रविवार, 8 जून 2025

सुख की चाहत

सुख की चाहत

संसार में रहने वाला हर मनुष्य अपने जीवन में केवल सुख की कामना करता है। कोई भी व्यक्ति नहीं चाहता कि उस पर या उसके प्रियजनों पर दुख की छाया भी पड़े। अपना सुख प्राप्त के लिए दूसरों को कष्ट देना, किसी भी प्रकार से उचित नहीं कहा जा सकता। संसार में सुखी रहने का एक यही मूलमन्त्र है कि अपने आचार-व्यवहार में थोड़ा-सा परिवर्तन करना।
           यह संसार असार है। इस भौतिक जगत में अनेकों कष्ट व परेशानियाँ मनुष्य को झेलनी पड़ती हैं। ऐसा नहीं है कि हमेशा ही उसके खाते में दुखों का सामना करना लाखा होता है अथवा उसे केवल सुख ही मिलते हैं। सुख और दुख दोनों पहिए के अरों की भाँति ही क्रमानुसार हमारे जीवन में आते हैं। सुख-दुख के इस क्रम से बच सकना किसी भी मनुष्य के लिए नामुमकिन है।
           सुख जब हमारे पास आता है तो हमारी प्रसन्नता का पारावार नहीं रहता। हम चाहकर भी अपनी खुशी को छुपा नहीं पाते, वह हमारे व्यवहार में छलक पड़ती है। उस सुख के समय सभी लोग साथ हमारे चलने के लिए तैयार हो जाते हैं। वह समय तो मानो पंख लगाकर उड़ जाता है। इसलिए हमें ऐसा प्रतीत होने लगता है कि बहुत कम समय के लिए हम सुखी हो सके थे।       
              इसके विपरीत जब कष्ट का समय होता है तो हमें तौबा बुलवा देता है। हमारे अपने ही हमसे कन्नी काटने लगते हैं। उस समय मानो हमारा खुद का अपना साया भी साथ छोड़ देता है। उस समय एक-एक पल हमें एक-एक युग की तरह महसूस होता है। वह कष्टप्रद समय हमें रबर की तरह खिंचता हुआ-सा लगता है। हमें ऐसा लगने लगता है कि इस जीवन में हमें केवल दुख-ही-दुख मिल रहे हैं और सुख हमारे हिस्से में है ही नहीं।
            ईश्वर बहुत ही न्यायकारी है। वह तो हमारे पूर्वजन्म कृत कर्मों के अनुसार ही सुख और दुख हमारी झोली में डालता रहता है। उसके यहाँ इस संसार की तरह हेराफेरी नहीं होती और न ही वह किसी के साथ पक्षपात करता है। इसलिए उसे उसे कभी दोषी नहीं ठहराना चाहिए। जो गलती करेगा उसे ही सजा मिलेगी, किसी मासूम को नहीं। जहाँ तक हो सके अपने मन में यह बात अच्छी तरह बिठा लेनी चाहिए कि वह बहुत दयालु है। वह माता की भाँति सदा हमारी रक्षा करता है।
          हम अपने बच्चों या अधीनस्थ लोगों को उनकी गलती सुधारने के लिए सजा देते हैं। उसी प्रकार वह मालिक भी हमें अपनी गलतियाँ भोगने व कुन्दन बनाने के लिए दुखों व परेशानियों की अग्नि में तपाता है। वह अन्तर्यामी है व सर्वव्यापक है। हम जो भी अच्छे या बुरे कार्य सम्पादित करें उसे हाजिर-नाजिर मानकर करें। हमें इस बात को कदापि नहीं भूलना चाहिए कि जो भी काला-सफेद हम करते हैं, वह देख रहा है। इसीलिए समयानुसार हमें उन कर्मों का भुगतान करना पड़ता है। इसीलिए कहते हैं- 
         'कर्म गति टारे नहीं टलती' 
         'समय बड़ा बलवान है'
       'अवश्यमेव भोक्तव्यं कृतं कर्म शुभाशुभम्।'
इन सभी सूक्तियों का अर्थ है कि जो कर्म हमने किए हैं, उन्हें अवश्य भोगना पड़ता हैं। वे किसी भी प्रकार टल नहीं सकते। समय बहुत बलवान है वह हमें कभी माफ नहीं करता।
           जो व्यक्ति यह कहता है कि तीर्थयात्रा कर लो या गंगा स्नान कर लो पाप कट जाएँगें, वह झूठ बोलता है। पाप तो भोगने से ही कटते हैं। कर्मफल का भुगतना बहुत कष्टदायक होता है व नानी याद करवा देता है। ईश्वर तब तक सुखों व दुखों से मिलवाता रहता है जब तक हमारे पूर्वकृत कर्मों का फल का फल हमें मिल न जाए।
            दुख का समय ईश्वर की उपासना व अर्चना करते हुए गुजारना चाहिए। इससे दुख तो कम नहीं होता पर उसे सहन करने की शक्ति अवश्य मिलती है। इसीलिए हमारे ऋषि-मुनि सुख और दुख दोनों ही स्थितियों में ईश्वर की भक्ति करने के लिए समझाते हैं।
चन्द्र प्रभा सूद 

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