बुधवार, 23 दिसंबर 2015

पति-पत्नी एक मुठ्ठी की तरह

पति और पत्नी को सदा इस प्रकार मिलकर रहना चाहिए कि मृत्यु के अतिरिक्त संसार की कोई भी अन्य ताकत उन दोनों को अलग न कर सके। हमारे महान ग्रन्थों के अनुसार गृहस्थ जीवन में यह स्थिति एक आदर्श स्थिति होती है। जिन घरों में उन दोनों में वास्तव में सामंजस्य होता है वहाँ स्वर्ग जैसा आनन्द होता है। ऐसे सुख के लिए तो देवता भी तरसते हैं। वे देवता लोग भी ऐसे घरों में जन्म लेने के लिए तरसते रहते हैं।
        पति और पत्नी को दो जिस्म और एक जान बनकर रहना चाहिए। तभी गृहस्थी की गाड़ी ठीक से पटरी पर चल सकती है। कहने का अर्थ यह है कि यदि उन दोनों में परस्पर विश्वास, सच्चाई, ईमानदारी, समझदारी और पारदर्शिता का व्यवहार होता है तभी घर-परिवार एक मुट्ठी की तरह बंधा हुआ रह पाता है। अन्यथा वह घर तिनकों की तरह उड़कर इधर-उधर बिखर जाता है।
         संस्कृत भाषा के सुप्रसिद्ध महाकवि कालिदास ने 'कुमारसम्भवम्' महाकाव्य में भगवान शिव और भगवती पार्वती की वन्दना करते हुए कहा है-
वागर्थाविव सम्पृक्तौ वागर्थ प्रतिपत्तये।
जगत:  पितरौ वन्दे  पार्वतीपरमेश्वरौ॥
अर्थात भगवान शिव और भगवती पार्वती दोनों इस प्रकार मिले हुए हैं जैसे शब्द और अर्थ। शब्द और अर्थ को अलग नहीं किया जा सकता। वैसे ही न दोनों को भी अलग नहीं कर सकते।
         दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं कि शब्द बोलते ही हम बिना कहे उसके अर्थ को जान लेते हैं और उसी तरह अर्थ कहते ही हमें शब्द का पता चल जाता है। इस तरह दोनों एकरूप हैं। इसी तरह पति और पत्नी को सदा दूध में शक्कर की तरह ही मिलकर, एक बनकर रहना चाहिए तभी जीवन में आनन्द ही आनन्द होता है। ऐसे दम्पति युगल के उदाहरण देते हुए लोग नहीं थकते और उनकी कसमें तक खाने के लिए तैयार रहते हैं।
         जिन पति-पत्नी के सम्बन्ध में परस्पर विश्वास, सौहार्द और पारदर्शिता नहीं होती वे सारा जीवन लड़ते-झड़गते और लानत-मलानत करते हुए गुजार देते हैं। एक-दूसरे को ताना देना, बात-बात में छींटाकशी करना उनका स्वभाव बन जाता है। ऐसा घर नरक से भी बदतर होता है। यहाँ रहने वाले सभी परिवारी जन पूर्व-पश्चिम की तरह अलग-अलग रहते हैं। कोई किसी की शक्ल देखना पसंद नहीं करता।
          जीवन का अधिकांश समय पति और पत्नी एक साथ गुजारते हैं। प्राय: शादी लड़कों की शादी 25 से 30 वर्ष की आयु में होती है और लड़कियों की शादी20 से 27 हो जाती है। शादी के बाद दोनों पति और पत्नी एकसाथ रहते हैं। आयु के इतने वर्ष साथ-साथ रहने पर भी परस्पर आपस में विश्वास या तारतम्य का न होना वाकई बहुत ही हैरानी का विषय है।
         विवाह से पूर्व दोनों युवा अपने भावी सुखी जीवन के लिए सपने बुनते हैं तो फिर ऐसा अनायास क्या हो जाता है कि वे परस्पर विश्वास की डोर में सदा के लिए नहीं बंध पाते? यह अविश्वास का भूत उन्हें क्यों डराने और सताने लगता है? दोनों एक न होकर सारा जीवन दो बनकर क्यों जीना चाहते हैं?
          युवाओं को अपने देखे हुए सपनों को साकार करने के लिए अपना नव जीवन आरम्भ करने से पूर्व अपने-अपने अहं को ताक पर रख देना चाहिए, उन्हें टकराने नहीं देना चाहिए। उन्हें अपने-अपने पूर्वाग्रह को छोड़कर बंद मुट्ठी की तरह रहना चाहिए। यदि उन्हें कोई कष्ट भी हो तो किसी को भी उनके कष्ट की भनक भी न लगने पाए। यदि कभी कोई समस्या आ भी जाए तो उसे मिल-बैठकर दो समझदार लोगों की तरह सुलझा लेनी चाहिए, कभी तकरार नहीं करनी चाहिए।
        यदि पति-पत्नी एक रथ के दो पहिए की तरह जीवन गुजारना चाहते हैं तो जीवन में आपसी तालमेल बनाए रखना चाहिए। इससे जीवन को जीना सहज और सरल हो जाता है।
चन्द्र प्रभा सूद
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