सोमवार, 23 नवंबर 2015

संयुक्त परिवार छतनार वृक्ष

संयुक्त परिवार बच्चे के लिए एक छतनार वृक्ष की तरह होता है। इसकी छत्रछाया में बच्चा फलता-फूलता है और वहाँ सदा ही उसका सर्वांगीण विकास होता है। अपने बाल्यकाल से ही वह जीवन में भरपूर प्यार, दुलार, ममता व अपनापन पाता है। उसे रिश्तों के मायने स्वयं ही समझ में आ जाते हैं जो एकल परिवार में सम्भव नहीं हो पाता।
          घर में माता और पिता इन दोनों के अतिरिक्त बच्चा अधिक लोगों को अपने घर में देखता है। समय-समय पर उन सबसे वार्तालाप करता है। उसमें यह समझ आती है कि किस सम्बन्धी से किस प्रकार का व्यवहार करना होता है। अपने से छोटों और अपनों बड़ों लोगों के साथ व्यवहार करते समय क्या सावधानियाँ अपेक्षित हैं।        
         इसके अतिरिक्त घर में आने-जाने वाले मेहमान भी एकल परिवार की अपेक्षा अधिक ही होते हैं। उनको देखते हुए उसे सम्बन्धों के मायने और उनका महत्त्व स्वत: समझ आ जाता है। इसका प्रमुख कारण यह है कि बच्चा हर बात को बड़ी ही बारीकी से देखता, परखता और समझता है।
          उसे सबके साथ सामंजस्य करना अपने आप ही देखते और समझते हुए आ जाता है। इस प्रकार बड़े होने पर उसे भिन्न प्रकृति के दूसरों लोगों के साथ सामंजस्य बिठाने में किसी प्रकार की समस्या का सामना नहीं करना पड़ता क्योंकि यह गुण उसमें स्वभावत: ही आ जाता है।
          घर में अन्य बच्चों के साथ खेल-खेल में भोजन खाना सीख जाता है। संयुक्त परिवारों में रहने वाले प्राय: बच्चे खाने-पीने के लिए तंग नहीं करते। उसे अपने खिलौने व अन्य सामान मिल-बाँटकर इस्तेमाल करने का ढंग आ जाता है।
            स्कूल जाने पर बड़े भाई-बहनों के होते उसे चिन्ता नहीं होती। स्कूल हो या खेल का मैदान उसे पता होता है कि उसे यदि कोई बच्चा तंग करेगा तो उसके बड़े भाई-बहन उससे निपट लेंगे। इस तरह वह हर स्थान पर अपने को सुरक्षित महसूस करता है। ऐसा करके उसे मानसिक संतोष मिलता है।
         संयुक्त परिवार में पले बच्चे एकल परिवार के बच्चों की बनिस्बत अधिक सुलझे हुए और समझदार होते हैं। उनके आचार-व्यवहार का अन्तर भी हम प्रत्यक्ष देख सकते हैं।
        बच्चे के लिए सबसे प्रसन्नता इस बात से होती है कि उसे अन्य बच्चों की तरह क्रच में जाकर देर शाम तक बोर नहीं होना पड़ता क्योंकि वहाँ तो सारा समय अनुशासन में रहना होता है। उसे यह भी अच्छा लगता है कि नौकर उसके सिर पर सवार नहीं है और उनके हाथ का बना हुआ बेस्वाद खाना भी नहीं खाना पड़ता।
         बड़े-बजुर्गों के घर में रहते हुए अपनी इच्छा से खाता, पीता, खेलता और सोता है। घर के दूसरे बच्चों के साथ बैठकर वह स्कूल से मिला गृहकार्य सरलता से कर लेता है। जहाँ समझ में न आए समझाने के लिए बड़े बैठे हैं न।
         जो प्यार, अपनापन व भावनात्मक सुरक्षा बच्चे को अपने घर में मिलती है वह अन्यत्र कहीं भी नहीं मिल सकती। बच्चे को जो समय उसके रिटायर्ड या अपनी जिम्मेदारियों से मुक्त दादा-दादी अथवा नाना-नानी दे सकते है वह माता-पिता नहीं दे सकते। वे तो अपने घर और दफ्तर के व्यस्त कार्यक्रम में उलझे होते हैं।
           संयुक्त परिवार में इस प्रकार लड़ते-झगड़ते, मीन-मेख निकालते, रूठते-मानते, प्यार-मुहब्बत से बच्चे का जीवन बड़ी सरलता से व्यतीत होता है। सबसे बड़ी बात तो यह होती है कि माता-पिता भी अपने बच्चे की ओर से बिल्कुल निश्चिन्त रहते हैं।
        अन्त में मैं यही सुझाव सबको देना चाहती हूँ कि यदि ऐसी कोई मजबूरी न हो तो अपने बच्चों को इस सुख से वंचित न करें। छोटी-मोटी बातें घर-परिवार में यदि हो भी जाएँ तो उन्हें बच्चों की भलाई के लिए अनदेखा कर दें।
चन्द्र प्रभा सूद
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