भागीदार बनेंगे। इस स्थिति से हम लोगों को यथासम्भव बचना चाहिए।
        काम-धन्धे में कभी-कभी हमें आशा से बढ़कर लाभ मिलता है तो कभी सावधान रहते हुए भी किसी कारणवश अचानक हानि उठानी पड़ जाती है। इस स्थिति के लिए हम तैयार भी नहीं होते परन्तु फिर भी हमें यह कष्ट झेलना पड़ता है।  बदलते हुए मौसम में सर्दी-गर्मी आदि ऋतुओं को झेलना मनुष्य की मजबूरी बन जाती है। दिन-रात, प्रतिदिन ये अपना सन्देश हमें देते रहते हैं। अतिवृष्टि-अनावृष्टि, ऑंधी-तूफान आदि प्राकृतिक द्वन्द्वों को भी सहन करना पड़ता है। ये सब भी समयानुसार ईश्वर की इच्छा से इस सृष्टि पर मानव जीवन में आते रहते हैं। इनसे बच पाना सम्भव नहीं होता बल्कि सामना करना पड़ता है।
             निष्कर्षत: हम अपने जीवन में इसी प्रकार इन सभी द्वन्दों को सहन करते हैं। ये सभी स्थितियाँ हर मनुष्य के जीवन में उसके कर्मों के अनुसार अवश्यमेव आती हैं। इनका सामना करना हमारी विवशता है क्योंकि हमारे पास और कोई चारा नहीं है। इसलिए इनका सामना हर स्थिति में सम होकर अर्थात् एक समान रह कर करना चाहिए। जब इन्हें जीवन का एक हिस्सा मान लेंगे तब हमें अधिक कष्ट नहीं होगा। उस समय ये सब सामान्य जीवन का अंग प्रतीत होगा।
              ईश्वर की शरण में जाने से और उसकी उपासना करने से ही इन द्वन्द्वों को सहन करने की शक्ति मिलती है। उसी से अपनी रक्षा करने के लिए गुहार लगानी चाहिए। उसी का स्मरण करने से ही सच्चा सुख और शान्ति प्राप्त होती है। इसलिए उसकी शरण में जाना ही एकमात्र विकल्प हमारे पास बचता है।
चन्द्र प्रभा सूद 

गुरुवार, 26 जून 2025

गुरु-शिष्य की महत्ता

गुरु-शिष्य की महत्ता

गुरु की महत्ता का गुणगान प्रायः हम सभी करते हैं परन्तु शिष्य के महत्त्व की चर्चा करते समय हम कंजूस हो जाते हैं। यदि शिष्य है तभी तो गुरु का अस्तित्व है। शिष्य के बिना गुरु का आधार नहीं और गुरु के बिना शिष्य अपूर्ण है। यह बात हम भूल जाते हैं कि दोनों ही एक-दूसरे के पूरक हैं। एक के बिना दूसरा अधूरा है और दूसरे के बिना पहला। इसीलिए जब हम गुरु शब्द कहते हैं तो उसी समय हमें शिष्य का भी स्मरण होने लगता है। इसी प्रकार शिष्य कहते ही गुरु का भान होने लगता है।
             वैसे यदि हम विचार करें तो पाएँगे कि गुरु के साथ-साथ शिष्य के महत्त्व को भी कम नहीं ऑंकना चाहिए । गुरु का कार्य होता है कच्ची मिट्टी के समान शिष्य को अपने सद् विचारों के अनुरूप ढालकर, मनचाहा आकार देकर उसे योग्य बनाए। इस प्रसंग में मुझे सन्त कबीरदास जी का निम्न दोहा स्मरण आ रहा है जो गुरु-शिष्य के सम्बन्धों पर प्रकाश डालता है -
    गुरु कुम्हार शिष कुम्भ है, गढ़ि गढ़ि काढ़ै खोट।
      अन्तर हाथ सहार दै, बाहर बाहै चोट॥ 
अर्थात् कबीरदास जी कहते हैं गुरु कुम्हार है और शिष्य घड़े के समान है। जैसे कुम्हार घड़े को भीतर से हाथ का सहारा देकर बाहर से चोट मारकर उसे सही आकार देता है, उसी प्रकार गुरु भी शिष्य की बुराइयों पर प्रहार करके शिष्य के जीवन को सही रुप प्रदान करता है।
             यानी कहने का तात्पर्य यही है कि गुरु शिष्य के जीवन को तराशता है। उसका सर्वांगीण विकास करता है और उसे एक नया रूप प्रदान करता है। शिष्य का भी कर्तव्य बनता है कि वह गुरु द्वारा प्रदत्त ज्ञान को अपने जीवन में ढाले। उसका विस्तार करके समाज को एक नई दिशा दिखाए। इसी प्रकार ही पुरातनकाल से चली आ रही इस गुरु-शिष्य परम्परा का निर्वहण होता आया है। इस प्रकार दोनों को ही एक-दूसरे के माध्यम से यश प्राप्त होता है।
            यदि गुरु चरित्रवान होगा तो उसके शिष्यों में भी वही संस्कार आएँगे और वे सुसंस्कृत बनेंगे। इसके विपरीत यदि गुरु अपने गुरुत्व को ताक पर रखकर दुराचारी, अनाचारी व पथभ्रष्ट होगा तो शिष्य उससे भी बढ़कर कुमार्गगामी होंगे। कहने का तात्पर्य यह है कि जिस प्रकार माता-पिता के संस्कारों का प्रभाव उनके बच्चों पर पड़ता है, उसी प्रकार गुरु के संस्कारों का प्रभाव भी उसके शिष्यों पर पड़ता है। इस बात से कदापि इन्कार नहीं किया जा सकता।
             इसीलिए गुरु से यह अपेक्षा की जाती है कि वह अपने जीवन को शिष्यों के समक्ष उदाहरण की भाँति प्रस्तुत करे ताकि उसके शिष्य उसके बताए हुए मार्ग पर चलकर गौरव का अनुभव करें। समाज में उनकी भी प्रतिष्ठा बढ़े। लोग उनके गुरु का और उनका नाम श्रद्धा से लें, न कि हिकारत से। उन्हें अपने गुरु के कुमार्गगामी होने अथवा उसके कुकृत्यों के कारण समाज में कभी भी तिरस्कृत का पात्र न बनना पड़े।
              मर्यादा पुरुषोत्तम राम जैसे शिष्य को पाकर ऐसा कौन-सा ऐसा गुरु होगा जो निहाल नहीं होगा। हर गुरु ऐसा ही शिष्य को पाने की कामना करता है जो उसके जीवन को धन्य कर दे और युगों-युगों तक उसका नाम इतिहास के पन्नों में अमर कर दे।       
            गोरखनाथ जी जैसे शिष्य धन्य हैं। उन्होंने तो अपने गुरु मछन्दर दास को ही तार दिया। गुरु मच्छन्दर दास जी राज्य पाकर भोग-विलास में डूब गये थे। शिष्य गोरखनाथ जी को अपने गुरु के इस आचरण पर बहुत दुख हुआ। वे उन्हें उस राजसी जीवन से बचाकर वापिस वैराग्य जीवन में लौटाकर ले लाए।
            शिष्य बालक आरुणि की जंघा पर एक बार गुरुदेव सो रहे थे। आरुणि को एक कीड़े ने काट लिया। वह पीड़ा से व्याकुल हो गया। परन्तु वह केवल इसलिए हिलाडुला नहीं कि कहीं उसके गुरु की नींद न टूट जाए।
            गुरु आचार्य चाणक्य को भी चन्द्र गुप्त मौर्य जैसे शिष्य की ही तलाश थी जो बिना कोई प्रश्न किए, अपने गुरु के हर आदेश का अक्षरशः पालन करे। उनके अखण्ड भारत के स्वप्न को साकार करे। चन्द्र गुप्त ने उनकी इस इच्छा का मान रखते हुए उनके स्वप्न को साकार किया।
            गुरु श्री विरजानन्द जी बहुत सौभाग्यशाली थे जिन्हें स्वामी दयानन्द सरस्वती जैसा शिष्य मिला। उन्होंने भारत में व्याप्त कुरीतियों को दूर करने और समाज को जागृत करने के अखण्ड मण्डिनी पताका फहराई। उन्होंने अपने गुरु को भी इतिहास के पन्नों में अमर कर दिया।
           इतिहास ऐसे योग्य शिष्यों के महत्त्वपूर्ण सत्कार्यों के उदाहरणों से भरा हुआ है जिनके कारण उनके गुरु अमर हो गए। आज भी हम उन अभूतपूर्व प्रतिभाशाली शिष्यों को याद करके श्रद्धावनत हो जाते हैं। उन्होंने स्वयं को तो अमर बनाया ही, साथ-साथ अपने गुरुओं को भी अमर कर दिया। बस उनको ढूँढने की आवश्यकता है।
चन्द्र प्रभा सूद 

बुधवार, 25 जून 2025

इन्सान बड़ा नाशुकरा जीव

इन्सान बड़ा नाशुकरा जीव

इन्सान बड़ा ही नाशुकरा जीव है। उसे हम एहसानफरामोश अथवा कृतघ्न कोई भी नाम दे सकते हैं। अपने प्रति किए गए अहसान को बहुत ही जल्दी भूल जाता है। जब उसे आवश्यकता होती है तो वह गधे को भी बाप बनाने से नहीं चूकता। जैसे गुड़ पर मक्खियॉं मंडराती हैं, उसी प्रकार वह सारा समय उन लोगों के आगे-पीछे घूमता रहता है जिनसे उसका स्वार्थ पूर्ण होता है। अपना कार्य सिद्ध हो जाने के पश्चात वह उनसे नजरें मिलाने से भी कतराने लगता है। 
            आज के इस भौतिक युग में अनेक लोग हमें अपने आसपास ऐसे दिखाई देते हैं जिनके जीवन का बस यही एक मन्त्र है - 'जिस सीढ़ी से ऊपर चढ़ो उसे ठोकर मारकर गिरा दो।' यानी जिन लोगों की बदौलत उसने अपने लक्ष्य का भेदन किया है, काम हो जाने पर उसे अब उन लोगों की आवश्यकता नहीं है। उन लोगों का साथ बस यहीं तक ही था। अब वे कौन और हम कौन? जबकि इस एटीट्यूड को बहुत गलत कहा जा सकता है और इससे बचना चाहिए।
            ऐसे स्वार्थी लोगों के कारण ही समाज में आज लोग परस्पर विश्वास खोते जा रहे हैं। वे समय पड़ने पर एक-दूसरे की सहायता करने से कतराने लगे हैं। वे सहायता की याचना को षडयन्त्र का नाम देने लगे हैं। घनिष्ठ सम्बन्धों में भी सन्देह का कीड़ा घर करता जा रहा है। इसी कारण भाईचारा व मित्रता भी कहीं-कहीं शत्रुता में बदलने लगी है। ये स्थितियाँ सभ्य समाज के लिए बहुत ही हानिकारक हैं। समझ नहीं आता कि यह स्वार्थपरता हमें कहॉं ले जाकर छोड़ेगी?
      कभी-कभी सोचती मैं हूँ कि क्या अपनी आने वाली पीढ़ियों को हम बीमार सम्बन्धों वाला समाज सौंपेंगे? हम उनका स्वस्थ विकास कैसे कर पाएँगे? इस विषय पर हम सबको गहन परामर्श करने की आवश्यकता है। हमें अपनी इस बीमार मानसिकता से छुटकारा पाना ही होगा। तभी एक स्वस्थ समाज का निर्माण सम्भव हो सकेगा। जहॉं बिना स्वार्थ के लोग आवश्यकता पड़ने स्वेच्छा से एक-दूसरे की सहायता करेंगे।
            ईश्वर ने सृष्टि में इन्सान को सबसे श्रेष्ठ जीव बनाया है परन्तु हमने अपनी मूर्खताओं से उस पर दाग लगा दिया है। जिसने संसार में उसे भेजा, दुनिया के सभी ऐश्वर्य दिए, उसे वह पृथ्वी पर आते ही किनारे कर देता है। थोड़ा-सी धन-सम्पत्ति पाकर वह गर्व से फूला नहीं समाता। अपने इसी अहं के कारण वह उस ईश्वर की सत्ता को भी चुनौती देने की धृष्टता करता है। वह भूल जाता है कि इस संसार में उसका अपना कुछ भी नहीं है। जिस धन-दौलत, रूप-सौंदर्य, शक्ति आदि पर वह इठलाता फिरता है, वे सब भी उसके अपने नहीं हैं। वे सब उसे साधन के रूप में प्रभु ने दिए हैं। वह सदा ही उस प्रभु के रहमोकरम पर है।
            व्यर्थ के अभिमान में आकर वह अपनों को ही चोट पहुँचाने लगता है। कहने का तात्पर्य है कि वह किसी का भी कृतज्ञ नहीं होता। वह सबके लिए यही कहता है कि किसी ने उसके लिए किया ही क्या है? उसने अपने बलबूते पर सब साधन जुटाए हैं। किसी को श्रेय देने का प्रश्न नहीं उठता। वह तो ईश्वर की हस्ती को भी नकारकर वह स्वयंभू बनने का अपराध बैठता है। नाशुकरा मनुष्य ईश्वरीय सत्ता को चुनौती देने की भूल कर बैठता है।
            मनुष्य भूल जाता है कि सभी ऐशो आराम जिस मालिक ने दिए उसे हैं, वह उन्हें वापिस भी ले सकता है। उसकी लाठी की आवाज नहीं होती पर जब वह चलती है तो बड़ी गहरी चोट लगती है। फिर चोट लगने पर वह तिलमिला उठता है। उस समय ईश्वर के साथ-साथ अपने सभी बन्धु-बान्धवों को वह पानी पी पीकर कोसता है। उन्हें लानत भेजता है। अपनी स्वयं की गलती न मानकर दूसरों को दोष देता है। ऐसा लगता है मानो इस कला में तो उसे महारत हासिल है।
              होना तो यह चाहिए कि जो भी कोई व्यक्ति हम पर उपकार करता है या राई भर भी हमारी सहायता करता है, उसका धन्यवाद करना चाहिए। अन्यथा सामने वाले दूसरे लोग हमें कृतघ्न कहकर हमारा तिरस्कृत कर सकते हैं। इस स्थिति से बचना चाहिए। यथासम्भव दूसरों की सहायता का यत्न भी करना चाहिए। इसी प्रकार आदान-प्रदान से ही समाज चलता है। दूसरों के प्रति कृतज्ञता प्रदर्शित करना एक मानवीय गुण है। हमें ऐसे उपयोगी गुणों का त्याग नहीं करना है।
              मैं सभी मित्रों से अनुरोध करती हूँ कि उस दाता के उपकार को हमेशा याद रखिए। बिना कहे वह भर-भरकर नेमतें हमारी झोली में डालता है। मूर्खतावश हम अज्ञ जन उसकी महिमा को नहीं समझ पाते। इसलिए अपने वृथा अभिमान को त्यागकर सोते-जागते, खाते-पीते, उठते-बैठते उस ईश्वर का धन्यवाद करना चाहिए। वही हमारा सच्चा सहायक है, उसी की शरण में जाना चाहिए। ऐसा करने पर ही हमें अपने जीवन में सच्चा सुख मिल सकता है।
चन्द्र प्रभा सूद 

मंगलवार, 24 जून 2025

आशा का दामन थामें

आशा का दामन थामें

आशा और निराशा के झूले में झूलते हुए मनुष्य कभी प्रसन्न होता है तो कभी त्रस्त। वह सदा ही असमंजस की स्थिति में रहता है। उसे समझ नहीं आता कि वह क्या करे और क्या न करे? यानी वह आशा और निराशा के चक्रव्यूह में उलझकर रह जाता है। बच्चे जब सी-सा पर झूलते हैं तो कभी एक सिरा ऊपर की ओर उठता है तो दूसरा नीचे की ओर झुक जाता है। फिर दूसरा सिरा ऊपर की ओर उठता है तो पहले वाला सिरा नीचे आ जाता है। यही मनुष्य के साथ भी होता है। यानी कभी आशा का पलड़ा भारी हो जाता है तो कभी निराशा का पलड़ा उस पर हावी हो जाता है। 
           ये स्थितियॉं सदा उसकी समझ से परे होती हैं। उसके लिए हमेशा कष्ट का कारण बन जाती हैं। मनुष्य को सदा ही अपने विवेक पर भरोसा करना चाहिए। यह आवश्यक है कि उसे सोच-विचारकर आगे कदम बढ़ाना चाहिए। उसे कभी भी आशा का दामन नहीं छोड़ना चाहिए। उसे इस बात पर विश्वास करना चाहिए कि निराशा का समय भी कट जाएगा।इस आशा की एक किरण के सहारे वह बड़े से बड़े दुखों-परेशानियों के पहाड़ पार कर सकता है। इसमें जरा भी सन्देह नहीं है।
            इन्सान को यह बात हमेशा याद रखनी चाहिए कि रात कितनी भी लम्बी या डरावनी काली क्यों न हो, उसके बाद प्रातःकाल अवश्य होता है। रात के अंधेरे को देखकर कभी-कभी लगता है कि यह रात कब बीतेगी? परन्तु पल-पल करके वह रात भी समाप्त हो जाती है। एक नया सवेरा हमारी प्रतीक्षा कर रहा होता है। उस समय रात के अंधेरे में छुपा सूर्य उसे चीरकर पूरे जोश और उमंग के साथ फिर से एक नए दिन के रूप में हमारे समक्ष उपस्थित हो जाता है। उसके प्रकाश व तेज में कोई कमी नहीं आती। 
        लाख तूफान आ जाएँ पर नदी उन सबसे लड़कर अपना अस्तित्व बचा लेती है व फिर से अपनी पहचान बनाती है। एक नन्हा-सा दीपक भी हवा के झोंकों से लड़कर टिमटिमाते हुए अंधकार को दूर करके प्रकाश देता है। वृक्ष झंझावातों से लड़ते हुए जीतते हैं और फिर से तनकर खड़े हो जाते हैं। इसी प्रकार संसार में प्रकृति के हर तत्त्व को भी संघर्षों से पार पाने के लिए झूझना पड़ता है। फिर हम मनुष्य भी तो इस चक्र का ही हिस्सा हैं इससे अलग नहीं हैं। हमें भी सुख-दुख के भंवर में डूबना उतरना पड़ता है।
            हम जब दुखों के अथाह समुद्र में डूब जाते हैं या परेशानियों में चारों ओर से घिर जाते है तब हमें ऐसा लगता है कि इनसे छुटकारा पाने का कोई भी मार्ग हमारे पास नहीं है। उस समय अपने विवेक पर से भी हमारा विश्वास डगमगाने लगता है। तब सभी भाई-बन्धु किनारा कर लेते हैं। ऐसा कहा जाता है कि हमारी अपनी परछाईं भी हमारी नहीं रहती, वह भी हमें छोड़ जाती है। ऐसी भयावह स्थिति वाकई इन्सान को झकझोर कर रख देती है। इस स्थिति में घबराना नहीं चाहिए बल्कि डटकर मुकाबला करना चाहिए।
            यह वह समय होता है जब अपने-आप को मनुष्य निराशा के मकड़जाल में फंसा हुआ पाता है। उससे बाहर निकालने के लिए वह बस छटपटाता रहता है। उस समय वह भूल जाता है कि काले घने बादलों की ओट में जब सूर्य छुप जाता है और दिन में रात का एहसास होने लगता है तब बादल बरसते हैं। उसके बाद फिर वह घनघोर अंधेरा न जाने कहाँ खो जाता है। यानी घने बादलों की ओट में छिपा हुआ सूर्य, फिर से अपनी मुस्कान बिखेरता हुआ निर्मल आकाश पर अपनी छटा बिखेरने लगता है। कहने का तात्पर्य यह है कि काले बादल सूर्य को बहुत समय तक अपनी गिरफ्त में नहीं रख सकते।तब हमें अपने चारों ओर केवल चमचमाता हुआ प्रकाश दिखाई देता है।
           यही प्रकाश आशा का प्रतीक है। हमें आशा का दामन कभी नहीं छोड़ना चाहिए। आशा की एक किरण हमारे जीने का सम्बल होती है। गहरे अंधेरे कमरे में जलता हुआ एक छोटा-सा दीपक अंधेरे को दूर भगा देता है। वह हमें आशान्वित करता है। वह हमें यह संदेश देता है कि हमें घबराने की बिल्कुल आवश्यकता नहीं है। 'मैं हूँ न आप सबकी आशाओं का दीपक' कहकर अपना अस्तित्व मिटने नहीं देता। वह कहता है कि मुझे हमेशा याद रखना, भूलना नहीं।
              अन्तत: यह कहना उचित होगा कि निराशा को अपने ऊपर हावी नहीं होने देना चाहिए। अपने गुरुजनों और विवेकी सज्जनों की संगति में कष्टदायक समय को व्यतीत करना चाहिए। दुखों-कठिनाइयों में हमेशा ईश्वर को सच्चे मन से याद करना चाहिए। इससे हमें मानसिक बल मिलता है। तभी हम संघर्ष करके अपनी परेशानियों पर विजय प्राप्त कर सकते हैं। ईश्वर ही इन निराशा के बादलों को दूर करके हमें आशा की सुनहली वादियों में ले जाएगा। वही हमें हमारा सतरंगी इन्द्रधनुष हमें लौटाएगा।
चन्द्र प्रभा सूद 

सोमवार, 23 जून 2025

जीवन-मृत्यु के बीच झूलता मनुष्य

जीवन-मृत्यु के बीच झूलता मनुष्य 

जीव इस संसार में जन्म लेता है और अपने पूर्व जन्म कृत कर्मानुसार ईश्वर प्रदत्त आयु भोगकर इस दुनिया से विदा लेता है। वह जीवन और मृत्यु के बीच में झूलता रहता है। एक शरीर से मुक्त होने के बाद उसका जन्म कब और किस योनि में होगा, कोई नहीं जानता। हमारे ग्रन्थों का मानना है कि जो पुण्यात्मा होते हैं, उनका पुनर्जन्म एक शरीर को छोड़ने के तुरन्त बाद हो जाता है। कुछ लोगों के कर्म ऐसे होते हैं जो वायुमण्डल में वर्षो तक भ्रमण करते रहते हैं उन्हें नया शरीर नहीं मिलता। उन्हें हम भूत-प्रेत के नाम से पुकारते हैं। 
             शेष अन्य जीवों को भी अपने कर्मानुसार निश्चित अवधि के पश्चात पुनर्जन्म मिलता है। वह निश्चित अवधि क्या है? किस समय नया जन्म मिलेगा? किस स्थान पर हम जन्म लेंगे? आदि प्रश्न विचारणीय हैं। इस विषय में हमारी यह मानुषी बुद्धि कुछ भी नहीं जान पाती। महान ज्ञानी जन इस विषय में शायद कुछ बता सकते हैं। वैसे तो यह सब भी भविष्य के गर्भ में सुरक्षित है। इसे केवल ईश्वर ही जानता है।
             एवंविध जीव की मृत्यु कब होगी? वह किस पल आ जाएगी? यह भी एक रहस्य है। ईश्वर के अतिरिक्त इस भेद का ज्ञान ही किसी को नहीं हो सकता। हम मनुष्यों के लिए तो इसे जान पाना असम्भव-सा है। बड़े-बड़े ज्ञानी व ॠषि-मुनि इस रहस्य को खोजने में सारा जीवन व्यतीत कर देते हैं। फिर भी जन्म-मरण के इस सार को समझने और समझाने में असमर्थ रहते हैं।
             सारांशत: हम कह सकते हैं कि जन्म और मृत्यु के इस रहस्य को जानना और समझना हमारी बुद्धि अथवा हमारी सोच से परे है। इस पुनर्जन्म का रहस्य समझ पाना बहुत ही कठिन है। इसे भले ही हम न जान सकें पर इतना निश्चित मान सकते हैं कि हम सभी जीव इस धरती पर कुछ निश्चित समय के लिए ही आते हैं। उसी समय में हमें अपनी सुगन्ध फैलानी होती है। जिस उद्देश्य के लिए हमने जन्म लिया है या ईश्वर ने हमें इस धरती पर भेजा है, उसे पूरा करना हमारा धर्म है।
            ईश्वर ने हमें अपने कर्मों के अनुसार जो भी समय हमें दिया है, उसका पूर्णरूपेण सदुपयोग करना चाहिए। अन्यथा हमारा जीवन इस पृथ्वी पर एक बोझ बनकर रह जाएगा। मृत्यु के समय हमें पश्चाताप करने का समय भी नहीं मिल पाएगा। उस समय हम चाहे कितनी भी प्रार्थना कर लें, परन्तु पलभर की मोहलत भी नहीं मिलेगी। तब अन्त समय में जीवन को व्यर्थ गंवाने का क्षोभ मन में लेकर हमें इस संसार से विदा होकर नवजीवन की ओर जाना होगा।
            जब तक हम इस संसार में आने के अपने लक्ष्य को यानी मोक्ष को प्राप्त नहीं कर लेते, तब तक हम चौरासी लाख योनियों के चक्र में पड़कर इस संसार में ही आवागमन करते रह जाएँगे। ऐसे में मुक्ति का कोई भी रास्ता नहीं निकल सकेगा। जन्म और मृत्यु की यह पहली एक बहुत उलझी हुई है। इसे सुलझाना आसमान से तारे तोड़कर लाने जैसा असम्भव कार्य है।
           घर, परिवार, धर्म, देश और समाज के प्रति अपने कर्तव्यों का निर्वहण हमें नित्य ही निष्ठापूर्वक मन, वचन और कर्म से करना चाहिए। इसमें किसी भी प्रकार का प्रदर्शन नहीं होना चाहिए। यह दिखावा आखिर हम क्यों और किसके लिए करते हैं? शायद अल्पकालीन वाहवाही प्राप्त करने के लिए परन्तु हमारा अन्तर्मन सदा ही हमारी इस आदत को भली-भॉंति जानता है। यह स्मरण रखना चाहिए कि उससे हम बच नहीं सकते। वह हमें सदा कचोटता रहता है।
            इस असार संसार में कौन पहले विदा लेगा और कौन बाद में, यह एक अनसुलझी पहेली है। अपने किसी प्रियजन से वियोग कभी भी हो सकता है यह हमें हमेशा याद रखना चाहिए। जीवन में न जाने कौन-सी रात आखिरी होगी इसलिए सबसे मिल-जुलकर रहना चाहिए। अपने झूठे अहं के नशे में इस संसार के भौतिक रिश्ते-नातों की गरिमा और मर्यादा खण्डित न होने पाए इसका ध्यान रखना आवश्यक है। हमें यह विश्लेषण समय-समय पर करते रहना चाहिए। 
           ईश्वर को हमें अपने जीवनकाल में हर कदम पर पल-पल स्मरण करना चाहिए जिससे अन्तकाल में जब उसके पास जाने का समय आए तो उस प्रभु से नजरें चुराने की कदापि आवश्यकता महसूस न हो। इस संसार से विदा लेते समय हमारे मन में परमपिता से मिलने की प्रसन्नता का अनुभव हो। यह मलाल न रहे कि काश समय रहते हम चेत जाते तो हम बहुत कुछ कर सकते थे। इस स्थिति से उबरने के लिए यह आवश्यक है कि हमें अभी से जागरूक हो जाना चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद 

रविवार, 22 जून 2025

गृहस्थ आश्रम सर्वोपरि

गृहस्थ आश्रम सर्वोपरि 

भारतीय संस्कृति में समाज को सुचारू रूप से चलाने के लिए वर्णाश्रम व्यवस्था का विधान किया गया है। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र ये चार वर्ण हैं। आश्रम भी चार हैं - ब्रह्मचर्य आश्रम, गृहस्थ आश्रम, वानप्रस्थ आश्रम और संन्यास आश्रम। आज हम गृहस्थ आश्रम के विषय में चर्चा करेंगे। भारतीय सामाजिक परिवेश में गृहस्थ आश्रम का महत्व शेष तीनों आश्रमों-  ब्रह्मचर्य आश्रम, वानप्रस्थ आश्रम और संन्यास आश्रम से अधिक है। इसका सीधा-सा कारण यह है कि गृहस्थ आश्रम अन्य तीनों आश्रमों का पालन करता है। 
            ब्रह्मचर्य आश्रम में शिक्षा ग्रहण की जाती है। विद्यार्थी अभी आजीविका कमाने के योग्य नहीं होता। इसलिए वह अपना भरण-पोषण नहीं कर सकता और अपने माता-पिता पर आश्रित रहता है।वानप्रस्थ आश्रम अपनी जिम्मेदारियों से मुक्त होकर सामाजिक कार्यों में जुटने  का समय होता है। सारी आयु संघर्ष करने के उपरान्त घर-परिवार की कमान अपने योग्य बच्चों को सौंपकर ईश्वर की ओर उन्मुख होने का प्रयास करना आवश्यक होता है। अत: रिटायर्ड लाइफ व नाती-नातिनों के साथ जीवन का आनन्द उठाना एक अलग प्रकार का ही अनुभव होता है।
             संन्यास आश्रम में जाने पर घर-परिवार का परित्याग करके समाज को दिशा देने का कार्य किया जाता है। संन्यासी स्वाध्याय करके मनन करते हैं व ईश्वर की उपासना में जुटे रहते हैं। इस समय वे अपनी आवश्यकताओं को सीमित कर लेते हैं। अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए ये पूज्यनीय व्यक्ति गृहस्थियों पर ही आश्रित रहते हैं। ये संन्यासी एक स्थान पर अधिक समय नहीं रुकते। 
            गृहस्थी का मूल आधार पति-पत्नी होते हैं।इन दोनों के सम्बन्धों में जितनी अधिक मधुरता होती है, घर-परिवार में उतना ही सौहार्द होता है।अब प्रश्न यह उठता है कि पति-पत्नी के सम्बन्ध कैसे होने चाहिए? 'रघुवंशम्' महाकाव्य में संस्कृत भाषा के महाकवि कालिदास ने भगवान शिव और भगवती पार्वती को आदर्श पति-पत्नी मानते हुए उनकी स्तुति की है-
        वागर्थाविव सम्पृक्तौ वागर्थ प्रतिपत्तये।
         जगत: पितरौ वन्दे पार्वतीपरमेश्वरौ।।
अर्थात् जिस प्रकार शब्द और अर्थ आपस में मिले हुए होते हैं, उन्हें एक-दूसरे से अलग नहीं किया जा सकता। वैसे ही माँ भगवती और भगवान शिव की एक-दूसरे के बिना कल्पना करना सम्भव नहीं है। संसार के माता-पिता शिव और पार्वती को मैं प्रणाम करता हूँ।
             हमारे भारत में आदर्श पति-पत्नी के उदाहरण स्वरूप शिव-पार्वती, राम-सीता आदि का उल्लेख किया जाता है। उन्हें आदर्श मानते हुए हम उनकी पूजा-अर्चना करते हैं।
             गृहस्थी की गाड़ी सुचारू रूप से चलाने वाले पति-पत्नी का आपसी व्यवहार सन्तुलित, दुराव-छिपाव रहित, निष्ठापूर्ण, सामंजस्य पूर्ण और परस्पर मित्रवत् होना चाहिए। यही एक आदर्श स्थिति है। दोनों को अपने-अपने पूर्वाग्रहों को छोड़कर एक-दूसरे का सच्चा हमसफर बनना चाहिए। यदि गुरु नानक देव जी के शब्दों में कहें तो उचित होगा- 
            एक ने कही दूसरे ने मानी। 
            नानक कहें दोनों ज्ञानी।
            इस तरह के परिवारों में सुख, शान्ति व समृद्धि का वास होता है। इन घरों की तुलना स्वर्ग से की जाती है। इन घरों के बच्चे आज्ञाकारी व यशस्वी होते हैं। हम सभी प्रबुद्ध जन मन से विचार करेंगे तो ऐसा समझ में आएगा कि आधुनिक परिवेश में आज सद्गृहस्थियों की बहुत आवश्यकता है। सामाजिक ढॉंचा चरमराने न पाए इसका हमें ही ध्यान रखना है।
चन्द्र प्रभा सूद 

शनिवार, 21 जून 2025

धर्म-कर्म व्यक्तिगत

धर्म-कर्म व्यक्तिगत 

धर्म-कर्म, पूजा-पाठ आदि प्रत्येक मनुष्य का व्यक्तिगत मामला है। किसी दूसरे को इसमें हस्तक्षेप करने का कोई अधिकार नहीं है। कौन व्यक्ति किस धर्म या सम्प्रदाय को मानता है या किस विशेष देवी-देवता की आराधना करता है, इस पर यदि व्यक्ति विशेष को ही विचार करने दें तो अधिक उपयुक्त होगा।
            कोई व्यक्ति साकार ईश्वर की उपासना करता है और कोई परमात्मा के निराकार रूप  की। कोई मनुष्य कर्मकाण्ड करता है, ईश्वर को नवधा भक्ति से रिझाने का यत्न करता है। दूसरी ओर कोई व्यक्ति केवल योग के माध्यम से उस तक पहुँचना चाहता है। इनके अतिरिक्त कोई व्यक्ति केवल मात्र जप-तप का मार्ग अपनाता है। कहने का अर्थ है तन्त्र, मन्त्र, यन्त्र किसी भी मार्ग को अपनाकर प्रभु तक पहुँचने के लिए मानव प्रयत्नशील है। ईश्वर की उपासना के किसी भी मार्ग को अनुचित कहना शोभनीय नहीं है। यह जरूरी नहीं कि हम दूसरे व्यक्ति की सोच से सहमत हों।
             विश्व में अनेक धर्म हैं और उनकी अनुपालना करने वाले भी असंख्य लोग हैं। इसमें झगड़े वाली कोई बात है ही नहीं। धर्मों को युद्ध का मैदान बनाना अनुचित कार्य है। ये सभी धर्म मानव जाति के उत्थान की चर्चा करते हैं। उसे सदा यही समझाते हैं कि ईश्वर को पाना ही उसका अन्तिम लक्ष्य है। अपने इसी लक्ष्य को प्राप्त करना मनुष्य के लिए परम आवश्यक है। अन्यथा उसे बार-बार इस धरती पर जन्म लेना पड़ेगा।
            ईश्वर एक है उसका हम अनेकानेक नामों से स्मरण करते हैं। ऋग्वेद का यह मन्त्रांश हमें समझाता है -
            एको हि सद् विप्रा बहुधा वदन्ति।
अर्थात् ईश्वर एक है। विद्वान उसे अलग-अलग नामों से सम्बोधित करते हैं।
             इस विषय में हम भौतिक जगत का एक उदाहरण लेते हैं। व्यक्ति एक होता है पर उसे बेटा, मित्र, पिता, भाई, मामा, चाचा, ताऊ, दादा, पति, फूफा, मौसा आदि अनेक नामों से उसे सम्बोधित करते हैं। इन सबके अतिरिक्त उसके कार्यक्षेत्र के अनुसार भी उसे किसी अन्य नाम से अभिहित किया जाता है। जब एक सांसारिक व्यक्ति को हम इतने सारे नामों से पुकार सकते हैं तो जिसने ऐसे अरबों-खरबों जीवों को उत्पन्न किया हैं, उसके असंख्य नाम होना तो स्वाभाविक ही है।
              सभी धर्म उस प्रभु तक पहुँचने का एक  मार्ग मात्र हैं। इसलिए सभी धर्म एकसमान कहे जा सकते हैं तथा उनकी श्रेष्ठता से इन्कार नहीं किया जा सकता। 
             यहॉं हम एक अन्य उदाहरण लेते हैं। मान लीजिए हमें अपने देश भारत की राजधानी दिल्ली जाना है। बताइए कैसे जाएँ? रेल से, बस से, हवाई जहाज से, अपनी कार से या अन्य कोई और ट्रक-टेम्पो आदि वाहन हो सकता है। इनमें से किसी भी साधन से देश या विश्व के किसी भी कोने से दिल्ली आया जा सकता है। इस भौतिक प्रदेश में पहुँचने के लिए अनगिनत मार्ग हैं। वैसे ही ये सभी धर्म भी हैं जो अपने-अपने तरीके से उस परमसत्ता तक जाने का मार्ग दर्शाते हैं। 
            सभी धर्म मानवता, सौहार्द, दया, करुणा, प्राणीमात्र से प्यार करना, अहिंसा आदि मानवोचित गुणों को पालन करने का पाठ पढ़ाते हैं। कोई भी धर्म लड़ाई-झगड़े या नफरत करने की आज्ञा हमें  नहीं देता। कुछ मुट्ठी भर इन्सानी दिमाग धर्म के नाम पर नफरत फैलाते हैं जिसे किसी भी प्रकार से उचित नहीं कहा जा सकता।
             मेरा धर्म श्रेष्ठ है, तुम्हारा धर्म निकृष्ट है, यह कहकर किसी भी धर्म को नीचा दिखाना अथवा उन विशेष धर्मावलम्बियों का अपमान करना कदापि उचित नहीं कहा जा सकता। लोगों को लालच देकर या तलवार के बल पर जोर-जबरदस्ती धर्मांतरण करवाना किसी भी तरह से उचित नहीं कहा जा सकता। अब यह हमारी मेधा या बुद्धि पर निर्भर करता है कि हम किस मार्ग पर चल कर अपना जीवन सफल बना सकते हैं अथवा किस राह को चुनकर अपने पैर पर कुल्हाड़ी मारने का कार्य करना चाहते हैं।
चन्द्र प्रभा सूद 

शुक्रवार, 20 जून 2025

अपने मुॅंह मियॉं मिट्ठू बनना

अपने मुॅंह मियाॅं मिट्ठू बनना 

मानवीय कमजोरी है कि किसी भी क्षेत्र में उसे अपने बराबर कोई दूसरा व्यक्ति नहीं दिखाई देता। अपने अतिरिक्त उसे सभी लोग बौने प्रतीत होते हैं। इसलिए वह अपने गुणों का बखान बढ़ा-चढ़ा कर करता है और अपने दोषों को सदा नजरअंदाज करता है। इसके विपरीत दूसरे के गुण उसे नगण्य प्रतीत होते हैं। दूसरों के राई जितने दोषों को बढ़ा-चढ़ाकर बताने में उसे बहुत ही आत्मिक सुख का अनुभव होता है।  
           भर्तृहरि जी 'नीतिशतकम्' ग्रन्थ में बड़े सुन्दर शब्दों में कहा है -
        परगुण परमाणून् पर्वती कृत्य नित्यं 
      निजहृदि विकसन्तः सन्ति सन्तः कियन्तः।
अर्थात् परमाणु के समान दूसरों के गुणों को पहाड़ जितना बड़ा करके अपने हृदय में विकसित करने वाले महान पुरुष कितने हैं। दूसरे शब्दों में ऐसे लोग बहुत कम हैं।
           इस बात को हम ऐसे भी कह सकते हैं कि हम दूसरों की कमियों को उजागर करने में कोई कोर-कसर नहीं रखना चाहते। उन्हें नमक-मिर्च लगाकर चटकारे लेकर सुनाते हैं। हम हमेशा इस बतरस का आनन्द उठाते हैं। परन्तु जब अपनी बारी आती है तो हम उसे सहन नहीं कर पाते। तब सामने वाले को भला-बुरा कहकर या गाली-गलौच करके अपने मन की भड़ास निकालते हैं। कभी-कभी तो हम उससे अपना सम्बन्ध तोड़कर किनारा ही कर लेते हैं।
              वैसे देखा जाए तो इन्सान गलतियों का पुतला है। जाने-अनजाने पता नहीं वह कितनी गलतियाँ करता रहता है। उनका प्रायश्चित्त भी उसे करना पड़ता है। कभी-कभी उसे उनका मूल्य भी चुकाना पड़ता है। यदि कबीरदास जी के निम्न दोहे को याद रखा जाए तो मनुष्य दूसरों के छिद्रान्वेषण करने के बजाय अपनी कमियाँ देखेगा-
     बुरा जो देखन मैं चला बुरा न मिलया कोए।
     जो दिल खोजा आपना मुझसे बुरा न कोए॥
अर्थात् जब मैं बुरे व्यक्ति को ढूॅंढने निकला तो मुझे कोई बुरा मनुष्य मिला ही नहीं। परन्तु जब मैंने अपने हृदय में झॉंककर देखा तो ज्ञात हुआ कि मुझसे बुरा कोई अन्य व्यक्ति है ही नहीं।
            कहने का तात्पर्य यह है कि स्वयं को खोजने पर ही ज्ञात होता है कि हम बहुत-सी गलतियाँ करते रहते हैं और बार-बार उन्हें दोहराते भी हैं। यदि इन्सान गलती न करे तो वह भगवान बन जाएगा। भगवान हर दोष एवं हर विकार से परे होता है। परन्तु मनुष्य चाहकर भी दोषों-विकारों से मुक्त नहीं हो पाता। कभी लालचवश और कभी स्वार्थवश वह अपने रास्ते से भटककर दोषी बन जाता है।
           समस्या केवल यह है कि दूसरों की निन्दा करना हमें अपना शगल लगता है। इस बात को हम भूल जाते हैं कि दूसरे की ओर जब हम एक अंगुली उठाते हैं तो बाकी चार अंगुलियाँ हमारी अपनी ओर उठी रहती हैं। जिसका सीधा-सा तात्पर्य है कि वे हमें चेतावनी दे रही हैं कि हम संभल जाएँ क्योंकि दूसरों की बनिस्बत हम चार गुणा अधिक गलतियाँ कर रहे हैं। फिर भी हम इस बात को समझ नहीं पाते। दुर्भाग्यवश हम पुनः पुनः उन्हीं गलतियों को दोहराते हैं।
             कबीरदास जी ने निम्न दोहे में हमें समझाया है कि निन्दा करने वाले से घबराना नहीं चाहिए उसे अपने बहुत पास रखना चाहिए-
       निंदक नियरे राखिए आँगन कुटी छवाए।
      पानी औ साबुन बिना निर्मल करे सुभाए॥
अर्थात् निन्दा करने वाले मनुष्य को अपने पास , अपने ऑंगन में कुटिया बनाकर रखना चाहिए। वह पानी और साबुन के बिना ही हमारे स्वभाव को निर्मल बना देता है।
             यानी निन्दक दूसरों को उनकी कमियाँ बताकर उन्हें सुधराने का कार्य करता है। वैसे तो सफाई का कार्य साबुन और पानी से करते हैं पर निन्दक हमारा शुभचिन्तक होता है। वह उनके बिना ही हमारे स्वभाव को निर्मल बना देता है।
           दूसरों के दोषों का ढिंढोरा पीटते हुए मनुष्य स्वयं की बुराइयों को भूल जाता है। वह एक के बाद एक गलती करता रहता है। दूसरे तो अपनी गलती को सुधारने का प्रयत्न कर लेते हैं पर वह अपनी ही धुन में रहता हुआ पतन की ओर बढ़ता है। अपने दोषों पर गहरी नजर रखकर उन्हें दूर करने का प्रयास करना समझदारी है। दूसरों की निन्दा-चुगली में अपना समय बर्बाद न करके सकारात्मक कार्यों में अपना बहुमूल्य समय व्यतीत करना चाहिए। इसी में हमारा हित निहित है। इससे हम अपना सर्वांगीण विकास कर सकते हैं। 
            दूसरे लोगों की निन्दा-चुगली करने से  अपना हृदय मलिन होता है और अपनी ऊर्जा भी नष्ट होती है। ऐसे नकारात्मक मनुष्यों से ईश्वर कदापि प्रसन्न नहीं होता। अत: आत्मोत्थान करने वाले लोगों को इस बुराई से यथासम्भव बचकर रहना चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद 

गुरुवार, 19 जून 2025

दाता का हाथ हमेशा ऊपर

दाता का हाथ हमेशा ऊपर 

सृष्टि का यह नियम है कि दाता यानी दानी का हाथ हमेशा ऊपर होता है और याचक यानी लेने वाले का हाथ सदा ही नीचे रहता है। यही बात प्रकृति के व्यवहार से हमें स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। हमारे समक्ष प्रत्यक्ष उदाहरण बादल का है। यह तो हम सब जानते हैं कि बादल हमारी जीवनी शक्ति जल को हमें प्रदान करता है इसलिए वह ऊपर आकाश में रहता है। इसके विपरीत पृथ्वी जल लेने वाली होती है। अतः वह नीचे होती है। 
                हम अपने आसपास पेड़ों की ओर एक नजर डालें तो हमें स्वयं ही समझ आ जाता है कि वे हमें शीतल छाया, हवा और मधुर फल देते हैं। वे सिर उठाकर ऊपर की ओर रहते हैं और हम याचक की भाँति उन्हें नीचे धरा पर खड़े रहकर उन्हें निहारते का काम करते हैं। जिससे भी हम याचना करते हैं उसके समक्ष हमारी नजरें भी झुकती हैं और हाथ भी आगे की ओर फैलाना पड़ता है अर्थात् मनुष्य को नीचा होना पड़ता है। दानी को किसी की भी सहायता करना एक सुखद अहसास देता है। दूसरी ओर याचना करने वाले की सिर झुका हुआ रहता है।
               प्रायः लोग जब बहुत ही मजबूरी या तकलीफ में होते हैं तो उन्हें माँगने की या किसी की सहायता की आवश्यकता पड़ती है। उस समय वह पल स्वाभिमानी व्यक्ति के लिए मरने के समान होता है। कहते भी हैं-
         माँगन गए सो मर गए मरकर माँगन जाए।
कुछ लोग जो चाटुकारिता प्रिय होते हैं अथवा मेहनत करके कमाना नहीं चाहते, उन्हें किसी से माँगने से कोई परहेज नहीं होता। उसी की बदौलत उनका जीवन यापन होता है। उन लोगों को अपने मान-सम्मान की कोई परवाह नहीं होती। उनके जीवन का तो यही एक मूल मन्त्र होता है-
          बाप बड़ा न भैया सबसे बड़ा रुपैया।
वे लोग किसी भी शर्त पर धन प्राप्त करने की सोचते हैं, बाकी सब उनकी नजर में बेमानी हो जाता है। ऐसे लोग गधे को बाप बनाने से नहीं चूकते।
               स्वाभिमानी व्यक्ति हाथ का मैल कहे जाने वाले धन को मिट्टी के ढेले के समान तुच्छ समझते हैं। वे केवल आत्म सम्मान को ही महत्व देते हैं।
            दानी व्यक्ति को अपनी प्रशंसा में हमेशा प्रशस्तियाँ नहीं गानी चाहिएँ। यदि सारा समय वह यहाँ-वहाँ अपनी उदारता का ढिंढोरा पीटता रहेगा तो उसमें अहंकार की भावना आ जाती है। यह घमण्ड उसके विनाश का कारण बन जाता है। तब उसकी गई सहायता का कोई मूल्य नहीं रह जाता। यदि वह उसे पुनः पुनः जताकर सहायता लेने वाले को शर्मिंदा करे। उसे हमेशा यह उक्ति याद रखनी चाहिए -
         नेकी कर और दरिया में डाल।
          मनीषी कहते हैं कि दाऍं हाथ से दान करो, और बाऍं हाथ को पता न चले। इस वाक्यांश है अर्थ है कि दान या किसी अन्य अच्छे काम को करते समय, इसे सार्वजनिक नहीं करना चाहिए। यानी दूसरों को बताने की आवश्यकता नहीं होती। इस वाक्यांश का मुख्य उद्देश्य किसी को भी अपने अच्छे कार्यों का प्रचार करने से रोकना है। दूसरी यह बात है कि जिसकी सहायता की है, उसे शर्मिंदगी का सामना न करना पड़े।
            प्रकृति नित्य प्रति हमें भरपूर देती है परन्तु कभी अहसान नहीं जताती। जितने की हम कल्पना भी नहीं कर सकते उससे भी कहीं अधिक वह हमें देती है। यदि वह जताती तो संसार पलभर में नष्ट हो जाता इतने वर्षों तक नहीं चलता। प्रकृति की ही तरह मनुष्य को देते समय यह कभी नहीं सोचना चाहिए कि वह देने वाला है। दाता होने का अहं त्यागकर उसे सोचना चाहिए कि देने वाला तो ईश्वर है जो अदृश्य रहकर मानव के मन में प्रेरणा देता है, तभी वह दानादि जैसे पुण्य कर्म करता है। मनुष्य तो केवल उस मालिक के हाथों की कठपुतली है और यही सत्य है। उसे हमेशा विनम्र रहना चाहिए।
               हमें अपनी शुद्ध कमाई से कुछ अंश बचाकर दूसरों की सहायता करनी चाहिए। समाज लेन-देन के व्यवहार से चलता है। ज़रूरतमन्दों को समर्थ बनाने हमें का यत्न करना चाहिए। देते समय दाता होने का भाव मन से निकालकर नजरें झुकाकर रखनी चाहिए। उस ईश्वर का धन्यवाद करना चाहिए, उसने हमें इस योग्य बनाया है कि हम किसी दूसरे के काम आ सके।
चन्द्र प्रभा सूद 

बुधवार, 18 जून 2025

स्वेच्छिक अकेलापन

स्वेच्छिक अकेलापन

अपने जीवन साथी की मृत्यु के वियोग में, स्वेच्छा से स्वीकृत किया गया अथवा तलाक के बाद होने वाला अकेलापन स्त्री और पुरुष दोनों के लिए ही भयावह होता है। जीवन में सभी को अपने जीवन साथी का वियोग सहना पड़ता है किसी को कम समय के लिए और किसी को अधिक वर्षों के लिए। यह सम्बन्ध अन्य भौतिक सम्बन्धों की तरह हमारे कर्मों के अनुसार ही होता है। पति-पत्नी का यह साथ ईश्वर की ओर से ही निर्धारित होता है। इसलिए जितना-जितना साथ निभाने का समय हमें मिलता है, उतना भर निभा कर हम इस संसार से विदा ले लेते हैं। बहुत कम भाग्यशाली पति-पत्नी के जोड़े होते हैं जिन्हें एक दूसरे का वियोग नहीं सहना पड़ता बल्कि एक साथ एक ही समय पर वे इस दुनिया से विदा लेते हैं।
           जीवन साथी की मृत्यु यदि आयु बीतने पर वृद्धावस्था में होती है तो अकेलापन अधिक गहराने लगता है। बच्चे अपने-अपने कार्यों में व्यस्त रहते हैं। वे अपनी जिम्मेदारियों में उलझे रहते हैं। ऐसे में वे अधिक समय तक उनके साथ बैठकर उनका अकेलापन बाँट नहीं सकते। हाँ, यदि साथी का बिछोह युवावस्था में हो तो कुछ लोग पुनर्विवाह कर लेते है। वे अपने लिए साथी तलाश लेते हैं तो अन्य अकेले रहकर अपनी व बच्चों की जिम्मेदारी उठाते हैं। पर जीवन में आया यह खालीपन उन्हें सदा टीसता रहता है।
              विवाहोपरान्त होने वाली असह्य स्थितियों के चलते पति-पत्नी दोनों अपने झूठे अहं के कारण जब आपस में परस्पर सामंजस्य स्थापित नहीं कर पाते तब अनेक समस्याएँ मुँह बाये खड़ी हो जाती हैं। उनको सुलझाने के स्थान पर उनके लिए तलाक ही अन्तिम मार्ग होता है। इनमें से भी कुछ पुनर्विवाह करके पुनः अपने नये साथी के साथ घर बसा लेते हैं और अपना अकेलापन दूर करते हैं। इसके विपरीत कुछ अन्य लोग जीवन के कटु अनुभवों के कारण अकेले रहना पसन्द करते हैं। वे अपना सारा जीवन एकाकीपन से झूझते हुए व्यतीत करते हैं।    
           आजकल अकेले रहना भी फैशन में शामिल हो रहा है। युवावर्ग जीवन की आपाधापी और कैरियर बनाने में इतना अधिक व्यस्त होता जा रहा है कि उसके पास विवाह के विषय में सोचने का समय ही नहीं है। उनके लिए यह फालतू के झमेले हैं। इससे वे बचना चाहते हैं। दिन-रात की मारधाड़ में किसी दूसरे के बारे में वे नहीं सोचते। अपने व्यस्त कार्यक्रम में उन्हें किसी साथी की कमी भी शायद महसूस नहीं होती। 
            आयु बीतने पर एक समय ऐसा आता है जब वे सारी सुख-सुविधाओं के होते हुए भी अकेले रह जाते हैं। आयु प्राप्त माता-पिता संसार से विदा ले चुकते हैं और भाई-बहन अपनी-अपनी घर-गृहस्थी में मस्त होते हैं।
           यह अकेलापन चाहे मजबूरी का सौदा हो या स्वैच्छिक चुनाव हर स्थिति में कष्टदायक होता है। स्वयं तो मनुष्य इससे पीड़ित रहता है पर समाज में रहते हुए भी अनेक परेशानियाँ होती हैं। आयु प्राप्त लोगों को सिर्फ समय बिताने की समस्या होती है उनके मान-सम्मान में कमी नहीं होती। इसीलिए पुरुष आपको यदाकदा इधर-उधर ताश खेलते या गप-शप करते नजर आते होंगे।
            युवाओं के लिए समय बिताने की समस्या का हल थोड़ा अलग होता है। वे किसी कलब के सदस्य बन सकते हैं या पर्यटन कर सकते हैं। पर ये मंहगे शौक हैं जो हर कोई नहीं पाल सकता। सामाजिक कार्यों में हर आयु के लोग स्वयं को व्यस्त रख सकते हैं।
            प्रायः अकेले युवाओं का अपने घर में आना मित्र या सम्बन्धी पसन्द नहीं करते। एकाध बार तो उनका स्वागत होता है पर बार-बार नहीं। उसका कारण है कि जिस के घर जाओगे उसकी अपनी पारिवारिक व सामाजिक व्यस्तताएँ होती है। उन लोगों के आने से वे बाधित होती हैं। इसका एक अन्य कारण है कि पुरुष मित्र सोचते हैं कि उनका मित्र उनकी पत्नी के साथ कहीं सम्बन्ध न बना ले अथवा उसकी पत्नी मित्र से अधिक प्रभावित न हो जाए। इसी तरह स्त्री को भी अपनी स्त्री मित्र के घर आने पर परेशानी होती है। सम्बन्धियों को भी ऐसा ही लगता है कि ये तो अकेले हैं पर ऐसा न हो कि हमारे अविवाहित बच्चे इनके साथ अपना अनैतिक सम्बन्ध न बना लें। 
           समाज की यह सोच है जिसे हम चाहते हुए भी बदल नहीं सकते। इसलिए युवाओं को इस पर विचार अवश्य करना चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद 

मंगलवार, 17 जून 2025

युवावर्ग में अकेलेपन की समस्या

युवावर्ग में अकेलेपन की समस्या

युवावर्ग में आज अकेलेपन की समस्या घर करती जा रही है। इस भौतिक युग में जीवन में आपाधापी इतनी अधिक  बढ़ गई है कि आज का युवा अपना मार्ग सुनिश्चित ही नहीं कर पा रहा। वह समझ ही नहीं पा रहा कि उसकी प्रमुखता या प्रायरिटी क्या है। यह वास्तव में एक बहुत गम्भीर समस्या है। युवाओं के अकेलेपन की इस समस्या का कुछ तो समाधान खोजना पड़ेगा।
        आज का युवा बहुत महत्त्वाकांक्षी है। वह अपना कैरियर बनाना चाहता है, वही उसकी प्राथमिकता है जो उचित भी है। इस भौतिक युग में समय के साथ ताल मिलाकर चलना वह बखूबी जानता है। वह उच्च शिक्षा प्राप्त करके दूर आकाश की ऊँचाइयों को छूना चाहता है। देश-विदेश जहाँ भी उसे मौका मिलता है, वह अपने लक्ष्य को पाने के लिए उस ओर बढ़ जाता है। इसलिए इस ओर वह इतना अधिक व्यस्त है कि जीवन के अन्य सभी पहलुओं की ओर नहीं देखना चाहता तथा उनके साथ सामंजस्य नहीं बिठा पा रहा। 
            जितना ही वह सफलता की सीढ़ियाँ चढ़ता जा रहा है उतना ही अकेला होता जा रहा है। दिन भर सिर्फ काम और काम। कभी मीटिंग और कभी टूर। सवेरे घर से समय से निकलने के बाद घर वापिस लौटने का उसका कोई समय नहीं होता। बस इसके अतिरिक्त और कोई गतिविधि नहीं और न ही कोई सामाजिक जीवन। शादी-ब्याह, पार्टी, तीज-त्योहार कुछ भी निभाना समय के अभाव के कारण बहुत कठिन हो जाता है। यह भी उनके अकेलापन का बड़ा कारण बन जाता है।
             अपने व्यावसायिक कार्योँ में व्यस्त रहने वाला युवावर्ग स्वयं अपने लिए न समय निकाल पाता है और न ही अपने बारे में सोच पाता है। अपने कैरियर के लिए सजग युवा तरक्की और तरक्की की आशा में अपनी उम्र की बढ़ती आहट को नहीं सुन नहीं पाता। अपने लिए जीवन साथी के विषय में सोचने का समय उसके पास नहीं है। यदि वह विवाह के बन्धन में बॅंध जाता है तो जीवन की भागदौड़ में जीवनसाथी व बच्चों के लिए समय नहीं निकाल पाता। 
             जब युवा अपने घर-परिवार के लिए समय नहीं निकाल पाता तो घर में व्यर्थ की तकरार में उनका समय व्यतीत होने लगता है। जिसके बढ़ जाने पर तालाक तक के हालत पैदा हो जाते हैं। तालाक के बाद कुछ युवा पुनर्विवाह कर लेते हैं और कुछ अपने कटु अनुभवों के बाद अकेले रहना ही पसन्द करते हैं।
              बहुत-सी स्थितियों में युवा को अपना भविष्य संवारने के लिए अपने घर-परिवार से दूर दूसरे शहर या विदेश में अपनी इच्छा से या अनिच्छा से नौकरी करने के लिए अकेले ही जाना पड़ता है। यह वह स्थिति होती है जब अकेलापन उसका साथी बन जाता है। कई बार वह ऐसे स्थान पर नौकरी कर रहा होता है जहॉं परिवार को ले जाना सम्भव नहीं हो सकता। उस स्थिति में विवशतावश अकेलापन उसका मित्र बन जाता है।
             कुछ युवा सही समय पर अपने अहं के कारण दूसरों में कमी निकालते रहते हैं जिससे आयु बीत जाती है और वे अकेले रह जाते हैं। कभी-कभी परिस्थितिवश यानी अपने पारिवारिक दायित्वों का निर्वाहण करते हुए भी उन्हें अकेले रह जाना पड़ता है। कुछ युवा आजकल स्वेच्छा से अकेलेपन का वरण करते हैं उनके ऐसा करने के पीछे कोई साख कारण नहीं होता। शायद वे अपने घर-परिवार की जिम्मेदारी उठाना ही नहीं चाहते। वास्तव में यह पीठ दिखाकर भागने वाली स्थिति होती है।
              युवा पति या पत्नी में से किसी एक की मृत्यु के बाद दूसरा साथी अपने बच्चों के लिए या अन्य किसी कारण से पुनः विवाह न करके अकेला रहने का निर्णय कर लेते हैं।
              युवा स्वेच्छा से एकाकी रहना चाहता है,  अपना भविष्य बनाना चाहता है। उसके पास यह सब सोचने का समय नहीं है, यह सब तो ठीक है। परन्तु युवावस्था के पश्चात जब वृद्धावस्था की ओर वह कदम बढ़ाता है तब उसके पास अपना कहने के लिए कोई नहीं होता। उस समय तक उसके माता-पिता इस लोक से विदा ले चुके होते हैं और भाई-बहन अपनी-अपनी गृहस्थी में व्यस्त हो जाते हैं। इस प्रकार वह दिन-दिन अकेला होता जाता है। उस समय अपने जीवन की ओर मुड़ कर देखना ही शेष बचता है।
चन्द्र प्रभा सूद 

सोमवार, 16 जून 2025

नारी सशक्तिकरण

नारी सशक्तिकरण

नारी सशक्तिकरण की चर्चा आज चारों ओर बड़े जोर शोर से हो रही है। यह समस्या केवल भारत की ही नहीं है अपितु समूचे विश्व की है। सोचने की बात यह है कि मात्र केवल भाषण देने या कुछ लेख लिख देने से अथवा कानून बना देने से इस समस्या का समाधान सम्भव नहीं हो सकता। इक्कीसवीं सदी के सभ्य कहे जाने वाले इस समाज में नारी उत्पीड़न की घटनाओं में दिन-प्रतिदिन बढ़ोत्तरी होती जा रही है। पुरुष मानसिकता में कुछ बदलाव आ रहा है, ऐसा प्रतीत नहीं होता।
             अपनी महान भारतीय संस्कृति की अनुपालना करने वाले हमारे देश में स्त्री को देवता मानकर सम्मान देने की परम्परा है। इसीलिए भगवान मनु विरचित 'मनुस्मृति:' के इस श्लोक में हमें समझाया है -
    यत्र नार्यस्तु पूजयन्ते रमन्ते तत्र देवता:।
    यत्रैतास्तु न पूजयन्ते सर्वास्तत्राफला: क्रिया:।।
अर्थात् जिस घर में नारी की पूजा होती है वहाँ देवता निवास करते हैं। और जहॉं इनकी पूजा या सम्मान नहीं होता, वहॉं किए गए समस्त कार्य निष्फल हो जाते हैं।
           दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं कि जिस घर में नारी का यथोचित सत्कार किया जाता है वहाँ सुख, शान्ति व समृद्धि का साम्राज्य होता है। घर की गृह लक्ष्मी जब प्रसन्न रहेगी तो घर में सकारात्मक वातावरण रहता है। वह घर मानो स्वर्ग बन जाता है। इसके विपरीत उसके दुखी या परेशान रहने से घर मानो युद्ध का अखाड़ा बन जाता है। उस घर की सुख-समृद्धि रूठ जाती है। नारी का सम्मान करने का निर्देश देने वाले हमारे भारत देश में आज उसकी शोचनीय अवस्था वाकई गम्भीरता से विचार करने योग्य है।
               इस अवस्था से उभरने के लिए नारी को स्वयं ही झूझना होगा। उसे अपना स्वाभिमान बचाने के लिए कटिबद्ध होना पड़ेगा। पहले उसे अपने लिए आवाज उठानी होगी। अपने अधिकारों के प्रति सजग होना होगा। सबसे बढ़कर अपनी शक्ति को पहचानना होगा। जब तक वह स्वयं होकर आगे नहीं बढ़ेगी तब तक उसकी सहायता न कोई कानून कर सकेगा और न ही कोई अन्य इन्सान।
            शहरों में स्त्री अपनी पहचान बनाने की भरसक कोशिश कर रही है। वह उच्च शिक्षा ग्रहण कर रही है। शिक्षा, ज्ञान, विज्ञान, खेलकूद, राजनीति, संगीत, फिल्म आदि सभी क्षेत्रों में अपना स्थान बना रही है। अपना वर्चस्व स्थापित कर रही है। इसके साथ ही घर, परिवार व समाज के प्रति अपने दायित्वों का निर्वाहण भी कर रही है। शहरों के में तो नारियाँ अपने स्वास्थ्य और कैरियर के प्रति सजग हो रही हैं। गाँवों में भी नारी सशक्तिकरण की उतनी ही महती आवश्यकता है। नारी को शहरों के साथ-साथ गाँवों में भी आगे बढ़कर अपने स्वाभिमान को बनाए रखना होगा। छोटे शहरों या गॉंवों में भी महिलाओं को आगे बढ़ने का प्रयास करना होगा। उन्हें भी अपनी बुद्धिमत्ता का लौहा मनवाना होगा।
            नारी को सशक्त होने के लिए आर्थिक  रूप से भी निर्भर होने की आवश्यकता है ताकि उसे किसी के आगे हाथ न फैलाना पड़े। इसलिए उसका शिक्षित होना बहुत आवश्यक है। अपनी इस आवश्यकता को वह समझने लगी है इसलिए उच्च शिक्षा ग्रहण कर रही है। हर वर्ष के आंकड़ों में विविध परीक्षाओं में लड़कियाँ लड़कों से बाजी भी मार रही हैं।
           अपनी योग्यता के बल पर वह सभी प्रकार के कम्पीटीशन में सफल होकर अपने कैरियर की ऊँचाइयों को छू रही है। देश-विदेश जहाँ भी उसे मौका मिलता है, वह उस अवसर का भरपूर लाभ उठा रही है। उच्च पदों पर आसीन होकर सबको आश्चर्यचकित कर रही है। किसी भी क्षेत्र में वह अपने पुरुष साथियों से कमतर नहीं है बल्कि उनके लिए ईष्या का कारण भी बन जाती है।
            अपनी सुरक्षा के लिए उसे मार्शल आर्ट आदि भी सीखना चाहिए। इसके साथ ही उसे अपने अधिकारों की अर्थात् कानून की जानकारी भी रखनी होगी ताकि विपरीत समय आने पर उसे किसी दूसरे का मुँह न देखना पड़े। वह स्वयं में इतनी सक्षम हो जाए कि बिना किसी की सहायता के सभी समस्याओं से निपटा सके।
             संविधान में बहुत से कानून महिलाओं की सुरक्षा के लिए बने हुए हैं। बहुत-सी सरकारी और सामाजिक संस्थाएँ भी उनकी मदद करने के लिए प्रस्तुत रहती हैं। परन्तु हम चाहते हैं कि आज नारी को किसी पर आश्रित नहीं रहना चाहिए। उसे अपनी शक्ति को टटोलना होगा। अपने डर से मुक्त होकर उसे अन्तस को सुदृढ़ बनाना होगा। तभी वह समाज पर अपनी छाप छोड़ सकने में समर्थ हो सकती है।
चन्द्र प्रभा सूद 

रविवार, 15 जून 2025

सन्त समाज का आईना

सन्त समाज का आईना

सन्त समाज का आईना व मार्गदर्शक होते हैं। साधु-सन्तों की जाति नहीं पूछी जाती बल्कि उनका ज्ञान परखा जाता है। इस विषय में कबीरदास जी ने कहा है-
      जाति न पूछो साधु की, पूछ लीजिए ज्ञान।
      मोल करो तरवार का, पड़ा रहन दो म्यान।।
अर्थात् साधु लोगों की जाति न पूछकर उनके ज्ञान की जानकारी लेनी चाहिए। उदाहरण देते हुए कहते हैं कि तलवार का मोलभाव करना चाहिए, उसकी म्यान का नहीं।
          जिसे हम वास्तव में सन्त कहते हैं वह संसार के बन्धनों से मुक्त होता है। ऐसा सन्त झूठ-फरेब, ईष्या-द्वेष, मोह-माया आदि सांसारिक बन्धनों में नहीं बॅंधता। वह सभी मनुष्यों को अपने समान ही समझता है। वह किसी आडम्बर या अपने नाम की इच्छा नहीं रखता। ऐसा सच्चा सन्त ही समाज का आभूषण कहलाता है। वह अनाम रहकर आत्मोन्नति के लिए समाज से कटकर जंगलों, पर्वतों या गुफाओं साधना करते हुए कैवल्य या मोक्ष प्राप्त करता है। और यदि वह समाज में रहता भी है तो भौतिक ऐश्वर्यों का त्याग करके समाज की भलाई के कार्य करते हुए इस संसार से विदा लेता है। 
            कवि ने बड़े ही सुन्दर शब्दों में मनस्वी जनों को परिभाषित किया है। 
      कुसुमस्तबकस्यैव द्वे वृत्ती तु मनस्वीनाम्।
     सर्वेषां मूर्ध्नि वा विराजयेत् वने वा विशीर्यात्।
अर्थात् कवि कहते हैं कि वास्तव में मनस्वी सन्त फूलों के गुच्छे की तरह होते हैं। वे जब शहर में रहते हैं तो सबके सिरों पर विराजमान होते हैं। यानी लोग उन्हें अपने सिर ऑंखों पर बिठाते हैं। यदि वे जंगलों में तपस्या करते हैं तो बिना किसी से प्रशंसा की अपेक्षा किए या किसी की नजर में आए नष्ट हो जाते हैं अर्थात् मोक्ष प्राप्त करते हैं।
            सन्त समाज में अपने सत्चरित्र और  गुणों से सर्वत्र अपनी सुगन्ध फैलाते हैं। सदा सन्तों को हम उनके सद् गुणों, संयम, आचार-व्यवहार, उनकी कथनी-करनी के एकरूप होना आदि गुणों से पहचान सकते हैं। इनके विपरीत चरित्र वाले साधु-सन्त नहीं हो सकते। 
          सन्त का जीवन जब क्रियात्मक और संयमी नहीं होगा तब तक उसके उपदेश का किसी पर प्रभाव नहीं पड़ता। इसलिए सन्त को पहचान कर, जाँच-परखकर उस पर विश्वास करना उचित होता है। दूसरे लोगों की चिकनी-चुपडी बातों में न उलझकर अपने विवेक पर भरोसा करना चाहिए। आपकी तर्क की कसौटी पर जो खरा उतरे उसे सन्त मान अनुसरण करें अन्य सभी को छोड दें।
          ‌ जो सन्त समाज को सही दिशा नहीं दे सकता अथवा दिग्दशर्क नहीं बन सकता तो ऐसा वह त्याज्य है व सम्मान प्राप्त करने के योग्य नहीं हो सकता। सन्त की कोई उपाधि नहीं होती। न ही उसके लिए कोई विशेष मापदण्ड होता है। उसके लिए किसी विद्वत परिषद के गठन की भी कोई आवश्यकता नहीं होती।
            सन्त यदि केवल पुस्तकीय ज्ञान या कुछ सिद्धियों के बल पर जन सामान्य को प्रभावित करता है परन्तु यदि उसका आचरण अनुकरणीय नहीं है तो वह सर्वथा त्याज्य है। पुस्तकीय ज्ञान तो गधे पर लादे बोझ की तरह होता है। यदि उसे पढ़कर उस पर मन, वचन व कर्म से आचरण न किया जाए तो वह भार बन जाता है। तभी 'पंचतन्त्र' में कवि ने कहा है-
             ज्ञानं भार: क्रियां विना।
अर्थात् यदि जीवन क्रियात्मक न हो तो ज्ञान भार बन जाता है।
         ‌  साधु-सन्तो की कसौटी उनके सद् गुण और उनका सदाचरण होती है। अपने विवेक रूपी निकष पर कसकर ही सन्तों को अपने सिर का ताज बनाएँ और अपने जीवन को धन्य करने का यत्न करें।
चन्द्र प्रभा सूद 

शनिवार, 14 जून 2025

अकेलापन मनुष्य के लिए अभिशाप

अकेलापन मनुष्य के लिए अभिशाप

अकेलापन मनुष्य के लिए एक अभिशाप होता है। सामाजिक प्राणी यह मनुष्य अकेला रहे इसकी कल्पना करना भी बहुत कठिन है। फिर भी इस सत्य को झुठलाया नहीं जा सकता है कि विश्व में अनेक लोग अकेले ही जीवन जीने के लिए विवश हैं। इसके पीछे कारण कोई भी हो सकता है। इस अकेलेपन के कारणों की हम समीक्षा करने का प्रयास करते हैं।
           अपने जीवन साथी की मृत्यु होने के कारण दूसरे साथी का अकेला हो जाना स्वाभाविक है। यानी जब दोनों साथियों में से एक काल कवलित हो जाता है तो दूसरा साथी निपट अकेला रह जाता है।इस स्थिति में यदि घर-परिवार का या बच्चों का साथ मिल जाए तो वह इन्सान सौभाग्यशाली होता है। अपने बच्चों का साथ पाकर मनुष्य मानो जी उठता है। उसका अकेलापन उसे काटने को नहीं दौड़ता।
          इसके विपरीत यदि अपनों के बीच रहते हुए उनमें अबोलापन हो जाए या एक-दूसरे को स्वीकार करने अथवा समर्पण करने की भावना ही न रहे तब भी मनुष्य अकेला हो जाता है। व्यक्ति को तब अपने बच्चे बोझ समझने लगते है। इस परिस्थिति में वह टूटने लगता है। जब यह अकेलापन उस पर हावी होने लगता है तब तनाव ग्रस्त हो जाता है। धीरे-धीरे वह डिप्रेशन में जाने लगता है। उस समय उसे लगता है कि ऐसी औलाद से वह बैऔलाद ही रह जाता तो अच्छा होता। तब उसे कम से कम इतना दुख तो नहीं होता।
             कुछ घर ऐसे भी होते हैं जिनमें केवल बेटियाँ होती हैं, बेटा नहीं। विवाहोपरान्त बेटियॉं अपने-अपने घर यानी ससुराल की जिम्मेदारियों में व्यस्त हो जाती हैं। उस समय अपने अकेले रह रहे माता या पिता को वे किसी भी कारण से चाहकर उतना समय नहीं दे पातीं जितना उन्हें देना चाहिए। माता या पिता बेशक उनकी मजबूरी समझते हैं परन्तु समस्या तो वही रहती है। ऐसी परिस्थिति में उन माता या पिता को वृद्धावस्था में अकेले होकर रह जाना पड़ता है। 
             आज के इस भौतिक युग में रोजी-रोटी के चक्कर में बच्चे अपने घर से दूर, अपने शहर को छोड़कर दूसरे प्रदेश में नौकरी की मजबूरी में चले जाते हैं। विश्व की दूरी भी कम होने के कारण बच्चे अपने देश को छोड़कर दूसरे देश में भी चले जाते हैं। उस समय माता या पिता के पास अकेले रहने के अलावा कोई और चारा नहीं बचता। क्योंकि अब बच्चे वापिस आ नहीं सकते। किन्हीं अपरिहार्य कारणों से माता या पिता वहाँ जा नहीं सकते। तब भी अकेलापन नासूर बन जाता है।
              ऐसे भी कई भाग्यहीन परिवार भी हैं जहाँ पूर्वजन्म कृत कर्मों के फलस्वरूप माता-पिता जीवन में सन्तान का मुख नहीं देख पाते। सन्तान के अभाव में घर सूना-सा लगता है। अपने अहं के कारण या किसी परिस्थितिवश वे बच्चे को गोद भी नहीं लेते, ऐसे वे भी अपने जीवन में अकेले रह जाते हैं। जीवन में यदि दुर्भाग्य की अधिकता हो तो इकलौते या एक से अधिक बच्चों की दुर्घटना में असमय मृत्यु हो जाती है तब माता या पिता में से जो एक पीछे बच जाता है, वह अकेला रह जाता है। यद्यपि दोष किसी का भी नहीं होता। यह अकेलापन उनकी विवशता बन जाती है।
            विधवा या विधुर का अकेलापन तो मजबूरी होती है, वह समझ में भी आता है। परन्तु कुछ लोग स्वेच्छा से भी अकेलेपन का चुनाव करते हैं। विवाह की आयु में अहंकारवश दूसरों में कमियाँ ढूँढ़ते रहते हैं। आयु बीत जाने पर निपट अकेले रह जाते हैं। उनके भाई-बहन जीवन में सेटल हो जाते हैं और अकेलापन उनका मित्र बन जाता है। आजकल कुछ युवा भविष्य में आने वाली जिम्मेदारियों को झंझट का नाम देकर भी विवाह नहीं करना चाहते। इसलिए वे अकेले रहना पसन्द करते हैं।
             किन्हीं कारणों से कुछ युवा घर-परिवार की जिम्मेदारियों को निपटाने में व्यस्त रहते हैं। इसलिए अपने विवाह के प्रति उदासीन रहते हैं। जब दायित्वों से मुक्त होते हैं तब तक उनके विवाह की आयु बीत जाती है। उनके छोटे भाई-बहन अपने-अपने पारिवारों में व्यस्त हो जाते हैं। वे अपने लिए बलिदान करने वाले के विषय में नहीं सोचते। उसका सम्मान करने में भी उन्हें जोर आता है। इस प्रकार त्याग करने वाला सबके होते हुए अकेले रह जाता है। 
            आज के भौतिक युग में धन लोलुपता इतनी बढ़ गयी है और मनुष्य स्वार्थ में अन्धा हो चुका है। कभी-कभी कुपुत्र माता या पिता की धन सम्पत्ति उनकी इच्छा से या धोखे से हथियाकर उन्हें घर से बेघर करके दरबदर की ठोकरें खाने के लिए छोड़ देते हैं।
            कुछ अन्य लोग बिल्कुल अकेले हैं या फिर भरापूरा परिवार होते हुए भी वे अकेलेपन का दंश झेल रहे हैं अथवा सामाजिक परिस्थितियों के वशीभूत होकर निपट अकेले होते हैं। वृद्धावस्था की मजबूरी के उनका कारण घर से बाहर आना-जाना कठिन हो जाता है तब वे न किसी से बातचीत कर पाते हैं और न ही कहीं आना-जाना कर सकते हैं। बस तब उनके अकेलेपन का उनका साथी घर बन जाता है। 
            आप सभी सुधीजनों से मेरा अनुरोध है कि जहाँ तक हो सके अपने बच्चों को संस्कारी बनाने के साथ-साथ अन्य बच्चों को भी माता-पिता की सेवा करने की प्रेरणा दें। हम सभी यदि अपने इस सामाजिक दायित्व का निर्वहण करते हैं तो इस अकेलेपन की समस्या से बचा जा सकता है।
चन्द्र प्रभा सूद 

शुक्रवार, 13 जून 2025

बच्चों में झूठ बोलने की समस्या

बच्चों में झूठ बोलने की समस्या

घर में माता-पिता तथा विद्यालय में अध्यापकगण बच्चों में झूठ बोलने की समस्या से परेशान रहते हैं। सोचने वाली बात है कि ये नन्हे-मुन्ने इस आदत के अभ्यस्त कैसे हो जाते हैं? उन बेचारे नौनिहालों को तो यह भी नहीं पता होगा कि वे दिन-प्रतिदिन कितनी भयावह बिमारी का शिकार बनते जा रहे हैं? अब यह सोचना हमारा कर्त्तव्य है कि बच्चों में पाई जाने वाली इस असत्यवादिता पर लगाम किस प्रकार लगाई जाए। जिसके कारण वे बेचारे मासूम हर स्थान पर डाँट-फटकार का सामना करने से बच जाएँ।
           यदि गहराई से सोचें तो इस समस्या की जड़ तक पहुँचने में हमें बिलकुल भी कठिनाई नहीं होगी क्योंकि इसका कारण भी हम सब ही हैं। अब आप सब हैरान हो रहे हैं न मेरी सोच पर। वास्तव में हमें अपने गिरेबान में झाँकने की आवश्यकता है। छोटा बच्चा अपने आसपास के माहौल का बड़ी बारीकी से निरीक्षण करता है। उससे बहुत कुछ सीखता भी है। बच्चा जाने-अनजाने उस सबको अपने जीवन में ढालने का प्रयास करता है।
              सबसे पहले हम अपने घर की बात करते हैं। बच्चे की सबसे पहली पाठशाला उसका घर होता है। अपने घर में वह जैसा देखता है, उसे ही ब्रह्म वाक्य मान लेता है। घर में उसे बराबर झूठ का व्यवहार दिखाई देता है। इस वाक्य पर चौंकिए नहीं। प्राय: घर में हर छोटी-बड़ी बात को हम एक-दूसरे से छिपाने की कोशिश करते हैं। इस प्रयास में हम बारम्बार झूठ बोलते हैं। किसी मित्र, पड़ौसी या सम्बन्धी से हम नहीं मिलना चाहते तो कहलवा देते हैं घर पर नहीं हैं। आफिस जाने का मन न होने पर बीमार होने का बहाना करके छुट्टी ले लेते हैं। घर में इस प्रकार झूठ का व्यवहार देखकर बच्चा उस व्यवहार को सत्य मानकर उसी राह पर चल पड़ता है।
          कई बार हम बच्चे को कहीं बाहर नहीं ले जाना चाहते। कारण कोई भी हो सकता है। फिल्म देखना या शापिंग के लिए जाना या किसी से मिलने जाना या अन्य कोई और कारण हो सकता है। उसे घर पर रहने के लिए कहा जाए तो वह मानने को तैयार नहीं होता। तब हम अनावश्यक बहाना बनाते हैं कि आफिस जा रहे हैं या डॉक्टर के पास इंजेक्शन लगवाने जा रहे हैं आदि। उस समय बच्चे का कोमल मन इन बहानों को मानकर चुप लगा जाता है। सोचिए बच्चे के झूठ बोलने की ट्रेनिंग तो आरम्भ हो गई।
           जाने-अनजाने हमें अपना असत्य व्यवहार अच्छा लगता है। हमें याद ही नहीं रहता कि हमने बच्चे के सामने कितनी बार झूठ बोला है। परन्तु जब मासूम बच्चा वैसा असत्य व्यवहार करता है तो हम उस पर आगबबूला हो जाते हैं। उसे भला-बुरा कहते हैं, डाँटते-डपटते हैं और जीभर करके उसे कोसते हैं। कभी-कभी उसे सजा भी देते हैं। परन्तु अपने गिरेबान में झांकना नहीं चाहते। वह बेचारा मासूम बच्चा हैरान-परेशान हो जाता है। वह समझ ही नहीं पाता कि उसने कौन-सी गलती की है? जो उसे इस प्रकार डॉंटा जा रहा है।
            इसी भाँति अपने आसपास हो रहे ऐसे कार्यकलाप उसके विचारों को और अधिक हवा देते हैं। धीरे-धीरे बच्चा झूठे आचरण का इतना आदि हो जाता है कि वह अपनी सुविधा के लिए विद्यालय में अपनों की बिमारी की अथवा मौत की झूठी खबर सुनाने में भी परहेज नहीं करता। नित नए बहाने बनाने में वह अपनी शान समझता है और उसमें एक्सपर्ट हो जाता है। ऐसा लगता है मानो उसने झूठे बहाने गढ़ने में पीएचडी कर ली है।
            विद्यालय में गृहकार्य करके न जाने की शिकायत जब अध्यापक करते हैं अथवा परीक्षा में उसके कम अंक आने हैं तो माता-पिता के बुलाने पर वह टालमटोल करने के बहाने बनाता है। कई बार डर के कारण बच्चा माता-पिता के जाली हस्ताक्षर करके विद्यालय में डाँट खाने से बचने की कामयाब-नाकामयाब कोशिश करता है। घर में अपनी असफलताओं की चर्चा न करके उन्हें छिपाने का प्रयास कर ता है।
             जब तक घर में उसकी असलियत पता चलती है तब तक बहुत देर हो चुकती है। तब तक बच्चा झूठ बोलने का अभ्यस्त हो चुका होता है। वह इतनी सफाई से झूठ बोलता है कि उसके झूठ को पकड़ पाना बहुत कठिन हो जाता है। उस समय बच्चे का सुधार नामुमकिन तो नहीं कठिन अवश्य हो जाता है। इस बात को अवश्य याद रखिए कि इस संसार में बच्चा जब जन्म लेता है तब वह मासूम होता है, कोरी स्लेट की भॉंति होता है। इस दुनिया के छल प्रपंचो से अनजान होता है। उसे छल-कपट के संस्कार हमीं देते हैं।
             उन भोलेभाले बच्चों पर हम बड़े अपनी महत्त्वाकांक्षाओं का अनावश्यक दबाव डालने लगते हैं जिसके कारण भी हमसे छुपाने के चक्कर में वह असत्यवादिता को अपना सखा बना लेता है और दिन-प्रतिदिन हमसे दूर होता जाता है। उसकी समस्या को समझते हुए उसके साथ प्यार से पेश आना चाहिए। प्रयास करने पर अपने बच्चे को इस गलत व्यवहार से बचा सकते हैं।
चन्द्र प्रभा सूद 

गुरुवार, 12 जून 2025

माता-पिता का उपकार

माता-पिता का उपकार 

माता-पिता हमें इस संसार में लाकर हम पर बहुत उपकार करते हैं। उनके इस ॠण को मनुष्य आजन्म चुका नहीं सकता। चाहे वह सारी आयु उनकी सेवा करता रहे, उनके ऋण से उऋण नहीं हो सकता। माँ मनुष्य का पालन-पोषण करती है।  स्वयं गीले में रहकर हमें सूखे में सुलाती है। वह हर प्रकार से हमारे सुख का ध्यान रखती है। वह हमें अक्षर ज्ञान भी कराती है। इसलिए वह हमारी प्रथम गुरू कहलाती है। वह महान है और पूज्या है। पिता हमारा पोषक है इसलिए उसे आकाश से भी ऊँचा और महान कहा गया है।
          हमारे धर्म ग्रन्थ माता-पिता को देवता मानने का आदेश देते हैं। 'तैत्तिरीयोपनिषद्' में मनुष्य को अनुशासित करते हुए कहा हैं -
           मातृदेवो भव पितृदेवो भव।
अर्थात् माता को देवता मानो। पिता को देवता मानो।
            मन्दिरों में जाकर पत्थर के देवी-देवताओं की हम पूजा करते हैं। मैं इस बात का विरोध नहीं करती। परन्तु घर में बैठे जीवित देवताओं यानी अपने माता-पिता की पूजा करनी चाहिए। इसका यह अर्थ नहीं कि धूप-अगरबत्ती जलाकर प्रतिदिन उनकी आरती उतारी जाए। इसका अर्थ यह है कि आयु प्राप्त होते हुए माता-पिता की आवश्यकताओं को जान-समझकर उनको पूर्ण किया जाना चाहिए। उनके भोजन, आराम व स्वास्थ्य का ध्यान रखना चाहिए। उनके रोगी होने पर उनका समुचित इलाज करवाना चाहिए।
            अपने माता-पिता की अवहेलना करना सर्वथा अनुचित हैं। कुछ बच्चे उनकी सेवा करने के स्थान पर उन्हें दाने-दाने का मोहताज बना देते हैं। घर में उन्हें रहने का ठिकाना भी नहीं देना चाहते। उनकी जरूरतों को पूरा करने में भी वे कोताही बरतते हैं। आजकल विदेशियों की नकल करते हुए कुछ बच्चे अपने माता-पिता को ओल्ड होम में भेज देते हैं जो हमारी भारतीय संस्कृति के अनुसार बहुत ही शोचनीय स्थिति है।
             दोनों पति-पत्नी यदि कमाते हैं तो भी माता-पिता को देने के लिए उनके पास पैसे नहीं बचते जबकि उनके अपने खर्च में उनकी कोई कमी नहीं होती। उनके अपने सभी कार्य निश्चित ढर्रे पर चलते रहते हैं। यह एक बहुत ही निन्दनीय स्थिति है। व्यापारियों की हालत भी कोई अधिक अच्छी नहीं है। जमा-जमाया कारोबार सम्हालने पर भी उन्हें अपने ही माँ-पापा बुरे लगने लगते हैं। 
            बच्चे अपने माता-पिता से सारी उम्मीदें लगाकर रखते हैं। उनके मरने के पश्चात क्रिया कर्म के नाम पर लाखों रुपये अपनी शान बघारने के लिए खर्च कर देते हैं ताकि समाज में उनकी नाक ऊँची रहे। यदि इसमें से कुछ राशि उनके जीवनकाल में उन बुजुर्गों पर खर्च कर दी होती तो उनका आशीर्वाद उन्हें मिलता। यदि बद्दुआऍं फलती हैं तो बड़ों से मिलने वाला आशीर्वाद भी अवश्य ही फलीभूत होता है।
        बच्चे अपने माता-पिता से सब कुछ पाना चाहते हैं। उनके पास जो धन-सम्पत्ति या कारोबार आदि है, वह सब समेटना चाहते हैं। वे हर समय माता-पिता को उनके कर्तव्य याद दिलाना चाहते हैं परन्तु वे अपने सारे दायित्वों से विमुख हो जाते हैं। बड़े दुर्भाग्य की बात है कि जिन माता-पिता को बच्चों के हाथ से जीते-जी पानी भी नसीब नहीं हो पाता उनके मरने के पश्चात उनके बच्चे उनके नाम से पत्थर लगवाकर यश बटोरना चाहते हैं।
          अपने बच्चों के समक्ष ऐसे उदाहरण प्रस्तुत करने के स्थान पर उन्हें ऐसे आदर्श सिखाएँ कि वे अपने माता-पिता का अनादर करने का साहस न कर सकें। वे समाज के डर से अपने माता-पिता की सेवा न करें अपितु अपने मन से देवता मानकर माता-पिता की सेवा करें और उनके प्रति अपने दायित्वों को पूरा करें।
           कुछ दशक पूर्व संयुक्त परिवारों के चलते बड़े बुजुर्गो की देखभाल सरलता से हो जाया करती थी। घर में चलते-फिरते परिवारी जन उनका ध्यान रख लिया करते थे। बच्चे भी अपने दादी-दादा के सान्निध्य में सुरक्षित महसूस किया करते थे। वे उनके पास बैठकर बातचीत करके, कहानी सुनकरके या उनके साथ खेलकर अपना समय व्यतीत कर लिया करते थे। परन्तु आजकल इच्छा से अथवा विवशता के कारण एकल परिवारों का प्रचलन बढ़ रहा है। इस कारण समस्याऍं भी अधिक बढ़ने लगीं हैं। फिर भी इसका कोई हल तो निकालना ही होगा।
           मैं निराशावादी बिल्कुल नहीं हूँ। आज भी ऐसी योग्य सन्तानें हैं जो अपने माता-पिता के लिए हर सुख का बलिदान कर उनके लिए जीती हैं। हर समय उनके लिए सुख-साधनों को जुटाती रहती हैं। ऐसे ही बच्चों के कारण हमारी सांस्कृतिक विरासत अभी तक बची हुई है और भारतीय पारिवारिक ढाँचा बरकरार है।
चन्द्र प्रभा सूद 

बुधवार, 11 जून 2025

अन्तरात्मा की आवाज

अन्तरात्मा की आवाज़

अन्तरात्मा हमारे शरीर में विद्यमान आत्मा को कहते हैं। कुछ विद्वान इसे मन भी कहते हैं। मनीषी कहते हैं कि यह अन्तरात्मा समय-समय पर मनुष्य से वार्तालाप करने का प्रयास करती रहती है। इस अन्तरात्मा की आवाज के बारे में हम सबने सुना अवश्य है परन्तु इसके बारे में जानते नहीं हैं। किसी आवाज को सुनने का अर्थ होता है कि कोई मनुष्य कुछ बोल रहा है और दूसरा व्यक्ति उसे सुन रहा है। इसके विपरीत अन्तरात्मा की बातचीत दो या अधिक लोगों की परस्पर होने वाले वार्तालाप की भॉंति नहीं होती है। इसलिए इसे समझना अथवा पकड़ पाना बहुत कठिन होता है।
           अब विचार यह करना है कि आखिर अन्तरात्मा की आवाज है क्या? यह कैसी आवाज होती है? क्या यह सबको सुनाई देती है या किसी व्यक्ति विशेष को यह सुनाई देती है? अन्तरात्मा से क्या बातचीत की जा सकती है?
          इस प्रश्नों के उत्तर में यही कहा जा सकता है कि इस आवाज को केवल हम ही सुन सकते हैं। हमारे पास बैठा हमारा कोई प्रियजन, परिवारीजन  या मित्र तक भी इसे नहीं सुन सकता। यह आवाज कहीं बाहर से नहीं आती बल्कि हमारे अन्त:करण से ही आती है। जैसे हम अपनों से बात करके उसे गुप्त रखते हैं ताकि उसकी सिक्रेसी बनी रहे। उसी तरह हमारे अन्तस् से आने आवाज भी गुप्त रह सके इसीलिए यह अन्य किसी को सुनाई नहीं देती। दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं कि यह आवाज केवल वही व्यक्ति सुन सकता है जिसकी अन्तरात्मा से आवाज आती है।
           यह आवाज हमें कब और क्यों जगाती है? यह प्रश्न विचारणीय है। जब भी हम कोई ऐसा कार्य करते हैं जो घर-परिवार, समाज, देश आदि के नियमानुसार होता हैं तब हमारे मन में एक प्रकार का उत्साह होता है, खुशी होती है। इसका अर्थ होता है कि हमारा किया जाने वाला कार्य करणीय है अर्थात् करने योग्य है। उन कार्यों को हमें बिना अधिक विचारे कर लेना चाहिए। ये वही कार्य होते हैं जो हमें मानसिक शान्ति व सुख-चैन की जिन्दगी प्रदान करते हैं।
           इसके विपरीत जिन कार्यों को करते समय हमारे मन में उत्साह नहीं होता, हमारा मन बैचेन होने लगता है तो वह निश्चित ही अकरणीय(न करने योग्य) कार्य होते है। वे घर-परिवार, समाज, देश आदि के नियमों के विरूद्ध किए जाने वाले कार्य कहलाते हैं। उन कार्यों को करने से हमें एकदम किनारा कर लेना चाहिए। ये कार्य हमारा सुख, हमारी नींद उड़ाने वाले होते हैं। ये कार्य हमें विनाश के मार्ग पर ले जाने वाले भी हो सकते हैं। जिस कारण हम न्याय व्यवस्था के दोषी बनकर अपने घर-परिवार और बन्धु-बान्धवों से विमुख होकर अकेले हो सकते हैं।
          मन में होने वाली उथल-पुथल को गहराई से समझने पर स्वयं ही हम ज्ञात कर सकते हैं कि हमें कौन-से कार्य करने चाहिए और किन्हें छोड़ देना श्रेयस्कर होगा। हमारी अन्तरात्मा हमें बार-बार आवाज देती रहती है। यदि बार-बार हम इस आवाज को सुनकर अनसुना करते रहते हैं तो एक समय ऐसा भी आता है जब यह आवाज हमें सुनाई ही नहीं देती। वह हमें चेतावनी देने का कोई भी अवसर नहीं छोड़ती। बस हम ही अपने स्वार्थवश उससे अनजान बने रहना चाहते हैं।
           यदि हम अपनी आत्मा की आवाज सुनकर, उसके अनुसार कार्य करते हैं तब हम वास्तव में स्वयं पर उपकार करते हैं और अपने मित्र बन जाते हैं। फलस्वरुप हम सफलता की सीढ़ियाँ चढ़ते जाते हैं। ऐसी अवस्था में हमारा मन प्रफुल्लित रहता है, उत्साहित रहता है। यदि हम आत्मा की आवाज के विपरीत कार्य करते हैं तो हमारा मन हमें कचोटता है, हमें निरूत्साहित करता है। तब हम स्वयं के शत्रु बन जाते हैं। अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारने का कार्य करते हैं। तब दुर्भाग्यवश अपने पतन का कारक हम स्वयं ही बन जाते हैं।
           हम कैसा जीवन जीना चाहते हैं इसका निर्णय हमें स्वयं करना है। हम अपने जीवन में सफलता के सोपानों पर चढ़ना चाहते हैं अथवा अपना अधोपतन करना चाहते हैं। इसलिए हमें अपने मन की, अपनी अन्तरात्मा की आवाज को सुनकर उसके अनुरूप ही कार्य करते चले जाना चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद

शास्त्रों में बताए स्वच्छता के निमय

शास्त्रों में बताए स्वच्छता के नियम

हमारे महान पूर्वज अत्यन्त दूरदर्शी थे। हमारे ग्रन्थों में पूर्ण रूप से स्वच्छता के नियमों का पालन करने का स्पष्ट निर्देश दिया गया है। इनकी अनुपालना हमें सदैव करनी चाहिए। इससे कई बिमारियों से बचा जा सकता है। बहुत से लोग इन सब बातों को ढकोसला कहकर अनदेखा करते हैं। उन्हें यह ज्ञात नहीं कि स्वास्थ्य के इन नियमों को मानकर वे किसी पर अहसान नहीं कर रहे बल्कि अपने जीवन के लिए खुशियॉं बटोर रहे हैं। हमारे दैनिक जीवन के लिए उपयोगी इन सूत्रों पर विचार करते हैं।
            कुछ समय पूर्व इन श्लोकों को मैंने कहीं पढ़ा था। वहॉं पर इनके संग्रहकर्ता का नाम नहीं लिखा हुआ था। मैं उस महानुभाव के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हुए इन उद्धरणों को प्रस्तुत करती हूॅं। साथ ही इन पर अपनी टिप्पणी देती हूॅं।
        हम लोग रसोई में काम करते हुए अंदाज से ही मसाले आदि अपने हाथों से बर्तन में डाल देते हैं। बहुत से लोग खाद्य पदार्थों को भी अपने हाथ से ही परोसते हैं। 'धर्मसिन्धु' नामक ग्रन्थ ने हमें इस विषय पर समझाते हुए कहा है -
        लवणं व्यञ्जनं चैव घृतं तैलं तथैव च।
       लेह्यं पेयं च विविधं  हस्तदत्तं न भक्षयेत्।।
                          - धर्मसिन्धु 3पू. आह्निक
अर्थात् नमक, घी, तेल अथवा कोई अन्य व्यंजन, पेय पदार्थ या फिर कोई भी खाद्य पदार्थ चम्मच से परोसने चाहिए, हाथों से नहीं। हाथ से परोसता गया वह खाने के योग्य नहीं रह जाता।
        कहने का तात्पर्य यह है कि  नमक, घी, तेल, चाटने-पीने के पदार्थ अथवा कोई भी व्यंजन अगर हाथ से परोसा गया हो, तो उसे नहीं खाना चाहिए।इन चीजों को चम्मच से परोसकर ही खाना चाहिए। ताकि हाथों में लगे कीटाणु शरीर में प्रवेश न करने पाऍं। चाहे कितना भी हाथों को धो लिया जाए और यह कहा जाए कि हमारे हाथ साफ हैं, उनमें कुछ भी नहीं लगा है। चलिए इस बात को मान भी लिया जाए पर हाथ से परोसता हुआ देखने में दूसरे को घिन आती है। इसलिए सदा सर्विंग स्पून से ही भोजन को परोसना चाहिए।
           वैज्ञानिक दृष्टि से यह सत्य है कि अपने अंगों यानी ऑंख, नाक और कान आदि अंगों को अनावश्यक स्पर्श नहीं करना चाहिए। स्वास्थ्य की दृष्टि से भी यह उचित नहीं होता। सार्वजनिक स्थानों पर तो विशेष कर इन अंगों को छूने से बचना चाहिए। देखने वाले के मन में भी घृणा का भाव आता है। इसलिए 'मनुस्मृति' 4/144 में मनु महाराज ने चेतावनी देते हुए यह कहा है -
        अनातुरः स्वानि खानि न स्पृशेदनिमित्ततः।
अर्थात् अपने शरीर के अंगों जैसे आँख, नाक, कान आदि को बिना किसी कारण के छूना नहीं चाहिए।
         अब हम चर्चा करेंगे 'मार्कण्डेय पुराण' 34/52 की। व्यास जी ने स्पष्ट रूप से कहते हैं कि एक बार जिन वस्त्रों को पहन लिया है, उन्हें बिना धोए दुबारा नहीं पहनना चाहिए। 
      अपमृज्यान्न च स्न्नातो गात्राण्यम्बरपाणिभिः ।। 
अर्थात् एक बार पहने हुए वस्त्र धोने के पश्चात ही पहनने चाहिए। स्नान के बाद अपने शरीर को शीघ्र सुखाना चाहिए।
           इस कथन के पीछे शारीरिक हाइजीन की बात कही गई है। प्रतिदिन स्नान करने के उपरान्त स्वच्छ वस्त्र पहनने चाहिए। कुछ लोग कई दिनों तक बिना धोए वस्त्र पहनते हैं। शायद वे नहीं जानते  कि देखने वालों को उनके कपड़ों में लगी मैल देखकर बहुत नफरत होती है। बहुत दिनों तक पहने  उन कपड़ों में से प्रायः दुर्गन्ध भी आने लगती। यह सचमुच बहुत क्षुब्ध करने वाला होता है।
        'विष्णुस्मृति:' 64 में भी इसी तथ्य पर बल दिया गया है - 
       न अप्रक्षालितं पूर्वधृतं  वसनं बिभृयाद् ।।
अर्थात् एक बार पहने हुए वस्त्रों को धोकर स्वच्छ करने के पश्चात ही दूसरी बार पहनना चाहिए।
        'महाभारत अनु' 104/86 में दूसरे द्वारा पहने गए वस्त्रों को न पहनने पर बल दिया है।
           तथा न अन्यधृतं (वस्त्रं धार्यम्)
इससे यही समझ सकते हैं कि एक व्यक्ति ने वस्त्र पहनने के उपरान्त उतार दिए और फिर बिना धोए दूसरे व्यक्ति ने उन्हें पहन लिया। यह सचमुच हाइजीन के विरुद्ध है। इस प्रकार करना स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हो सकता है।
       इससे भी बढ़कर' पद्म० सृष्टि' 51/86 का कथन है -
        न धारयेत् परस्यैवं स्न्नानवस्त्रं कदाचन ।I
अर्थात् स्नान के बाद अपने शरीर को पोंछने के लिए किसी अन्य के द्वारा उपयोग किया गया वस्त्र यानी टॉवेल का उपयोग नहीं करना चाहिए।
         'गोभिलगृह्यसूत्र' 3/5/24 में यह निर्देश दिया गया है कि गीले वस्त्र न पहनें -
         न आद्रं परिदधीत।
         कहने का तात्पर्य यह है कि स्नान करने के उपरान्त यदि बिना शरीर सुखाए गीले वस्त्र पहन लिए जाऍं तो त्वचा से सम्बन्धित रोग होने की सम्भावना बनी रहती है। इसलिए गीले वस्त्र अथवा गीले शरीर पर वस्त्र पहनने से बचना चाहिए।
      अन्यत्र 'महाभारत अनु' 104/86 में यह बताया गया है कि पूजा करने, सोने और घर से बाहर जाते समय अलग-अलग वस्त्रों को प्रयोग में लाना चाहिए।
       अन्यदेव भवद्वासः शयनीये नरोत्तम।
    अन्यद् रथ्यासु देवानाम अर्चायाम् अन्यदेव हि।।
इसका यही अर्थ समझ में आता है कि एक ही बार के पहने वस्त्रों को हर स्थान पर नहीं पहनना चाहिए। हर अवसर पर भिन्न-भिन्न वस्त्रों को  उपयोग में लाना चाहिए।
         'वाघलस्मृति:' 6 में स्नान किए बिना कर्म न करने पर बल दिया है -
     स्नानाचारविहीनस्य सर्वाः स्युः निष्फलाः क्रियाः। 
अर्थात् बिना स्नान व शुद्धि के यदि कोई कर्म किये जाते हैं तो वो निष्फल रहते हैं।
          यहॉं कर्म से तात्पर्य धार्मिक कार्य यानी पूजा-अर्चना आदि आत्मशुद्धि के लिए किए जाने वाले कार्यों से है।
       'पद्म०सृष्टि' 51/88 में समझाया गया है कि जब भी भोजन के लिए बैठें तो पहले हाथ, मुॅंह तथा पैरों को धो लेना चाहिए।
         हस्तपादे मुखे चैव पञ्चाद्रे भोजनं चरेत्।
         'सुश्रुतसंहिता' में भी सुश्रुत जी ने इसी बात का समर्थन किया है कि अपने हाथ, मुॅंह व पैर स्वच्छ करने के बाद ही भोजन करना चाहिए।
       नाप्रक्षालितपाणिपादो भुञ्जीत।
         यह दोनों वक्तव्य हमें यही चेतावनी दे रहे हैं कि हम अपने स्वास्थ्य के प्रति जागरूक हो जाऍं। कहीं बाहर से आने पर तो यह आवश्यक है कि हम अपने मुॅंह, हाथ और पैर में लगे अदृश्य कीटाणुओं से इनकी रक्षा करें। पता नहीं बाहर हम किन किन वस्तुओं का स्पर्श करते हैं। वहॉं से आने वाले कीटाणु शरीर के लिए घातक हो सकते हैं।
             हमारे प्राचीन धर्म ग्रन्थों में समय-समय पर हम भारतवासियों को अनेक वर्षों पूर्व स्वास्थ्य के नियमों का पालन करते हुए सावधानियॉं बरतने का आदेश दिया गया था। हम लोग ही अज्ञानतावश स्वास्थ्य के इन अमूल्य नियमों को भूल गए थे। इन्हें अपनाकर हम अपनी व्यक्तिगत स्वच्छता को बनाकर रख सकते हैं। यह विचारणीय है कि हमारे महान मनीषियों ने अपनी दूरदर्शिता से उस समय ये सब निर्देश दिए थे जब आधुनिक काल की भॉंति माइक्रोस्कोप नहीं होते थे।
           इस विश्लेषण से एक बात और स्पष्ट होती है कि हमारे यहॉं स्वच्छता के लिए बनाए गए इन नियमों का पालन हमारे पूर्वज किया करते थे, तभी वे नीरोगी रहते थे। यदि हम लोग अपने पूर्ववर्ती ऋषियों द्वारा बताए गए आज भी प्रासंगिक इन सुझावों को अपने जीवन में ढाल लेते हैं और सदाचरण का अभ्यास करते हैं तो बहुत-सी परेशानियों से बच सकते हैं। मुझे आशा ही नहीं अपितु पूर्ण विश्वास है कि आप सुधीजन भी इससे सहमत होंगे।
चन्द्र प्रभा सूद 
  

ज्ञानार्जन करिए

ज्ञानार्जन करिए

हमारे महान ग्रन्थ ज्ञान का अथाह सागर हैं। यह हम पर निर्भर करता है कि हम उस सागर से मोती लेकर आ सकते हैं या किनारे पड़ी सीपियों से ही सन्तुष्ट हो जाते हैं। यदि हम उन अपने ग्रन्थों का पारायण नहीं करेंगे तो कितना भी बड़ा पुस्तकालय हमारे पास है, वह हमारे लिए व्यर्थ है। वह केवल प्रदर्शन के लिए ही रह जाएगा। यानी हम अपने घर आने जाने वालों को वह खजाना दिखाकर वाहवाही लूटने का कार्य करेंगे। हमारा अपना ज्ञान वही है जो हमने अध्ययन करके, साधना करके अपने अन्तस् में समेटा है।
          हम अपने ऊपर कितना भी मान कर लें कि हमने अपने घर में पुस्तकों का संग्रह किया है, हमारे पास बहुत बढ़िया पुस्तकालय है। यदि हम उन ग्रन्थों का अध्ययन नहीं करते तो बिना पढ़े वह सारा पुस्तकीय ज्ञान हमारे किसी काम नहीं आने वाला। दूसरे शब्दों में हमने अपना धन व्यर्थ ही पुस्तकों को क्रय करने और सहेजने में गॅंवाया है। बिना ज्ञान के विद्वानों के मध्य हमारी वही स्थिति हो जाएगी जैसे हंसो के बीच में जैसे बगुले की होती है। किसी कवि ने बड़े सुन्दर शब्दों में कहा है- 
       माता शत्रुः पिता वैरी, येन बालो न पठितः।
       न शोभते सभा मध्ये हंस मध्ये बको यथा।
अर्थात् वह माता शत्रु है और पिता वैरी है, जिन्होंने अपने बच्चे को नहीं पढ़ाया। वह विद्वानों की सभा में उसी प्रकार सुशोभित नहीं होता जैसे हंसों के बीच बगुला। 
          हम कह सकते हैं कि मनुष्य ज्ञान के बिना सुशोभित नहीं होता। उसे विद्वत सभा में हंसी का पात्र बनना पड़ जाता है। हंस के विषय में हम जानते हैं कि वह नीर-क्षीर विवेकी होता है यानी वह दूध और पानी को अलग कर देता है। वह बहुत बुद्धिमान होता है। इसके विपरीत बगुले को हम ढोंगी मानते हैं। इसीलिए ढोंगी मनुष्यों को समाज में बगुला भक्त कहकर तिरस्कृत किया जाता है। अतः हंसों की सभा में उसको कोई सम्मानजनक स्थान मिल पाना असम्भव होता है।
            ज्ञान के आगार की भॉंति हमारे धन की भी स्थिति होती है। हमारे पास कितना भी धन क्यों न हो, यदि वह हमारे पास नहीं है तो उसकी भी हमारे लिए कोईा उपादेयता नहीं होती। यानी जो धन हमारे पास है वही हमारा है, शेष नहीं। हमारे पास मान लीजिए बहुत धन है और हम लेन-देन का कारोबार करते हैं या व्यापार का बहुत-सा धन हमारे डीलर्स के पास पड़ा है। उस धन को हम अपना नहीं कह सकते जब तक वह हमारे हाथ में नहीं आता। जब हमें उस धन की सुख या दुख में आवश्यकता होगी तो वह हमें समय रहते मिल जाएगा ऐसा कुछ निश्चित नहीं कहा जा सकता।
            इसीलिए किसी विद्वान ने हमें चेतावनी देते हुए कहा है-
       पुस्तकस्था तु या विद्या परहस्तगतं धनम्।
       कार्यकाले समुत्पन्ने न सा विद्या न तद्धनम्।।
अर्थात् पुस्तक में लिखा हुआ ज्ञान और दूसरे को दिया हुआ धन, मुसीबत के समय न वह ज्ञान काम आता है और न वह धन।
            इस श्लोक को यहॉं उद्धृत करने का उद्देश्य यही है कि पुस्तकों में छिपा हुआ ज्ञान हमारे लिए व्यर्थ है यदि हम उस ज्ञान का अर्जन नहीं करते। इसी प्रकार वह धन भी हमारे लिए व्यर्थ है जो हमारे हाथ में नहीं है। दूसरे के पास जो हमारा धन है, उसे देने में वह आनाकानी कर सकता है। हमारी जरूरत के समय यदि वह नहीं मिल सका तो उसके होने का कोई लाभ नहीं है।
             मैं अपने सभी साथियों से आग्रह करती हूँ कि अधिक-से-अधिक ज्ञानार्जन करें ताकि समय आने पर उपहास का पात्र न बनना पड़े। इस प्रकार विद्वानों के समक्ष किसी भी विषय पर हम अपने विचार स्पष्टता और दृढ़ता के साथ रख सकेंगे। इसी तरह अपने खून-पसीने से कमाए हुए धन को भी यथासम्भव अपने पास संग्रहित करके रखें। उसे किसी को अनावश्यक न देकर बैंक में रखकर सुरक्षित करें। ताकि समय आने पर धन के लिए किसी दूसरे का मुँह न ताकना पड़े।
चन्द्र प्रभा सूद 

लालच करने वाले के सिर पर चक्र घूमता है

लालच करने वाले के सिर पर चक्र घूमता है 

बाहरी शत्रुओं से मनुष्य अपनी सुरक्षा का प्रबन्ध करता रहता है। कभी बल का प्रयोग करता है, कभी अपने लिए मजबूत किले बनाता है। वह स्वयं को और सुरक्षित करने लिए कुत्तों को पालता है और अपने घर के बाहर सुरक्षा गार्ड नियुक्त करता है। इस प्रकार करके अपने और अपने परिवार की सुरक्षा का प्रबन्ध करके सुख की सॉंस लेता है। दुर्भाग्य की बात है कि वह अपने स्वयं के शत्रुओं पर विजय प्राप्त करने के लिए वह आजन्म प्रयास करता है परन्तु सफल नहीं हो पाता। वे शत्रु हैं- काम, क्रोध, लोभ, मोह व अहंकार। 
            अन्तस् के शत्रुओं में से आज हम लोभ या लालच के विषय में चर्चा करते हैं। पंचतन्त्र की एक कहानी के माध्यम से इस पर विचार करते हैं।
          प्राचीन काल में चार ब्राह्मण पुत्रों में मित्रता हो गयी। अपनी स्वभाविक दरिद्रता से बहुत परेशान थे। उन्होंने परदेस जाकर धन कमाने के विषय में सोचने लगे। एक दिन चारों भैरवानंद से मिले। उन्होंने उन ब्राह्मणों की सफलता के लिए उन्हें सिद्ध किया हुआ एक-एक सिक्का दिया। उन्हें कहा कि हिमालय की दिशा में जाते हुए जहाँ सिक्का गिरेगा वहाँ अवश्य ही खजाना मिलेगा।
            जाते हुए एक के हाथ से सिक्का गिरा, खोदने पर उनको ताँबा मिला। वह प्रसन्न होकर ताँबा लेकर चला गया जबकि बाकी तीनों दोस्तों ने उसे बहुत मना किया। इसी तरह दूसरा रुपये लेकर और तीसरा स्वर्ण लेकर घर चला गया। चौथे ब्राह्मण को लालच ने घेर लिया। उसे लगा कि पहले ताँबा, फिर रुपये और फिर स्वर्ण मिला तो आगे निश्चित ही हीरे-जवाहरात मिलेंगे। इसी लालच में वह अकेले ही आगे बढ़ गया।
      कहते हैं न भाग्य से अधिक किसी को कुछ नहीं मिलता। आगे जाकर उसने एक ऐसे आदमी को देखा जिसके सिर पर चक्र घूम रहा था। वह लहूलूहान, भूख-प्यास से व्याकुल गर्मी में इधर-उधर घूम रहा था। इस ब्राह्मण ने ज्यों ही उससे उसकी उस हालत के बारे में पूछा तो वह चक्र उसके सिर पर आ गया। उस व्यक्ति ने पूछने पर उसे बताया कि मुझे नहीं पता मैं कितने सालों से यहाँ भूख-प्यास, जीवन-मृत्यु और नींद से रहित यहाँ केवल कष्ट का अनुभव कर रहा हूँ। उसने इसके बाद बताया कि वह भी और अधिक धन के लालच में यहाँ आया था और उसकी ही तरह पूछने पर यह चक्र उसके सिर पर आ गया था। अब वह ब्राह्मण इस इन्तज़ार में असह्य पीड़ा सहता अपने भाग्य को कोसने लगा कि शायद कोई और लालची आकर उसे मुक्त कराएगा।
        इसीलिए कहते हैं कि जो अतिलोभ करता है उसके सिर पर चक्र घूमता है। यह काल चक्र है जो जन्म जन्मांतर तक हमारे सिर पर मंडराता रहता है। यही हमारी परेशानियों, मुसीबतों का नाम है जिसके कारण हम अधिक-अधिक पाने की होड़ में दिन-रात का चैन खो देते हैं। खाने-पीने की सुध बिसरा कर कोल्हू के बैल की तरह हरपल हम पिसते रहते हैं, थककर चूर हो जाते हैं।
    अब हमें ही विचार करना है कि इन शत्रुओं पर हम विजय प्राप्त करें और कष्टों से बचें।
चन्द्र प्रभा सूद 

नशे की लत

नशे की लत

नशे की लत विषय पर एक फेसबुक मित्र ने आग्रह किया है कि अपने विचार आप सभी सुधीजनों के समक्ष रखूँ। उनकी इच्छा का सम्मान करते हुए यह आलेख लिख रही हूँ। 
          नशा तो नशा होता है। हर नशा मनुष्य को अकेला कर देता है। नशा कोई भी हो अच्छा नहीं होता चाहे वह धन-सम्पत्ति का हो, रूप-सौंदर्य का हो, पद का हो, विद्वत्ता का हो या मान-सम्मान का।  यह तो उस नशे की बात हुई जिसे अथक परिश्रम करके हम कमाते हैं। यह भी सत्य है कि यह नशा जब सिर पर चढ़कर बोलने लगे तो उस व्यक्ति को ईश्वर ही बचा सकता है।
         अब हम चर्चा करते हैं उस नशे की या व्यसन की जो मनुष्य को कहीं का नहीं छोड़ता। यह नशा जुए, सट्टे, घोड़ों की रेस आदि किसी का भी हो सकता है। इनके नशे से भी किसी को फलते-फूलते नहीं देखा। कुछ समय के लिए तो अवश्य ऐसा प्रतीत होगा कि अमुक व्यक्ति के पास बड़ा धन आ गया है। पर जहाँ दाँव उल्टा पड़ा, वहीं पर मनुष्य का सब कुछ बर्बाद हो जाता है। कभी-कभी तो ऐसा होता है कि जो कुछ भी इन्सान के  पास होता है, वह उस सब को हार जाता है व कर्जे में डूबकर दाने-दाने को मोहताज हो जाता है। 
          शराब का नशा हो या स्मैक, चरस, गांजे का हो, होता बहुत भयंकर है। इसको करने से पैसे की बर्बादी तो होती ही है और शरीर या स्वास्थ्य की हानि भी होती है। यह तो वही बात हुई न कि अपनी गाँठ का पैसा गया और जग हसाई भी हुई। मुँह के समक्ष भले ही कोई कुछ न कहे पर पीठ पीछे नशेड़ी कहकर सभी उनकी बुराई करते हैं।
           समाज ऐसे लोगों को सम्मान से सम्बोधित न करके शराबी, नशेड़ी, गंजेड़ी या स्मैकिया कहकर तिरस्कृत करते हैं। ये नशे इंसान को कहीं का नहीं छोड़ते। घर-बाहर इनसे कोई मित्रता नहीं करता। इनका मित्र बनना या कहलवाना भी कोई नहीं चाहता। अपने घर-परिवार में भी इन लोगों को कोई बुलाना पसन्द नहीं करता। इसका कारण है कि वे नहीं चाहते कि उनके कारण समाज में कोई उनको हेय दृष्टि से देखे।
           इन नशों को करने के लिए प्रतिदिन धन की आवश्यकता होती है। अब यह समस्या आड़े आती कि पैसा आए कहाँ से। काम-धन्धा तो ये लोग टिककर नहीं कर पाते। अपनी लत के कारण ये लोग शारीरिक रूप से अस्वस्थ हो जाते हैं। अपनी नशे की पिनक में रहने के कारण उन्हें कोई काम नहीं मिलता। कार्य करने में ये दिन-प्रतिदिन असमर्थ होते जाते हैं। 
         बहुत दुर्भाग्य की बात है कि ये घर में मारपीट करके, जबरदस्ती पैसा छीनकर अपनी लत पूरी करते हैं। कभी सड़कों पर तो कभी नालियों में गिरे पड़े मिलते हैं। घर की ओर ध्यान न देने के कारण अपनी घरेलू आवश्यकताओं को पूरा नहीं कर पाते। इसलिए अपनी पत्नी व बच्चों की अवहेलना का भी शिकार बनते हैं।
          घर से, नौकरी से या दोस्तों से जब पैसा नहीं मिलता तो ये लोग चोरी-चकारी से भी परहेज़ नहीं करते। आखिर इनको प्रतिदिन पैसा दे कौन? एक बार कोई दे देगा या दो बार देगा उसके बाद क्या? जो अपनी लत में पैसा बरबाद करता है वो उधार लिया धन नहीं चुका सकता। ये सारी दुखदायी स्थितियाँ मनुष्य को सामाजिक नहीं रहने देतीं। यह बड़ी भयावह स्थिति होती है। ऐसा मनुष्य अपना व अपनों के जीवन परभार होता है।
         नशे के कारण ये बिमारियों का घर बन जाते हैं। लिवर खराब हो जाता है, हाथ काँपने लगते हैं और कैंसर जैसी बिमारियाँ उनका मित्र बन जाती हैं। फिर समस्या आती है ईलाज करवाने के लिए धन की। पैसा तो उन्होंने कभी ढंग से कमाया नहीं और जो कुछ भी घर में था, उसे उन्होंने कभी बचाया नहीं। इस समय हर ओर से निराशा ही उनके हाथ आती है।
        आजकल नशे से मुक्ति पाने के लिए बहुत से रिहेबिलिटेशन सेंटर सरकार और सामाजिक संस्थाओं ने खोले हुए हैं। वहाँ जाने वालों को नशे से मुक्त कराया जाता है। इस नशे को छोड़ने के लिए इच्छा शक्ति का होना बहुत आवश्यक है।
         अपने बच्चों व परिवार से यदि सचमुच प्यार करते हैं तो यथासम्भव इन कुव्यसनों से बचें और सम्मानजनक जीवन जीने का प्रयास करें। ईश्वर इन नशा करने वालों को सद् बुद्धि प्रदान करे।
चन्द्र प्रभा सूद 

मृत्यु का सत्य

मृत्यु का सत्य

यह संसार मृत्युलोक कहलाता है। इसे असार संसार भी कहते हैं। यहाँ रहने वाला प्रत्येक जीव मरणधर्मा कहलाता है। मरणधर्मा का अर्थ है- जो भी जीव इस संसार में आया है उसकी मृत्यु निश्चित है। कहने का तात्पर्य है कि हर जीव चाहे वह मनुष्यहै, पशु-पक्षी है, जीव-जन्तु है अथवा पेड़-पौधा कुछ भी है, निश्चित समय के उपरान्त उसे इस दुनिया से विदा ही लेनी पड़ती है। यह सृष्टि का अटल नियम है। इस नियम को कोई भी बदल नहीं सकता।
           किसी के चाहने अथवा न चाहने से यहाँ कोई अन्तर नहीं पड़ता। इस सृष्टि के अटल नियम को किसी के लिए भी बदला नहीं जा सकता। न ही किसी जीव को इसमें हस्तक्षेप करने का अधिकार है। हमारे बनाए नियम लचीले होते हैं जिन्हें हम अपनी सुविधा से स्वार्थवश किसी के लिए भी तोड़-मरोड़ लेते हैं। ईश्वर के नियम पक्षपात रहित होते हैं -
        सर्वजन सुखाय' व 'सर्वजन हिताय' 
अर्थात् ईश्वरीय नियम सभी लोगों के सुख के लिए और हित के लिए होते हैं। इसीलिए ये ईश्वरीय नियम अटल कहे जाते हैं। हमारे ग्रन्थ ऐसा कहते हैं- 
              जातस्य हि ध्रुवो मृत्यु:। 
अर्थात् इस धरती पर जिस भी जीव का जन्म होता है, उसकी मृत्यु निश्चित है। जल में रहने वाले (जलचर), आकाश में रहने वाले (नभचर) और पृथ्वी पर रहने वाले (भूचर)- सभी को जीव कहते हैं। सभी जीवों का अन्तकाल उनके जन्म से पूर्व ही उसके कर्मों के अनुसार निर्धारित होता है। इसी बात  को तुलसीदास जी ने कहा है - 
        प्रारब्ध पहले रचा पीछे रचा शरीर।
       तुलसी चिन्ता क्यों करे भज ले श्रीरघुवीर।।
          हम अपने जीवनकाल में जो भी अच्छे या बुरे कर्म करते हैं, वे सब हमारे सूक्ष्म शरीर के साथ ही जन्म-जन्मान्तर तक हमारे साथ रहते हैं। जब तक हम उन्हें भोग नहीं लेते तब तक वे समाप्त नहीं होते। सभी भौतिक सम्बन्ध और यह पंचमहाभूतों से बना यह शरीर मृत्यु के पश्चात यहीं इस लोक में रह जाता है। भारतीय संस्कृति के अनुसार उसे अग्नि के हवाले कर दिया जाता है। तब ये सभी पंचमहाभूत अपने-अपने अंश में जाकर मिल जाते हैं। इसके अतिरिक्त कुछ धर्मावलम्बी मृत शरीर को मिट्टी में दफना देते हैं। 
            मेरा ऐसा मानना है कि हमारे इस भौतिक शरीर में ही एक सूक्ष्म शरीर होता है। उसे हम इन भौतिक चर्म चक्षुओं से नहीं देख सकते। हमारे ग्रन्थों का कहना है कि इस सूक्ष्म शरीर को देखने के लिए यम-नियम आदि यौगिक क्रियाओं का पालन करते हुए कठोर साधना करनी पड़ती है। तभी उसे केवल ज्ञान चक्षुओं से खोजा जा सकता है। यद्यपि यह कठोर साधना करना बहुत कठिन कार्य होता है। उसे कोई विरला ही कर सकता है।
           हो सकता है कुछ सुधीजन मुझसे असहमत हों। परन्तु जन साधारण के समझने के लिए सार रूप में हम यही कह सकते हैं। शायद इसीलिए हम लोगों को जागरूक करने हेतु ही परिकल्पना की गई है कि चित्रगुप्त देवताओं के लेखपाल हैं और यमराज के सहायक के रूप में जाने जाते हैं। वे सभी जीवों के कर्मों का लेखा-जोखा रखते हैं। वे यह सुनिश्चित करते हैं कि प्रत्येक मनुष्य को उसके कर्मों के अनुसार फल प्राप्त हो। ऐसी मान्यता है कि जब मनुष्य की मृत्यु होती है तब चित्रगुप्त उसके शुभाशुभ कर्मों को पढ़कर सुनाते हैं। उसी के अनुसार जीव को स्वर्ग या नरक पहुॅंचा दिया जाता है। स्वर्ग-नरक, यमराज आदि का डर हमारे हृदयों में भरा गया ताकि लोग गलत काम करने से डरें। अपने अन्तकाल के विषय में सोचें व अपने हृदय में स्थित ईश्वर को सदा याद करें।
          इस लोक में रहते हुए हम कर्म करने में काफी हद तक स्वतन्त्र हैं परन्तु कर्मफल भोगने के लिए ईश्वर के अधीन हैं। हमारे चाहने या ना चाहने से कोई अन्तर नहीं पड़ता। हमारे पूर्वजन्म कृत शुभाशुभ कर्मों के अनुसार दिया गया वह फल तो हमें भोगना ही पड़ता है। हम चाहे कितनी ही चीख-पुकार क्यों न लगाऍं परन्तु हमें किसी प्रकार की कोई राहत नहीं मिलती है।
           अपने जीवनकाल में और मृत्यु के उपरान्त यदि हम अपना इहलोक अथवा परलोक सुधारना चाहते हैं तो हमें संकल्पशील होकर विचार करना होगा। मृत्यु अवश्यंभावी है इससे किसी को छूट नहीं मिल सकती। फिर चाहे भगवान ही मनुष्य रूप में अवतरित होकर इस पृथ्वी पर क्यों न आ जाएँ। उन्हें भी इसी क्रम का भागीदार बनना पड़ता है। उन्हें किसी प्रकार की छूट दिए जाने का प्रावधान नहीं है। यही जीवन और मृत्यु का सत्य है। सभी जीवों को इस आवागमन की प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है जब वे अपने जीवन के लक्ष्य मोक्ष को प्राप्त नहीं कर लेते।
चन्द्र प्रभा सूद