इन्सान बड़ा नाशुकरा जीव
इन्सान बड़ा ही नाशुकरा जीव है। उसे हम एहसानफरामोश अथवा कृतघ्न कोई भी नाम दे सकते हैं। अपने प्रति किए गए अहसान को बहुत ही जल्दी भूल जाता है। जब उसे आवश्यकता होती है तो वह गधे को भी बाप बनाने से नहीं चूकता। जैसे गुड़ पर मक्खियॉं मंडराती हैं, उसी प्रकार वह सारा समय उन लोगों के आगे-पीछे घूमता रहता है जिनसे उसका स्वार्थ पूर्ण होता है। अपना कार्य सिद्ध हो जाने के पश्चात वह उनसे नजरें मिलाने से भी कतराने लगता है।
आज के इस भौतिक युग में अनेक लोग हमें अपने आसपास ऐसे दिखाई देते हैं जिनके जीवन का बस यही एक मन्त्र है - 'जिस सीढ़ी से ऊपर चढ़ो उसे ठोकर मारकर गिरा दो।' यानी जिन लोगों की बदौलत उसने अपने लक्ष्य का भेदन किया है, काम हो जाने पर उसे अब उन लोगों की आवश्यकता नहीं है। उन लोगों का साथ बस यहीं तक ही था। अब वे कौन और हम कौन? जबकि इस एटीट्यूड को बहुत गलत कहा जा सकता है और इससे बचना चाहिए।
ऐसे स्वार्थी लोगों के कारण ही समाज में आज लोग परस्पर विश्वास खोते जा रहे हैं। वे समय पड़ने पर एक-दूसरे की सहायता करने से कतराने लगे हैं। वे सहायता की याचना को षडयन्त्र का नाम देने लगे हैं। घनिष्ठ सम्बन्धों में भी सन्देह का कीड़ा घर करता जा रहा है। इसी कारण भाईचारा व मित्रता भी कहीं-कहीं शत्रुता में बदलने लगी है। ये स्थितियाँ सभ्य समाज के लिए बहुत ही हानिकारक हैं। समझ नहीं आता कि यह स्वार्थपरता हमें कहॉं ले जाकर छोड़ेगी?
कभी-कभी सोचती मैं हूँ कि क्या अपनी आने वाली पीढ़ियों को हम बीमार सम्बन्धों वाला समाज सौंपेंगे? हम उनका स्वस्थ विकास कैसे कर पाएँगे? इस विषय पर हम सबको गहन परामर्श करने की आवश्यकता है। हमें अपनी इस बीमार मानसिकता से छुटकारा पाना ही होगा। तभी एक स्वस्थ समाज का निर्माण सम्भव हो सकेगा। जहॉं बिना स्वार्थ के लोग आवश्यकता पड़ने स्वेच्छा से एक-दूसरे की सहायता करेंगे।
ईश्वर ने सृष्टि में इन्सान को सबसे श्रेष्ठ जीव बनाया है परन्तु हमने अपनी मूर्खताओं से उस पर दाग लगा दिया है। जिसने संसार में उसे भेजा, दुनिया के सभी ऐश्वर्य दिए, उसे वह पृथ्वी पर आते ही किनारे कर देता है। थोड़ा-सी धन-सम्पत्ति पाकर वह गर्व से फूला नहीं समाता। अपने इसी अहं के कारण वह उस ईश्वर की सत्ता को भी चुनौती देने की धृष्टता करता है। वह भूल जाता है कि इस संसार में उसका अपना कुछ भी नहीं है। जिस धन-दौलत, रूप-सौंदर्य, शक्ति आदि पर वह इठलाता फिरता है, वे सब भी उसके अपने नहीं हैं। वे सब उसे साधन के रूप में प्रभु ने दिए हैं। वह सदा ही उस प्रभु के रहमोकरम पर है।
व्यर्थ के अभिमान में आकर वह अपनों को ही चोट पहुँचाने लगता है। कहने का तात्पर्य है कि वह किसी का भी कृतज्ञ नहीं होता। वह सबके लिए यही कहता है कि किसी ने उसके लिए किया ही क्या है? उसने अपने बलबूते पर सब साधन जुटाए हैं। किसी को श्रेय देने का प्रश्न नहीं उठता। वह तो ईश्वर की हस्ती को भी नकारकर वह स्वयंभू बनने का अपराध बैठता है। नाशुकरा मनुष्य ईश्वरीय सत्ता को चुनौती देने की भूल कर बैठता है।
मनुष्य भूल जाता है कि सभी ऐशो आराम जिस मालिक ने दिए उसे हैं, वह उन्हें वापिस भी ले सकता है। उसकी लाठी की आवाज नहीं होती पर जब वह चलती है तो बड़ी गहरी चोट लगती है। फिर चोट लगने पर वह तिलमिला उठता है। उस समय ईश्वर के साथ-साथ अपने सभी बन्धु-बान्धवों को वह पानी पी पीकर कोसता है। उन्हें लानत भेजता है। अपनी स्वयं की गलती न मानकर दूसरों को दोष देता है। ऐसा लगता है मानो इस कला में तो उसे महारत हासिल है।
होना तो यह चाहिए कि जो भी कोई व्यक्ति हम पर उपकार करता है या राई भर भी हमारी सहायता करता है, उसका धन्यवाद करना चाहिए। अन्यथा सामने वाले दूसरे लोग हमें कृतघ्न कहकर हमारा तिरस्कृत कर सकते हैं। इस स्थिति से बचना चाहिए। यथासम्भव दूसरों की सहायता का यत्न भी करना चाहिए। इसी प्रकार आदान-प्रदान से ही समाज चलता है। दूसरों के प्रति कृतज्ञता प्रदर्शित करना एक मानवीय गुण है। हमें ऐसे उपयोगी गुणों का त्याग नहीं करना है।
मैं सभी मित्रों से अनुरोध करती हूँ कि उस दाता के उपकार को हमेशा याद रखिए। बिना कहे वह भर-भरकर नेमतें हमारी झोली में डालता है। मूर्खतावश हम अज्ञ जन उसकी महिमा को नहीं समझ पाते। इसलिए अपने वृथा अभिमान को त्यागकर सोते-जागते, खाते-पीते, उठते-बैठते उस ईश्वर का धन्यवाद करना चाहिए। वही हमारा सच्चा सहायक है, उसी की शरण में जाना चाहिए। ऐसा करने पर ही हमें अपने जीवन में सच्चा सुख मिल सकता है।
चन्द्र प्रभा सूद
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