मंगलवार, 24 जून 2025

आशा का दामन थामें

आशा का दामन थामें

आशा और निराशा के झूले में झूलते हुए मनुष्य कभी प्रसन्न होता है तो कभी त्रस्त। वह सदा ही असमंजस की स्थिति में रहता है। उसे समझ नहीं आता कि वह क्या करे और क्या न करे? यानी वह आशा और निराशा के चक्रव्यूह में उलझकर रह जाता है। बच्चे जब सी-सा पर झूलते हैं तो कभी एक सिरा ऊपर की ओर उठता है तो दूसरा नीचे की ओर झुक जाता है। फिर दूसरा सिरा ऊपर की ओर उठता है तो पहले वाला सिरा नीचे आ जाता है। यही मनुष्य के साथ भी होता है। यानी कभी आशा का पलड़ा भारी हो जाता है तो कभी निराशा का पलड़ा उस पर हावी हो जाता है। 
           ये स्थितियॉं सदा उसकी समझ से परे होती हैं। उसके लिए हमेशा कष्ट का कारण बन जाती हैं। मनुष्य को सदा ही अपने विवेक पर भरोसा करना चाहिए। यह आवश्यक है कि उसे सोच-विचारकर आगे कदम बढ़ाना चाहिए। उसे कभी भी आशा का दामन नहीं छोड़ना चाहिए। उसे इस बात पर विश्वास करना चाहिए कि निराशा का समय भी कट जाएगा।इस आशा की एक किरण के सहारे वह बड़े से बड़े दुखों-परेशानियों के पहाड़ पार कर सकता है। इसमें जरा भी सन्देह नहीं है।
            इन्सान को यह बात हमेशा याद रखनी चाहिए कि रात कितनी भी लम्बी या डरावनी काली क्यों न हो, उसके बाद प्रातःकाल अवश्य होता है। रात के अंधेरे को देखकर कभी-कभी लगता है कि यह रात कब बीतेगी? परन्तु पल-पल करके वह रात भी समाप्त हो जाती है। एक नया सवेरा हमारी प्रतीक्षा कर रहा होता है। उस समय रात के अंधेरे में छुपा सूर्य उसे चीरकर पूरे जोश और उमंग के साथ फिर से एक नए दिन के रूप में हमारे समक्ष उपस्थित हो जाता है। उसके प्रकाश व तेज में कोई कमी नहीं आती। 
        लाख तूफान आ जाएँ पर नदी उन सबसे लड़कर अपना अस्तित्व बचा लेती है व फिर से अपनी पहचान बनाती है। एक नन्हा-सा दीपक भी हवा के झोंकों से लड़कर टिमटिमाते हुए अंधकार को दूर करके प्रकाश देता है। वृक्ष झंझावातों से लड़ते हुए जीतते हैं और फिर से तनकर खड़े हो जाते हैं। इसी प्रकार संसार में प्रकृति के हर तत्त्व को भी संघर्षों से पार पाने के लिए झूझना पड़ता है। फिर हम मनुष्य भी तो इस चक्र का ही हिस्सा हैं इससे अलग नहीं हैं। हमें भी सुख-दुख के भंवर में डूबना उतरना पड़ता है।
            हम जब दुखों के अथाह समुद्र में डूब जाते हैं या परेशानियों में चारों ओर से घिर जाते है तब हमें ऐसा लगता है कि इनसे छुटकारा पाने का कोई भी मार्ग हमारे पास नहीं है। उस समय अपने विवेक पर से भी हमारा विश्वास डगमगाने लगता है। तब सभी भाई-बन्धु किनारा कर लेते हैं। ऐसा कहा जाता है कि हमारी अपनी परछाईं भी हमारी नहीं रहती, वह भी हमें छोड़ जाती है। ऐसी भयावह स्थिति वाकई इन्सान को झकझोर कर रख देती है। इस स्थिति में घबराना नहीं चाहिए बल्कि डटकर मुकाबला करना चाहिए।
            यह वह समय होता है जब अपने-आप को मनुष्य निराशा के मकड़जाल में फंसा हुआ पाता है। उससे बाहर निकालने के लिए वह बस छटपटाता रहता है। उस समय वह भूल जाता है कि काले घने बादलों की ओट में जब सूर्य छुप जाता है और दिन में रात का एहसास होने लगता है तब बादल बरसते हैं। उसके बाद फिर वह घनघोर अंधेरा न जाने कहाँ खो जाता है। यानी घने बादलों की ओट में छिपा हुआ सूर्य, फिर से अपनी मुस्कान बिखेरता हुआ निर्मल आकाश पर अपनी छटा बिखेरने लगता है। कहने का तात्पर्य यह है कि काले बादल सूर्य को बहुत समय तक अपनी गिरफ्त में नहीं रख सकते।तब हमें अपने चारों ओर केवल चमचमाता हुआ प्रकाश दिखाई देता है।
           यही प्रकाश आशा का प्रतीक है। हमें आशा का दामन कभी नहीं छोड़ना चाहिए। आशा की एक किरण हमारे जीने का सम्बल होती है। गहरे अंधेरे कमरे में जलता हुआ एक छोटा-सा दीपक अंधेरे को दूर भगा देता है। वह हमें आशान्वित करता है। वह हमें यह संदेश देता है कि हमें घबराने की बिल्कुल आवश्यकता नहीं है। 'मैं हूँ न आप सबकी आशाओं का दीपक' कहकर अपना अस्तित्व मिटने नहीं देता। वह कहता है कि मुझे हमेशा याद रखना, भूलना नहीं।
              अन्तत: यह कहना उचित होगा कि निराशा को अपने ऊपर हावी नहीं होने देना चाहिए। अपने गुरुजनों और विवेकी सज्जनों की संगति में कष्टदायक समय को व्यतीत करना चाहिए। दुखों-कठिनाइयों में हमेशा ईश्वर को सच्चे मन से याद करना चाहिए। इससे हमें मानसिक बल मिलता है। तभी हम संघर्ष करके अपनी परेशानियों पर विजय प्राप्त कर सकते हैं। ईश्वर ही इन निराशा के बादलों को दूर करके हमें आशा की सुनहली वादियों में ले जाएगा। वही हमें हमारा सतरंगी इन्द्रधनुष हमें लौटाएगा।
चन्द्र प्रभा सूद 

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